Tuesday, May 22, 2007

किस ब्रांड की धूप



किस ब्रांड की धूप
आलोक पुराणिक
चट गये जी वो ही पालिटिक्स, मीडिया, क्रिकेट, अगड़म-बगड़म लिखकर। मैंने बास को कह दिया कि अब इन पर नहीं लिखूंगा। बास ने काम दिया कि जाओ गर्मी पर लिखो। सो साहब मैं निकल लिया गर्मी पर लोगों से बातचीत करने।
लखनऊ में एक बंदे से पूछा कि बताइए आप गर्मी को किस तरह से देखते हैं। ये तो तेज धूप पड़ रही है, उसे किस तरह से देखते हैं।
वह बंदा मायावती का सपोर्टर निकला।
वह बोला-देखिये, यह सब मुलायम सिंह और अमर सिंह ने कराया हुआ है। इसकी जांच करायी जायेगी। छोड़ा नहीं जायेगा। यह जंगलराज है।
तो क्या आपके राज में धूप नहीं होगी-मैंने पूछा।
वो बोला-नहीं होगी, पर अलग टाइप की होगी। मुलायम सिंह के अपने अमर सिंह थे, हमारे अपने अमर सिंह होंगे।
पर देखिये मैं आपसे गर्मी की बात कर रहा हूं, और आप इसे पालिटिक्स पर ले जा रहे हैं।
यूपी में कोई बात मुलायम सिंह –अमर सिंह के बगैर कैसे हो सकती है-मायावती के सपोर्टर ने बताया।
मैं पालिटिक्स से चटकर मुंबई चला गया। वहां एकता कपूर के एक सीरियल की शूटिंग चल रही थी। मैंने एकताजी से पूछा-इतनी गर्मी को आप किस तरह से देखती हैं।
गर्मी हमारे सीरियलों में होती ही कहां है। हमारे कैरेक्टर एसी कारों से निकल कर एसी घरों में घुस जाते हैं और फिर फेमिली की ऐसी-तैसी में लग जाते हैं। गर्मी कहां से आती है इसमें-एकताजी ने पूछा।
देखिये, आप भारत की नागरिक हैं, भारत में धूप पड़ती है। आप समाज की सचाई को दिखाती हैं, ऐसे में धूप को ना दिखाना कितना सही है-मैंने एकताजी को भारतीयता का हवाला दिया।
ओ के राइट मैं गर्मी को दिखा सकती हूं। मैं दिखा सकती हूं तुलसी का चौथा हसबैंड पांचवी बार जब मरे, तो लू से मर जाये। पर यू सी, लू से डैथ विजुअल नहीं होती। मजा नहीं आता। बंदा कैंसर से मरता है, तो लंबे-लंबे डायलाग झाड़कर टें बोलता है। पर लू में तो झाग डालकर बेहोश हो जाता है। ये सीन कुछ जमता नहीं है। बेहोशी में डायलाग क्या बोलेगा। नो, लू-गरमी सीरियल फ्रेंडली नही है। नहीं चलेगा-एकताजी ने लू को रिजेक्ट कर दिया।
सामने ही न्यूज चैनल थे। एक चैनल में घुसकर मैंने पूछा-सर आप गर्मी-लू को किस तरह देखते हैं। जिससे पूछा था, वह काइम शो बनाने में बिजी था। कुछ सोचकर बोला-यार ये धूप-गर्मी का मामला ठीक नहीं है। धूप निकली हो, दिन निकला हो, तो क्राइम खुलकर नहीं होते। क्राइम खुलकर नहीं होंगे, तो हम प्रोग्राम कैसे बनायेंगे। प्रोगाम नहीं बने, तो टीआरपी कम हो जायेगी। टीआरपी कम हो जायेगी, तो चैनल बंद हो जायेंगे। चैनल बंद हो जायेंगे, तो बेरोजगारी बढ़ जायेगी। बेरोजगारी बढ़ जायेगी, तो राष्ट्र को खतरा पैदा हो जायेगा। इसलिए राष्ट्र के हित में यही है कि धूप ना ही निकले, रात रहे। क्राइम चलते रहें, अंधेरा कायम रहे।
नहीं, हमें हर हाल में क्राइम की सूरत निकालनी चाहिए। हम धूप में भी क्राइम दिखा सकते हैं। जो क्राइम रात में होते हैं, उनका नाट्य रुपांतरण दिन में दिखा देंगे। स्क्रिप्ट यूं हो सकती है-देखिये धूप निकल रही है। लू चल रही है। दिन-दहाड़े धूप निकल रही है। दिन दहाड़े धूप दहाड़ रही है। सावधान, खबरदार, होशियार।
लो जी, धूप में भी रात का खौफ कार्यक्रम शुरु हो लिया।
मैं परेशान होकर अमिताभ बच्चनजी के पास चला गया और पूछा-धूप पर कुछ कहिए।
क्या मैं धूप की माडलिंग कर रहा हूं। मुझे किस ब्रांड की धूप बेचनी है, पहले यह बताइए। अगर मुझे धूप बेचनी ही नहीं है, तो मैं इस पर क्यों बोलू-अमिताभजी ने बहुत बुनियादी सवाल रख दिया।
मैं घबराकर दूसरी तरफ भागा, वहां पब्लिक की बात करने वाले चैनल के लोग भी थे। एक रिपोर्टर ने धूप पर शेर पढ़ा-
सुन ऐ ब्यूटी, धूप में सारे रूप उजड़ जाते हैं
जैसे तमाम तख्तो-ताज जड़ से उखड़ जाते हैं
यह शेर ठेलकर वह एयरकंडीशंड कार में बैठकर निकल लिया।
मैं घबराकर भागा, सामने कुछ अमेरिकन टाइप लोग थे।
मैंने पूछा उनसे -बताइए इस तेज धूप को आप कैसे देखते हैं।
यू सी, ये सब अलकायदा ओसामा बिन लादेन ने किया है। वही सारी गड़बड़ियों की जड़ है-अमेरिकन बोला। वह बुश का सपोर्टर था।
एक दूसरे विदेशी से मैंने धूप के बारे में पूछा, तो वह बोला-इसी पर में ओसामा बिन लादेन का टेप दिखायेगा। मैं हर बात पर ओसामा बिन लादेन का टेप दिखायेगा। वह एक अरबी न्यूज चैनल का बंदा था। उसके टेप में लादेन कह रहे थे-अमेरिकिया धूपिया फैलिया, वर्ल्ड की ऐसी-तैसिया। मैं अमेरिकिया पर बंबिया।
आप ही बताइए कि क्या करुं, बात धूप से शुरु करो, फिर भी घूम –फिर कर पालिटिक्स पर आ जाती है।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-09810018799

7 comments:

Mired Mirage said...

यह पॉलिटिक्स किस चिड़िया का नाम है ? हमसे बात कर सकते थे पर आपको तो......
घुघूती बासूती

yogesh samdarshi said...

धूप के माध्यम से आपने करारा व्यंग्य जड दिया जनाब. वास्तव में जिन लोगों से पूछा वह धूप क्या जाने. यही होता है, इस देश मे चैनल गरीबों की बात करते है, स्टूडियो में बुलाते है प्रोफैसरों को, भरे पेट वालों को. जिनका काम है बोलना हर विषय पर बोलना. मीडिया के लोगों ने अपने कुछ लोग चुन लिये हैं हर विषय मे वह उन्ही की राय लेने पहुंच जाते है. देश क्रिकेट के विश्वकप से बाहर हो गया इस पर सोनिया गांधी जी से टिप्पणी मांगने लगे चैनल, वाजपोई जी की राय दिखाने लगे और आप भी जनाब धूप की जानकारी लेने गांव मे जाते, खेत मे जाते आम जनता से पूछते, किसानों से पूछते पर आपको भी अमिताभ ही दिखे.. आजकल वह वैसे भी बेटा ब्याह कर बैठे है घर मे कारे कारे नैना ठंडी ठंडी ब्याज चला रहे होंगे आप उनसे धूप के बारे में पूछ बैठे अगली बार ऐसा मत करना....
उत्तम आलेख के लिये बधाई स्वीकार करें

Sanjeet Tripathi said...

सटीक!!!

Udan Tashtari said...

बेहतरीन::

सुन ऐ ब्यूटी, धूप में सारे रूप उजड़ जाते हैं
जैसे तमाम तख्तो-ताज जड़ से उखड़ जाते हैं


--अमिताभ के पास तो ब्रांड बताना ही पडेगा-बिना उसके आप गये ही क्यूँ??

अच्छा व्यंग्य है!!

अरुण said...

देखो भैया मुफ़्त की चीज जैसी मिल रही है वैसी ले लो काहे की दान की बछिया के दांत नहि गिने जाते ना,भाई अगर आप बिल देते तो बात समझ मे आती कि आप धूप के बारे मे लोगो कि राय जान कर कोई शिकायत विकायत धूप वितरण बोर्ड से करने वाले हो खामै खा मे बडे लोगो से मिलने तंग करने के बहाने मत ढूढो

संतोष said...

"यू सी, लू से डैथ विजुअल नहीं होती।"
आप के बॉस को भी समझ नही है ऐसी घटिया चीज पर लिखने को कह दिया जिसके कारण होने वाली डेथ भी "एन्ज्वाएबल" नही है।

Shrish said...

भईया बाहर धूप हो तो हमें कंप्यूटर पर बैठे रहने का एक और बहाना भी मिल जाएगा। बोले तो धूप हम ब्लॉगियों के लिए भी फेवरेबल है। :)

"बंदा कैंसर से मरता है, तो लंबे-लंबे डायलाग झाड़कर टें बोलता है। पर लू में तो झाग डालकर बेहोश हो जाता है। ये सीन कुछ जमता नहीं है। बेहोशी में डायलाग क्या बोलेगा। नो, लू-गरमी सीरियल फ्रेंडली नही है। नहीं चलेगा-एकताजी ने लू को रिजेक्ट कर दिया।"

हा-हा, सही है।