Sunday, May 6, 2007

मोबाइल शिष्टाचार

मोबाइल शिष्टाचार
आलोक पुराणिक
हलो हाऊ डू यू टाइप शिष्टाचार के दिन सिर्फ लद ही नहीं गये हैं, बल्कि बहुत पहले लद गये हैं। अब मामला बहुत फूं-फां हो गया है।
नयी ट्रेंड्स की बहुत-बहुत गहराई से यानी करीब आधे घंटे स्टडी करने के बाद इस खाकसार ने न्यू-शिष्टाचार का एक मैनुअल बनाया है। जनहित में इसके कुछ अंश आप सबके लिए छापे जा रहे हैं।
मोबाइल
सिर्फ मोबाइल रखना अब काफी नहीं है।
मोबाइल की स्टाइल और प्रोफाइल का ख्याल रखना जरुरी है।
कौन सा माडल है-7897 या 5549, इस सवाल का जवाब आप दे सकती हैं या नहीं।
अगर नहीं, तो समझिये कि आप अभी भी पिछड़ेपन का शिकार हैं।
तमाम पार्टियों में मोबाइल विषयक कुछ बातचीत इस प्रकार दर्ज की गयी है-
हाय हाऊ आर योर मोबाइल।
मेरा मोबाइल फाइन है। 8765 है। नया आया है। धांसू फीचर हैं। इसमें सामने वाला का सिर्फ फोटू ही नहीं, एक्सरे भी लिया जा सकता है।
अच्छा, मेरा वाला 78655 है। इसमें सिर्फ मैसेज ही नहीं, पूरा का पूरा आदमी ही ई-मेल किया जा सकता है।
पर पूरे आदमी को ई-मेल करने की जरुरत तुम्हे क्यों पड़ेगी।
क्या किसी आदमी की एक्सरे करने की जरुरत तुम्हे पड़ेगी।
हुंह।
हुंह।
बातचीत नंबर टू-
ओ वाऊ, तुम्हारा मोबाइल बहुत क्यूट है।
नहीं ऐसे ही है। परसों पिच्चासी हजार का लिया था।
तुम्हारी यही गंदी आदत है, हमेशा सस्ते आइटम खरीदती हो। सिर्फ क्यूट होने से क्या होता है। ग्रेस भी होनी चाहिए। अपन तो दो लाख से कम का मोबाइल खरीदते ही नहीं हैं।
ओ के बाय।
बातचीत नंबर थ्री
वेरी पुअर, आपके मोबाइल का कलर आपकी लिपस्टिक के रंग से मैच नहीं कर रहा है।
तो क्या हुआ आपका मोबाइल भी तो आपके सैंडिल से मैच नहीं कर रहा है।
मोबाइल के शेड्स सबसे अच्छे वहां मिलते हैं-नेहरु प्लेस में।
ओ नो, मुझे तो ब्यूनर आयर्स के शेड्स ही पसंद हैं।
मोबाइल विषयक हवाबाजी के लिए जरुरी है।
आप मोबाइल से जुड़ी जानकारियां पढ़ती रहें। जानकारियां न भी पढ़ें, तो भी ऐसा इंप्रेशन जरुर दें कि मोबाइल की सारी जानकारियां आपके पास सबसे पहले आती हैं। आप चाहें, तो अपनी कल्पनाशक्ति का सहारा भी ले सकती हैं। और कह सकती हैं कि ऐसा जर्नल आफ मोबाइल टेक्नोलोजी में छपा है।
वैसे यह कहां से छपता है, मुझे भी नहीं पता।
सीपी आरपी
देखिये, नये शिष्टाचार की बानगी यह है कि स्टाइल के तहत किसी जगह के पूरे नाम नहीं लिये जाते हैं।
जैसे आपको जाना हो दिल्ली में कनाट प्लेस तो बोलिये सी पी जाना है।
अगर आपको कानपुर में चुन्नीगंज जाना हो, तो बोलिये सीजी जाना है।
उदाहऱण स्वरुप कुछ बातचीत देखिये-बातचीत नंबर-1
हाय कहां से आ रही हो।
सीपी से आ रही हूं, एनपी जाना है।
ओहो एनपी में खरीदारी करना बहुत मुश्किल हो गया है, वहां का क्राउड बहुत पुअर है।
हां, सीपी का क्राउड भी अब वैसा नहीं रहा।
भावार्थ-
सीपी का मतलब कनाट प्लेस और एनपी का मतलब नेहरु प्लेस।
क्राउड का मतलब भीड़ भड़क्के से नहीं होता।
अच्छे क्राउड का मतलब है फूंफां टाइप लोग।
खराब क्राउड का मतलब है बहुत ही लोअर लेवल के लोग, समझो कि जिनके पास मारुति 800 होती है।
बातचीत नंबर टू
सीपी से कल खरीदी ये साड़ी।
अब वहां का लेवल बहुत बेकार हो गया है। मैं तो अब सिंफे या दुफे से ही लाती हूं।
हां, मैं जा नहीं पायी वहां, बफे में ही बिजी हो गयी।
ओ के सी यू तुम न्यूफे में आ रही हो क्या।
नो, मुझे उस टाइम सिफे में रहना होगा।
बाय।
भावार्थ-
सिर्फ अत्यधिक विपन्न लोग ही भारत में शापिंग करते हैं। थोड़े भी ठीक-ठाक लोग अब सिफे या दुफे जा रहे हैं।
सिंफे से आशय सिंगापुर सेल फेस्टिवल,
दुफे से आशय दुबई सेल फेस्टिवल,
बफे का मतलब बर्लिन फेस्टिवल, ,
सिफे से मतलब सिडनी फेस्टिवल,
न्यूफे का मतलब न्यूयार्क फेस्टिवल।
भले ही आप यहां जा पायें या नहीं। पर आपका कर्तव्य बनता है कि आप इन फेस्टिवलों की तारीखों का पूरा हिसाब-किताब रखें, वरना शापिंग डिस्कशन में आप पिछड़ जायेंगी।
नाटी बाय
ओ मन्नू बहुत ही नाटी है।
नो मंशू भी बहुत नाटी चैप है।

भावार्थ-
पहली वाली महिला मनमोहन सिंह के बारे में बात कर रही है।
दूसरी वाली महिला सीनियर नेता मणिशंकर अय्यर के बारे में बात कर रही है।
अर्थात अब पार्टीबाजी के दौरान सीनियर नेताओं को पूरे नाम से बुलाना पिछड़ेपन की निशानी है।
उन्हे नाटी बाय, नाटी चैप कह कर ही पुकारा जाता है।
आप और इंप्रेशन मारने के लिए कह सकती हैं-
पिंटू इस वैरी नाटी बाय।
पिंटू कौन।
अऱे जार्ज डब्लू बुश को हम तो पिंटू ही कहते हैं। बचपन का याराना है ना।
किसी के बारे में सम्मान के साथ बात करने का मतलब है कि आप सत्तरवीं शताब्दी में रह रहे हैं।
एक पार्टी में मुझे एक महिला मिलीं, जो कह रही थीं कि हेंस बहुत परेशान करता है।
बाद में पता लगा कि हेंस से आशय उनके ससुर से था, जिनका नाम हरबंस सिंह था।
इसी पार्टी में एक बालिका दूसरी बालिका से कह रही थी-
मुझे कनफ्यूजन है कि बाब हुम का फादर था या हुम बाब का फादर था।
बाद में मुझे पता लगा कि दोनों बाबर और हुमायूं के बारे में बात कर रही थीं।
इस डिस्कशन के बाद बहस इस बात पर चली कि अक बेहतर था या एमपी।
बहस में हिस्सा लेने के लिए मैंने पूछना चाहा कि अक औऱ एमपी से क्या मतलब है, तो मुझे पता लगा कि अक से मतलब अकबर और एमपी से मतलब महाराणा प्रताप।
मामला बहुत पेचीदा हो गया है। इस नयी ट्रेंड को समझना बहुत जरुरी है। इस हिसाब से पुराने राजा चंद्रगुप्त मौर्य सीएम हो गये हैं और सलीम और अनारकली क्रमश सैम और ऐन हो गये हैं।
इस सबको जो न समझे, वह डिस्कशन मे हिस्सा नहीं ले सकता या ले सकती।
अगर आप पूरे-पूरे नाम लेंगे, तो आपके बारे में समझा जायेगा कि आप निहायत फालतू टाइप के बंदे हैं, जिसके पास बहुत फालतू टाइम है। तब ही तो, आप पूरा का पूरा नाम लेने का टाइम निकाल लेते हैं। बिजी और स्मार्ट बंदे वो होते हैं, जिनके पास पूरा नाम लेने का टाइम नहीं होता।
स्टेट्स में हैं
हर पार्टी में हर दूसरा नहीं, हर पहला बंदा ही कहता दिखता है-मेरे भाई स्टेट्स में हैं।
ऐसे में आप बिलकुल न बतायें कि आपके भाई गंजडुंडवारा में हैं या डूंगरगढ़ में हैं।
स्टेटस चौपट हो जायेगा।
आपका भाई स्टेट्स में अगर छोले बेचता होगा, तो स्टेटस टनाटन माना जायेगा। पर अगर आपके भाई का गंजबासौदा में टाप क्लास शोरुम है, तो भी आपका स्टेटस टाप टनाटन नहीं माना जायेगा।
स्टेट्स से आशय भारत की स्टेट्स से नहीं है। स्टेट्स से आशय युनाईटेड स्टेट्स आफ अमेरिका से है।
जिनके रिश्तेदार आजकल अमेरिका में नहीं हैं, यह उनकी तकदीर का दोष है।
तकदीर के इस दोष को आप झूठ बोलकर खत्म कर सकती हैं।
आप ये करें कि अमेरिका का नक्शा लेकर बैठें और उसमें से अपनी पसंद की स्टेट चुन लें फिर अपने भाई या किसी और रिश्तेदार को वहां सैट करा दें।
एकाध अमेरिकन आइटम किसी चोर बाजार से ले आयें और सबको दिखा दें, इससे अमेरिका में आपके भाई होने की बात कनफर्म हो जायेगी।
यू नो टाइम नहीं है
नये शिष्टाचार के तहत एक झटके से किसी बात पर सहमत हो जाना निहायत पिछड़ेपन की निशानी है।
हर बात में कहना चाहिए-यू नो आजकल टाइम नहीं है। मुझे शैड्यूल देखना पड़ेगा।
टाइम होना आजकल चिरकुटई की निशानी है।
कोई आपसे कहे कि आपसे मिलना है, तो कहिए कि ओ के बीस दिनों बाद फोन पर फिक्स कर लेंगे। मुझे शैड्यूल देखना पड़ेगा।
कोई आपको अपने घर बुलाये, तो कहिए कि टाइम नहीं है, यू नो बहुत बिजी हूं।
लोग ये नहीं पूछते कि किस चीज में बिजी हैं।
लोग मानकर चलते हैं कि आप जो कुछ भी बोलेंगी झूठ बोलेंगी।
सवाल इस बात का नहीं है कि आप झूठ बोल रही हैं। मुद्दा यह है कि आप बिजी हैं। बड़े लोग बिजी होते हैं। ब्रिटेन की महारानी के बच्चों को भी उनसे मिलने की परमीशन लेनी पड़ती है।
यहां ध्यान रखिये कि अगर आप ऐसा कहती हैं कि टाइम नहीं है, तो ऐसा कहने का हक आपको बनता है।
पर अगर कोई और ऐसा कहे, तो आप फौरन कह दें कि देखा कितनी बनती है वो, मिलने का टाइम तक नहीं है।


आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39
रामप्रस्थ गाजियाबाद -201011
मोबाइल -9810018799

2 comments:

Udan Tashtari said...

वाह आलोक जी, आपको रवि रतलामी जी के चिट्ठे पर पढ़ा और अब आपका चिट्ठा. मजा आ गया आपको पढ़कर....बहुत ही सुंदर. अनेकों शुभकामनायें निरंतर लेखन के लिये. बधाई!!

अरुण said...

भई जी घ का प देने का धन मै आ रहा हू ११ बजे