Thursday, May 31, 2007

धांसू समीक्षा कैसे करें-12 मिनट का क्रैश कोर्स




धांसू समीक्षा कैसे करें-12 मिनट का क्रैश कोर्स
आलोक पुराणिक
यह खाकसार बरसों से समीक्षा का एक क्रैश कोर्स चलाता रहा है। 12 मिनट में निम्नलिखित अगड़म-बगड़म को पढ़कर कोई भी सुधी समीक्षक हो सकता है। सारे गुर इस लेख में लेखक ने धर दिये हैं। पेश है क्रैश कोर्स-
समीक्षा से पहले
समीक्षा से पहले यह तड़ें कि अखबार का संपादक, या उपसंपादक, या कैसा भी संपादक, जो आपको किताब दे रहा है, उसकी उस उसके लेखक के बारे में क्या राय है।
गौरतलब है कि गुर नंबर एक यह है कि हिंदी में समीक्षा लेखक की होती है, किताबों की नहीं होती है। हिंदी वाले जीवंत परंपरा के बंदे हैं जी, सीधे लेखक पर फोकस कीजिये। हां, यह समझ लीजिये कि हिंदी में पुस्तक का मतलब होता है, साहित्य की पुस्तक।
जरा तड़िये कि किताबदेयक संपादक की राय लेखक के बारे में क्या है। कई न्यूट्रल से दिखने की कोशिश करने वाले खुल कर नहीं खुलते। ऐसों की गरिमा कायम रखने के लिए कुछ पतली गली के सवाल पूछिये-कविताएं तो ठीक हैं, पर एकाध जगह कुछ ऐसा है, जिसके बारे में सोचना पड़ेगा।
किताबदेयक अगर उखाड़ने वाली समीक्षा चाहता है, तो कहेगा-हां अब क्या करें, यही सब आ रहा है। अब हमारे टाइम वाली बात कहां रही साहब।
इशारा साफ है, उखाड़ना है।
किताबदेयक अगर यह कह उठे कि नहीं भई,एकाध जगह ऐसी कोई बात होगी, बाकी लेखक तो ठीक ही है, थोड़ा सा गौर से देखकर लिखो।
इशारा साफ है, जमाना है।
किताबदेयक अगर यह कह उठे कि देख लेना जैसा भी हो कर देना। पर छोटा करना।
इशारा साफ है कि मामला न्यूट्रल है। लेखक किताबदेयक से नकारात्मक या सकारात्मक संबंध बनाने में कतई विफल रहा है।
वैसे मोटा नियम यह है कि आईएएस अधिकारी (कतिपय मामलों में पुलिस और आयकर अधिकारी भी) दूतावासों के अधिकारी, किसी भी विभाग से सस्ती शराब का जुगाड़मेंट कर सकने में समर्थ अधिकारी, कोई फैलोशिप दिलवाने वाले अधिकारी, मुख्य अतिथि बनाने में सक्षम बंदे, किसी पुरस्कार कमेटी के मेंबरान, संभावनाशील सुंदरियां(जिनकी प्रतिबद्धताओं के बारे में खुले तौर पर कुछ ज्ञात न हो), ये सब जमाये जाने के पात्र हैं।
विपरीत गुट के लेखक, अपने ही गुट के किंचित कम अंतरंग लेखक, टाईम खोटी करने वाले(अर्थात दारुविहीन साहित्यिक गोष्ठियां करवाने वाले), कभी भी आपको किसी पेमेंट वाले कार्यक्रम में न बुलाने वाले लेखक उखाड़े जाने के पात्र हैं।
बाकी सारे लावारिस टाइप के लेखकों के प्रति न्यूट्रल हुआ जा सकता है। चतुर-चौकन्ने-स्मार्ट नौजवानों के प्रति न्यूट्रल हुआ जा सकता है, इनमें से कई आगे संपादक, तरह-तरह के जुगाड़ू बन सकते हैं। काम आ सकते हैं। इस संबंध में समीक्षक को विवेक से काम लेना चाहिए।

तो साहब तय हो गया ना कि क्या करना है, अब हम एक उदाहरण के साथ बात करते हैं। किसी की किताब के पहला पेज देख लें, फिर उसी पर सब कुछ ताना जा सकता है।
अब जैसे किसी कविता की पुस्तक के पहले पेज पर कविता है-
हूं हूं,
फूं फूं,
खौं खौं,
टें
इस कविता की जमाने की समीक्षा-
रचनाएं तो यूं बहुत हो रही हैं, पर इस लेखक ने कविता को नया आयाम दिया है, उससे एक नया कोण खुलता है। यूं इस कविता में शब्द बहुत कम हैं, पर यह कहना ही होगा कि यह कविता कतिपय उन चुनिंदा, बल्कि बहुत ही चुनिंदा, बल्कि यूं भी कहा जा सकता है कि उन अपवादस्वरुप कविताओं में से है, जहां चुप्पी चुप नहीं रहती, चुप्पी बोलती है।
पोलियांस्का के कवि फूंद्रो कासोब्लैंक ने इस तरह की कविताओं में जो महाऱथ हासिल की है, ठीक वही इस कविता में दिखती है। ( कासोब्लैंक जैसे कवियों और पोलियांस्का जैसे देशों को नाम आप अपनी मर्जी से गढ़ सकते हैं, कोई पलटकर नहीं पूछता) लेखक हूं, हूं के जरिये अपने अस्तित्व को रेखांकित कर रहा है। फूं फूं के जरिये वह एक अग्निकामी चेतना का आह्वान भी कर रहा ह। फूं फूं यानी वह फुफकार रहा है। खौं खौं यानी वह सिर्फ आह्वान ही नहीं कर रहा है, वह सीधे एक्शन में उतरने का आकांक्षी है। टें यानी वह इस बीमार, सड़ी-गली व्यवस्था के टें बुलवा कर छोड़ेगा। वाह, वाह।
उखाड़ने की समीक्षा
हूं हूं, यानी मैं हूं, उफ कवि कितना आत्ममुग्ध है, आत्ममुग्ध क्या आत्मरत है। जब समय समाज के सामने ऐसे विकट सवाल खड़े हों, जब पूरी मानवीय चेतना अपनी नियति के साक्षात्कार से जुड़े भविष्यगामी सवालों से भिड़ रही हो, उनसे जूझ रही हो। तब ऐसे में लेखक की ऐसी आत्मरति, न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि दंडनीय भी है। फूं फूं और खौं खौं में तो लेखक अपनी मानवीय गरिमा को खोकर जानवरों के साथ खड़ा दिखता है। टें यानी मृत्यु, ऐसे मृत्युकामी लेखन के प्रति सिर्फ संवेदना नहीं, शोक संवेदना व्यक्त की जानी चाहिए।
न्यूट्रल
(ये लिखी कितनी भी जाये, छोटी कर दी जाती है)
लेखक ने संभावनाएं दिखायी हैं। अलबत्ता उन्हे ढूंढ़ने में मेहनत बहुत करनी पड़ती है। पर उनके लेखन में विशिष्ट किस्म की ऊष्मा है, जो उनके समकालीनों में अनुपस्थित दिखती है। लेखक को अभी बहुत श्रम करना है।
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

11 comments:

arun said...

गुरुजी सीख लिया जरा तीनो तरह से समीक्षा देख ले
१’ बह्त बढिया.शानदार तरीके से लिखा शानदार लेख,आने वाले समीक्षको के लिये गीता बाईबल,कमाल का क्रैश कोर्स बहुत लम्बे समय से प्रतिक्षा थी,जिसकी कमी को आलोक जी ने आज पूरा किया,इस बार उन्हे साहित्य रत्न मिलना पक्का है और पदमश्री के मुख्य दावेदारो मे इस लेख के बाद उनका आना स्वाभविक है
२. जाने दीजीये वो हम लिख कर खुद ही पढ कर अपनी भाषा सुधार रहे है
३.वो आपको याद दिलाना था कि हमारी पोस्ट आपके यहा छपने को भेज रहा हू जरा देख लीजीयेगा

जी गुरुजी बताये सीख गया क्या..?
:) :)

Udan Tashtari said...

गुरु जी,

सीख गये, अभी अगले १२ मिनट में हमारे ब्लॉग पर पधारें...समीक्षा पेश करने जा रहे हैं. :) सच में.

maithily said...

पुराणिक साहब, ये लिखा विखा तो ठीक है पर आप अपने क्रेश कोर्स का अगला बैच कब से शुरू कर रहे हैं?
हम अभी से उसमें नाम लिखवाना चाहते हैं.

maithily said...

बात ये है कि अगर लिखना पढ़ना आता तो समीक्षक ही क्यों बनना चाहते, डायरेक्ट लेखक ही न बन जाते, आपकी तरह.

Pramod Singh said...

हृदयस्‍पर्शी.. हृदयस्‍पर्शी क्‍या कहें, चर्मस्‍पर्शी यत्र तत्र सर्वत्र ही स्‍पर्श करती है.. निर्भर करता है पढ़नेवाले के पढ़वानेवाले संपादक जी से संबंध कैसे हैं.. मेरे अच्‍छे हैं इसलिए इतनी निर्ममता से कह पा रहा हूं.. आप सजगता से सुन रहे हैं ना?

काकेश said...

बढ़िया बात बतायी आपने.. हम तो ना अपने को लेखक समझते ना समीक्षक..तो हम कौन सा क्रैश कोर्स जॉइन करें...

संजय बेंगाणी said...

गुदगुदाने का प्रयाप्त मसाला है.
मजा आया. सीख लिया उस्ताद. कभी आप पर ही आजमाएंगे :)
इसी लिए कहा गया है अपात्र को ज्ञान न दें. :)

विकास कुमार said...

ब्लोग तो यूं बहुत लिखे जा रहे हैं, पर आपने ब्लोग लेखन को नया आयाम दिया है, उससे एक नया कोण खुलता है। यूं इस लेख में शब्द बहुत कम हैं, पर यह कहना ही होगा कि यह लेख कतिपय उन चुनिंदा, बल्कि बहुत ही चुनिंदा, बल्कि यूं भी कहा जा सकता है कि उन अपवादस्वरुप लेखों में से है, जहां चुप्पी चुप नहीं रहती, चुप्पी बोलती है।

धन्य हो गुरुदेव!
ऐसे ही ज्ञान-गंगा बहते रहें।

Vijendra S. Vij said...

12 मिनट का क्रैश कोर्स बढिया और बडा लाभदायक सिद्ध होगा ऐसी उम्मीद है..
बधाई गुरुदेव..:-)

Shrish said...

पोलियांस्का के ब्लॉगर फूंद्रो कासोब्लैंक ने इस तरह के ब्लॉगों में जो महाऱथ हासिल की है, ठीक वही इस ब्लॉग में दिखती है। :)

Ranjana Rawat said...

2007 के बाद वाले पाठकों के लिए पुनः टाइमलाइन पर लगाएँ । ये निवेदन नहीं आदेश है ��