Thursday, May 24, 2007

कुछ मकड़ीली कथाएं


कुछ मकड़ीली कथाएं
आलोक पुराणिक
लोग बहुत स्मार्ट हो गये हैं।
पुरानी कथाएं सुनाओ, तो लोग नये सबक ले लेते हैं।
26 बार फेल होने दो
एक बच्चे को मैंने कथा सुनायी कि एक समय की बात है एक राजा दुश्मन राजा से परास्त होकर एक गुफा में घुस गया। वहां गुफा में उसने देखा कि एक मकड़ी दीवार पर चढ़ने की कोशिश कर रही है। वह बार-बार चढ़ती और गिरती।
वह 26 बार गिरी और फिर जाकर फाइनली चढ़ गयी।
मैंने पूछा एक बच्चे से कहा-इससे तुम्हे क्या शिक्षा मिलती है।
बच्चा बोला-
जी इससे तो मेरे पिता को शिक्षा लेनी चाहिए। मैं सिर्फ पांच बार फेल हुआ हूं. और वो मुझे डांटते हैं। अब मैं जाकर उन्हे बताऊंगा कि छब्बीस बार फेल होना तो मकड़ी तक को माफ है।
यही कथा मैंने एक कंपनी में कई कर्मचारियों को सुनाई तो उनमें से एक ने उठकर कहा कि इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी प्रोजेक्ट में छब्बीस बार फेल हो जायें, तो बास को कोई प्राबलम नहीं होनी चाहिए।
सत्ताईसवीं बार भी अगर मामला न जमे, तो फिर उस पर आगे कार्रवाई होनी चाहिए। छब्बीस बार तक तो बजट देने में ऊपर वालों को प्राबलम नहीं होनी चाहिए।
यही कहानी मैंने केंद्रीय सचिवालय में सरकारी कर्मचारियों को सुनाई।
तो एक सरकारी कर्मचारी बोला-
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि वह मकड़ी प्राइवेट सेक्टर की होगी, तब ही जल्दी काम निपटा लिया।
छब्बीस बार में ही काम निपटा लिया। सरकारी सेक्टर की मकड़ी होती, तो 126 ट्रायल रन लेती।
जो मकड़ियां जल्दी चढ़ जाती हैं, वो बास लोगों की आदतें खराब कर देती हैं।
सो इस कहानी से हमें शिक्षा लेनी नहीं चाहिए, मकड़ी को शिक्षा देनी चाहिए कि ज्यादा जल्दी मत किया करे। गिनती में छब्बीस से आगे के नंबर भी होते हैं ना।
पुलिस वालों को यह कथा सुनायी, तो एक पुलिस वाला बोला-
यह मकड़ी मेरे इलाके की नहीं हो सकती। बिना रकम दिये मेरे इलाके में कोई कहीं चढ़-उतर नहीं सकता। आ-जा नहीं सकता।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कुछ पुलिस वाले ऐसे भी निकम्मे होते हैं, जो बिना कुछ लिये –दिये ही किसी को आने-जाने देते हैं।
गलत बात है। बहुत गलत बात है।
यह कथा मैंने नेताओं के बीच सुनायी, तो एक घुटा हुआ नेता बोला-
पर सवाल यह है कि मकड़ी चढ़ी ही क्यों। क्या मकड़ी ने चढ़ने का वादा किया था। अगर वादा नहीं किया था, तो चढ़ी क्यों। क्या चढ़ने की कोई रकम मिली क्या। अगर रकम नहीं मिली, तो फिर फोकटी में मकड़ी चढ़ी ही क्यों।
एक नये नेता ने कहा-
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि छब्बीस बार तक झूठे वादों से काम चलाया जा सकता है। इसके बाद कुछ करके दिखाना पड़ेगा।
पर इसके बाद भी कुछ करके दिखाने की जरुरत क्या है।
इस कहानी से हम यह शिक्षा भी ले सकते हैं कि सत्ताईसवीं बार गुफा को ही बदल दो।
एक नये सरकारी इंजीनियर ने कहा-अऱे वाह, तब तो छब्बीस बार गिरने का टीए डीए बना होगा। अरे मकड़ी और बनाती टीए डीए, काहे को चढ़ गयी सत्ताईसवीं बार। अगर चढ़ने का रास्ता आसान बनाने के लिए पुल बनाना पड़ा, तो कितने करोड़ का बजट बनेगा। उसमें अपन का हिस्सा कितना होगा।
एक डाक्टर ने कहा-छब्बीस बार गिरी, और एक बार भी चोट नहीं लगी। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सबके खाने-पीने का इंतजाम है, बस डाक्टरों के खाने का इंतजाम नहीं है। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि डाक्टरी के धंधे में ज्यादा कमाई नहीं है।


कुल मिलाकर मुझे पुरानी कहानियों से ये नयी शिक्षाएं मिली हैं-
1- जो बंदे जल्दी काम निपटा देते हैं, वो बास लोगों की आदतें खराब कर देते हैं।
2- सीबीएसई के रिजल्ट आने वाले हैं, छब्बीस बार तक फेल होने की परमीशन बच्चों को मिलनी ही चाहिए।
3- पुरानी कथाएं संभल कर सुनानी चाहिए। पता नहीं कोई क्या नया सबक ले ले।







3 comments:

Pramod Singh said...

इतना कैसे और कहां से लिखते हैं, महाराज?.. इतना लिख-लिखकर फिर जीवन के लिए वक़्त कब निकालते हैं?.. मात्र दूसरों को कॉम्‍प्‍लेक्‍स दे रहे हैं, और कुछ नहीं कर रहे!

Udan Tashtari said...

तो अब जब मिलोगे तो २६ कविता तक तो चलेगी न!! :)

संतोष said...

आपका blog archive कहता है कि सन 2007 में आप 25 पोस्ट लिख चुके हैं......
समझ गये ना....?