Saturday, May 26, 2007

आम और आदमी








आलोक पुराणिक
पंचायत मंत्री मणिशंकर अय्यर कह रहे हैं कि यह सरकार आम आदमी के लिए नहीं सोचती।
अय्यर साहब ठीक कह रहे हैं- अरे सिर्फ सोचने में क्या जाता है। और सोचे भी नहीं, सिर्फ इतना भर कहने में क्या जाता है कि सोच रही है।
अय्यर साहब पंचायत के काम को देख रहे हैं, सो उन्हे पंचायत करने का शौक हो लिया है। पंचायत से पहले एक बखेडा करना जरुरी है। अय्यर साहब अभी इस स्टेप पर हैं।
पर मसला यह है कि अय्यरजी ने आम आदमी का सवाल उठा दिया है।
बरसों से देख रहा हूं, खास नेता खास तवज्जो न दें, तो नेताओं को आम आदमी ध्यान में आने लगता है। वीपी सिंहजी ने भी यही किया था। आम आदमी से शुरु हुए थे, आजकल पेंटिंग पर पहुंच गये हैं। पेंटिंग वैसी खास वाली, जो आम आदमी की समझ में नहीं आती।
आम आदमी का मामला यही है-समझना मुश्किल है।
मैंने एक से पूछा -भईया आम आदमी के बारे में क्या समझते हो।
वह बोला-भईया आम तो बीस रुपये किलो बिकते हैं, आदमी ना बिकता इस भाव पर। अस्सी किलो के आम के सोलह सौ रुपये देने को ग्राहक तैयार हैं, पर अस्सी किलो के आदमी के सोलह सौ रुपये नहीं मिलते। आम का मामला खास है, उसे आदमी से क्यों जोडते हो। आम और आदमी में एक फर्क यह भी है कि आम को निचोडे जाने का सैट सीजन होता है, पर आदमी की चौबीस घंटे, बारह महीने, सातों दिन निचोडा जा सकता है।
खैर, आम का मसला अलग है, आदमी का मसला अलग है।
पर नेता जब चिंतित होते हैं, तो न आम पर होते हैं, न आदमी पर होते हैं, वह अपने लिए होते हैं। और वे आम पर नहीं, किसी पर भी चिंतित हो सकते हैं। कामरेड कार फैक्ट्री पर चिंतित हो जाते हैं। हिंदुत्व वाले एक पेटिंग पर चिंतित हो जाते हैं।
मैंने एक आदमी से पूछा-आप किस मसले पर चिंतित हैं। कई सारी चिंताएं होंगी आपकी।
नहीं, अब चिंता सिर्फ आटे की होती है। बाकी की चिंताएं कहां से करें। एक में ही सारी ताकत खर्च हो जाती है-एक निचोड़े हुए आम टाइप आदमी ने बताया।
यह भी एक मसला है, आम टाइप आदमी एकाध चिंता ही अफोर्ड कर सकता है।
अय्यर साहब भी अगर आम टाइप आदमी होते, तो सिर्फ आटे पर चिंतित होते।
मंत्री हैं , तो कुछ बहुत कुछ अफोर्ड कर सकते हैं।
देखते हैं कितना असर आम पर पडता है और कितना आदमी पर।
आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

4 comments:

Vijendra S. Vij said...

सही है गुरुदेव...पैनीनजर का कमाल..आलेख जबरजस्त..

अरुण said...

भैया अनार ही आम के बारे मे तपसरा करने का हक रखता है और आम को चूसने निचोडने का हक भी उसी का बनत है ना

काकेश said...

अच्छा कहा आपने "आम को निचोडे जाने का सैट सीजन होता है, पर आदमी की चौबीस घंटे, बारह महीने, सातों दिन निचोडा जा सकता है।" ..और फिर क्यों ना निचोड़ा जाय ... आम आदमी होता ही निचोड़े जाने के लिये ..इसीलिये तो आम आदमी है ..तभी लोग आम समझ के निचोड़ देते हैं ...यदि निचोड़े जाने से बचना है तो आम आदमी से खास आदमी बन जाओ फिर देखो आपको भी निचोड़ने का अधिकार मिल जाता है कि नहीं...

Udan Tashtari said...

आम को निचोडे जाने का सैट सीजन होता है, पर आदमी की चौबीस घंटे, बारह महीने, सातों दिन निचोडा जा सकता है।


---वाह, बहुत खूब, महाराज छा गये. कहाँ कहाँ से विचार लाते हैं भई!!