Sunday, May 27, 2007

आलोक पुराणिक की संडे सूक्तियां-जब अंधेरा होता है...

आलोक पुराणिक की संडे सूक्ति










वक्त का चेहरा बदल पाना कहां मुमकिन है
वक्त ही सबके चेहरों को बदल देता है



एक हम ही हैं, जो खुद से कभी ना मिल पाये
वैसे जिसका करे मन, हमसे वो मिल लेता है

कितने चेहरे हैं मेरे, किस को कहूं ओरिजनल
एक हंसता ही रहे, दूसरा रो लेता है

अब जो आ ही गये हैं आप, तो झेलें हमको
आप पढ़ते रहें, चिरकुट ये विदा लेता है

पाठकगण प्लीज यह ना सोचिये कि यह व्यंग्यकार पकाऊ शायर हो रहा है। ना जी, यह तो बस यूं ही कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है –टाइप कुछ है।
अब मैं अपनी वाली पर आता हूं

जब अंधेरा होता है
आलोक पुराणिक
यहां बिजली क्यों जाती है-अमेरिका से आये मेहमान एक बुनियादी सा सवाल पूछ रहे हैं।

बिजली क्यों जाती है-यह सवाल तो हमने कभी पूछा ही नहीं। बचपन से जा रही है। हवा क्यों चलती है,हमने कभी नहीं पूछा। बड़े बुनियादी से मसले हैं। नेता क्यों खाता है। बाबू दफ्तर में लेट क्यों आता है। इमरान हाशमी दूसरों की बीबियों को क्यों पटाता है। बुश को दूसरे देशों पर कब्जा करने में क्यों मजा आता है। हमने कभी सोचा ही नहीं।
बस समझिये कि यूं ही चली जाती है-मैंने टालने की गरज से कहा।
यूं ही कैसे चली जाती है। हमारे अमेरिका में तो नहीं जाती। व्हाईट हाऊस में बिजली कभी नहीं जाती।-अमेरिकन बोला।
व्हाईट हाऊस में बिजली चली जाये, तो बहुत प्राबलम साल्व हो जायेंगी। बुश अगर दो-चार दिन काम न करें, तो बहुत भला हो जाये दुनिया का। बुश जब छुट्टी पर जाते हैं, तो शेयर बाजार ऊपर उठ जाते हैं, उनकी अकर्मण्यमता के सम्मान में -मैंने बताया।
जब बिजली जाती है, तो आप लोग क्या करते हैं-अमेरिकन ने पूछा।
तब हम लोग निकल कर देखते हैं कि कहां तक बिजली गयी ही। किसकी गयी है। अगर दूर-दर तक सबकी गयी होती है, तो हम तसल्ली से बैठ जाते हैं कि एक हम ही नहीं अंधेरे में गालिब, जमाने भर में अंधेरा है, टाइप। बड़ी अच्छी सी फीलिंग होती है-कौमी एकता टाइप फीलिंग -मैंने उसे समझाया।
कौमी एकता की सी फीलिंग बिजली जाने से आती है, कैसे-अमेरिकन पूछ रहा है।
जी यूं लगता है कि उसके अंधेरे हमारे अंधेरे, सबके अंधेरे एक से अंधेरे, इस अंधेरे में हम एक हैं। उजालों के मामले में हम भले ही एक न हों, पर अंधेरे हमें एक कर देते हैं। उजाले सबके अलग हैं, तेरा हजार वाट वाला, मेरा सौ वाट वाला। उजाले हमें बांटते हैं। उजाले हमारे बीच खाईयां बड़ी करते हैं। तेरा नियोन वाला, मेरा बल्ब वाला। तेरा चीनी बल्ब वाला, मेरा इंडियन बल्ब वाला। पर अंधेरा सबका एक सा। पूरे शहर में ब्लैक आउट हो जाये, पूरे शहर में बिजली –निरपेक्षता मच जाये,तो मैं एकदम भावुक टाइप हो जाता हूं-मैंने विस्तार से बताया।
जी आपकी बातें कुछ समझ में नहीं आ रही हैं-अमेरिकन बोला।
देखिये आपकी समझ में नहीं आयेंगी, समझदारी की बातें है। बिजली इसलिए जाती है कि दिन में सूरज रहता है। धूप रहती है-मैंने साफ किया।
पर धूप का बिजली से क्या मतलब-अमेरिकन आगे बोला।
देखिये दिन में धूप लूट-पाट, उचक्केबाजी नहीं हो सकती। लोकल उचक्के जो थानेदार को हफ्ता देते हैं, उतने भर की कमाई भी वो नहीं कर पाते। तो वह रात में करते हैं। रात में वातावरण उचक्का-फ्रेंडली बनाने के लिए वो बिजली वालों से बिजली गायब करवा देते हैं-मैंने समझाया।
तो आप बिजली मंत्री से बात कीजिये-अमेरिकन ने बताया।
गठबंधन सरकार में बिजली मंत्री जिस पार्टी से आते हैं,उसी पार्टी के कार्यकर्ता ये उचक्के हैं-मैंने आगे बताया।
ओह टाप टू डाऊन करेंट चल रहा है-अमेरिकन ने कहा।
राइट, अब बात अमेरिकन की समझ में आ गयी है।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-0910018799

4 comments:

अरुण said...

आलोक जी सुर्य के आलोक मे आपने बिजली आने जाने और प्रशासन के सबंधो की बहुत शानदार विवेचना कर डाली,बस गाने की कमी थी वो मै पूरी कर देता हू
"अधेंरी रातो मे,सुनसान बस्ती मे
कुछ सामान उठाने को
ढेरो लोग निकलते है
उन्हे पुलिस सुरक्षा देती है"

विकास कुमार said...

बिजली की बात पे याद आया....कि मेरे गाँव मे आजतक बिजली नही। :(

Laxmi N. Gupta said...

बढ़िया लिखा है, एक दम चकाचक। मेरे गाँव में बिजली आई है लेकिन ज्यादातर लोगों ने नहीं ली है।

Udan Tashtari said...

बहुत सही-जब अमरीकन को समझा लिये हो तो हम तो समझ ही गये. शेर शायरी भी बढ़िया की गयी है. बधाई.