Wednesday, August 29, 2007
अब नये खोमचे www.alokpuranik.com पर
अब व्यंग्य की दुकान वहीं सजाने की तैयारी हो रही है।
मैथिलीजी (ब्लागवाणी वाले) और उनके पुत्र सीरिल ने इस खाकसार को वर्डप्रेस के कई गुर बताते हुए इस नये खोमचे को सैट किया है। तकनीकी बाधाएं कई तरह की थीं। कई तरह के बवाल और सवाल आये।
लगातार बार एक समस्या यह आ रही थी कि जो थीम सैट की जाती थी, वह अपने आप बदल जाती थी। जीतू भाई, काकेशजी ने सबने तरह-तरह की सलाह-मदद आफर की। पर पिराबलम साल्व नहीं हुई। वही होता रहा, जो थीम सैट करो, सुबह तक बदल जाती थी।
मैथिलीजी कई बार परेशान हुए। बोले-बीसियों वैबसाइट बना लीं, पर ऐसी बेगैरत, बेहया वैबसाइट नहीं देखी, जो कुत्ते की दुम तरह टेढ़ी की की टेढ़ी हो जाती है। मैंने बताया कि मेरी सोहबत का असर है। एक दिन शायद कुछ बहुत ठोंक-पीट हुई है, तो शायद यह अब ठीक काम करे।
अब ठीक काम करे, इसी उम्मीद पर खोमचा शिफ्ट हो रहा है।
मैथिलीजी और उनके पुत्र सिरिल को अभी फाइनल वाला धन्यवाद देना निरर्थक यूं है, कि अभी उनका पीछा छोड़ा नहीं है मैंने। दरअसल यह सब किया -धरा उन्ही का है। तरह-तरह के बवाल , सवाल उनके सामने रोज रख रहा हूं। और वे पूरे धैर्य से उनके जवाब तलाश रहे हैं।(मैथिलीजी के दफ्तर में परम धांसू पेस्ट्री और चाय के साथ तरह-तरह के बवाल-सवाल निपटाये जाते हैं, ब्लागर बंधु इसे नोट कर लें)
एक बात और, मैंने शनिवार और रविवार को मैंने नोट किया कि लोग शायद ज्यादा पढ़ने के मूड में नहीं रहते और खास तौर पर रविवार को तो बहुत कम लोग ब्लाग पढ़ने आते हैं। लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए नया खोमचा संडे को बंद टाइप रहेगा। मतलब संडे को पोस्ट अपडेट नहीं होगी। बाकी छह दिन मंडे टू सेटर्ड सुबह छह बजे तक अपना शटर खुल जायेगा, अगर टेकनीकल पेंच नहीं रहे तो। इस वैबसाइट में जो भी कुछ अच्छा लगे, उसके लिए धन्यवाद, क्रेडिट मैथिलीजी और उनके पुत्र सिरिल को प्रेषित कीजियेगा।
हां जो कुछ चिरकुटात्मक, अगड़म-बगड़म है, उस पर मेरा और सिर्फ मेरा कापीराइट मानकर मुझे बतायें।
सादर
प्लीज नये खोमचे पर रोज आयें।
Tuesday, August 28, 2007
भगीरथ जेल में
(अब तक आपने पढ़ा। भगीरथ भारतवर्ष के जल
देखिये, ये क्या
जी बगैर
भगीरथ मुनि गु्स्से
कई बरसों तक
मां गंगा द्वितीय
जिस पहाड़
वह फार्महाऊस पानी बेचने वाली
गंगा द्वितीय जिस
तब तक
बिसलेरी, खेंचलेरी, खालेरी, पालेरी, पचालेरी, फिनफिन, शिनशिन,छीनछीन
हर
पर भगीरथ
किसी
पर..........।
सारी कंपनियों के बंदों ने
फिर ...........भगीरथ गिरफ्तार
उन पर
1-
2- इस इलाके
3- भगीरथ ने विदेशों
4- पहाड़
5-
गिरफ्तार भगीरथ
लेटेस्ट
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799
Monday, August 27, 2007
भगीरथजी मुनि की रेती पर उर्फ भगीरथ -गंगा नवकथा
आलोक पुराणिक
गंगा
मुनि की रेती पर
छुटभैये
पुलिस वालों की भगीरथ
नगरपालिका वालों ने
भगीरथ ने कहा-साधना
नगरपालिका वालों ने कहा-महाराज परमीशन का यही
भगीरथ ने कहा-मैं
जी
देखिये मैं साधु-संत आदमी हूं, मेरे
महाराज
भगीरथ यह सुनकर
भगीरथ
पर माडलिंग क्या होती है वत्स-भगीरथ ने पूछा।
हा, हा, हा, हा हर
देखिये मैं जनसेवा
गुरु आपका
(जारी कल भी)
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799
Sunday, August 26, 2007
ज्यादा पैसे लेकर भी
आलोक पुराणिक
इ
अपना मानना है कि इंडिया की टीम ऐसे नहीं हारी, उसने अपने ऊपर लगे आरोप का जवाब दिया है। इंडिया की टीम पर आरोप लगता रहता है कि उसके खिलाडी सिर्फ माडलिंग, इश्तिहार पैसे के लिए खेलते हैं। जैसे पवार साहब ने पैसे बढाये, टीम ने हारकर दिखा दिया, लो हम पैसे के लिए भी नहीं खेलते। ज्यादा पैसे लेकर भी हम हार सकते हैं।
वैसे मुझे लगता है कि कपिल देव वाली क्रिकेट लीग का भविष्य एकदम चकाचक है। अगर उसके खिलाडियों को ज्यादा पैसा मिलता है, तो उनके मजे हैं ही। और अगर उसके खिलाडियों को पवार साहब के खिलाडियों से कम पैसा मिलता है, तो कपिल के खिलाडी कह सकते हैं कि हम बेहतर हैं, क्योंकि हम सस्ते में हारते हैं। सो विदेशों में हारने का पहला हक उनकी टीम का बनता है।
मुझे लगता है कि कुछ समय बाद, चार-छह क्रिकेट लीग टाइप संस्थाएं हो जायेंगी, बडी बमचक रहेगी। हर क्रिकेट संस्था वाला अपनी टीम की मार्केटिंग करेगी-रस्ते का माल सस्ते में, हम से हरवाईये, एकदम सस्ते में काम चलाईये। एक मैच हारने की फीस में दो मैच हारेंगे, एक पे एक फ्री।
दिल्ली
इधर सीन
जो मजा पहले पालिटिक्स की जूतम-लात में आता था, अब क्रिकेट की बातों में आता है।
शरद पवार कह रहे हैं कि जो खिलाडी कपिल
खैर, पब्लिक
सबसे ज्यादा आफत विज्ञापन बनाने वालों की होगी। पता लगा कि कोई कोल्ड ड्रिंक वाला पवारजी वाले प्लेयर को पिलाता रह गया और सेंचुरी ठोंक दी कपिलदेव वाले प्लेयर ने।
एक
मैंने कहा-इश्तिहार
वह बुरा सा मान गया-बोला-जी और बेवकूफ बना रहे हैं, आप उन्हे नहीं कहते। सिर्फ हमें कहते हो।
बात में दम है जी। जब सभी बना रहे हैं,तो सिर्फ इश्तिहार वालों से ही क्यों कहा जाये।
आलोक पुराणिक
Saturday, August 25, 2007
भूत नाग ये वाले
खबर है कि शरद पवारजी ने अपनी सांसद बिटिया को सलाह दी है कि संसद में टाइम वेस्ट ना करो, जाओ इलाके में जाकर काम करो।
संसद में नेता ज्यादातर टाइम वेस्ट ही करते हैं, यह पब्लिक तो हमेशा मानती है।
पर नेता कभी-कभार ही मानते हैं। चलो शरद पवारजी मान गये।
इलाके में जाकर नेता टाइम वेस्ट करे, तो पता लग जाता है कि वहां टाइम वेस्ट करना भी आसान नहीं है। बिजली नहीं है, कि सो कर किया जा सके। पानी नहीं है कि नहाकर किया जा सके। हां दारु के ठेके हैं, पीकर किया जा सकता है। खाने का जुगाड़ हो ना हो, पर पीने का जुगाड़ जरुर हो सकता है। पिछले दस सालों में राशन की जितनी दुकानें बंद हुई हैं, उतनी दुकानों से दोगुनी दारु की दुकानें खुल गयी हैं।
पब्लिक के खाने पर सरकार का खर्च होता है, पब्लिक के पीने से सरकार कमाती है।
पब्लिक के लिए मैसेज है-खाने के काम नेताओं के लिए छोडो, पीने का काम कर लो।
खैर मसला यह है कि सरकार जा रही है। नहीं, बच रही है। मार चपर-चूंचूं मची हुई है।
वैसे मैं खुश हूं। इस घपड़चौथ में एक काम अच्छा हुआ है कि टीवी चैनलों से नाग-भूत-प्रेत कम हो गये हैं। उस बिल्डिंग में जाते हुए नाग, इस बिल्डिंग से निकलते भूत टाइप कार्यक्रम टीवी चैनलों पर कुछ कम आ रहे हैं।
उस बिल्डिंग में जाते हुए नेता, उस बिल्डिंग से निकलते हुए नेता-इस टाइप के कार्यक्रम टीवी पर ज्यादा आ रहे हैं।
वैसे टीवी के एक गहरे जानकार का मानना है कि बेसिकली हैं ये भी भूत-नाग ही। यहां से निकल कर वहां चले जाते हैं, करना-धरना इन्हे भी कुछ भी नहीं हैं, सिवाय पब्लिक को डराने के।
अभी कल मिले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, कह रहे थे कि अमेरिका के साथ 123 का डील क्या हुआ, नौ दो ग्यारह होने की नौबत आ गयी।
मैंने कहा जी –बच रहे हो, कि 123 पर नौ दो ग्यारह होने का सीन है। वरना प्याज-धनिया के भावों पर नौ दो ग्यारह होते।
नेता हंसने लगा-बोला प्याज-धनिया के भावों की चिंता हम नहीं करते। प्याज धनिया अब जो अफोर्ड कर सकते हैं, वे उस कैटेगरी के लोग हैं, जो किसी भी चीज के भाव नहीं पूछते। और जो पूछते हैं, वो धनिया और टमाटर को ज्वैलरी की तरह मानने लगे हैं, रोज यूज नहीं करते। ज्वैलरी के भावों पर सरकार आज तक नहीं गयी।
वैसे सोचिये, नेताजी गलत कह रहे हैं क्या।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799
Friday, August 24, 2007
साहित्य साधना और पूड़ी छानना एक जैसा ही है
आलोक पुराणिक
(कल आपने पढ़ा कि किस तरह प्रख्यात पूड़ी
पर साहित्य प्रेम यूं ही कहां जाता है साहब।
अरे यह तो बताना रह ही गया कि फत्तेमलजी की दुकान का नाम ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला क्यों पड़ा।
हुआ यूं साहब, कि फत्तेमल के पिताजी के गांव उखर्रा से जग्गोप्रसाद जी आगरा आये और उन्होने खोला उखर्रा पूड़ी सेंटर। दुकान चल निकली, जग्गोप्रसाद जी अपनी सफलता को कुछ यूं बताते थे कि-बड़े शहरों में लेडीज लोग घर में सिर्फ कलेश करती हैं, खाने-पीने का काम बाहर करती हैं।
कलेश बढ़ता गया, पूरी का कारोबार बढ़ता गया।
जग्गोप्रसादजी के उखर्रा स्थित एक पड़ोसी ने आगरा जाकर ठीक उनकी दुकान के बगल में दुकान खोली-डबल उखर्रा पूड़ी सेंटर।
जग्गोप्रसादजी के पड़ोसी भी कालांतर में जग्गोप्रसादजी की उस स्थापना से सहमत हुए कि बड़े शहरों में लेडीज लोग घर में सिर्फ कलेश......।
वह भी चल निकला। वह भी जग्गोप्रसादजी की स्थापना से सहमत हो गये।
खैर, साहब बात मैं आपको यह बता रहा था कि मुझे ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला सम्मान मिला है।
फत्तेमलजी से मेरा परिचय तब का है जब मेरे घर वालों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया था-कुसंग के आरोप में। तब मैं भी आधुनिक कवियों की सोहबत करता था। फत्तेमलजी मुझे पूड़ी खिलाते थे और मैं उनके बही-खाते देखा करता था। फत्तेमल आश्वस्त थे कि कोई कवि टाइप आदमी खातों में घोटाला कर नहीं सकता था। इसके पीछे उनकी थ्योरी यह
थी कि खातों में घोटाला करने के लिए जितनी अक्ल की जरुरत होती है, उतनी भर कवि के पास होती, तो सुसरा कवि काहे को बनता।
खैर, साहब मुझे सम्मान जिस समारोह में मिला, उसमें फत्तेमल ने अपना भाषण कुछ यूं पढ़ा-
-आलोक पुराणिक को ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला सम्मान देते हुए हमें हर्ष है कि पूड़ियों की परंपरा में
आलोक पुराणिक की प्रतिभा को हमने पहचान लिया था, जब इनके घरवालों ने इन्हे घर से बाहर निकाल दिया था, तब उन्हे सहारा किसने दिया, पूड़ी ने। साहित्य के इतिहास में यह बात दर्ज होनी चाहिए कि जब साहित्य लड़खड़ाया है, या साहित्यकार लड़खड़ाया है, उसे किसने सहारा दिया है पूड़ी ने। आलोक पुराणिक ने हमारी दुकान की पूड़ियां खाकर जो लिखा है, वह आपके सामने है। वैसे हमारी दुकान की पूड़ियां भी आपके सामने हैं- एकदम खस्ता, करारी, ताजी, एक बार सेवा का अवसर जरुर दें।
खैर जी मैं तो पहले ही पहचान गया था कि आलोक पुराणिक बहुत बड़े लेखक बनेंगे, तब ही जब ये हमारी दुकान पर पूड़ी खाते थे, खाते-बही संभालते थे और कभी-कभार कड़ाही से पूड़ियां छानकर निकालते भी थे। आज आलोक पुराणिक को याद हो न हो, एक दिन जब ये पूड़ियां छान रहे थे, कुछ पूड़ियां ऊपर थीं, कुछ नीचे थीं। मैंने इनसे कहा, देख लो वो नीचे वाली पूड़ी फाइनली छुन्न से एकदम ऊपर आ जायेगी। इन्होने आश्चर्यचकित होकर पूछा-आपको कैसे पता। तो मैंने बताया कि ऐसे ही थोड़े ही छान रहे हैं इतने सालों से पूड़ी। पूड़ी छानने से वह अंतर्दष्टि पैदा हो जाती है, कि बंदा यह तड़ लेता है कि कौन सी पूड़ी ऊपर आयेगी और कौन सा लेखक छुन्न से ऊपर आ जायेगा। आलोकजी ने बाद में मुझसे कई बार कहा-फत्तेमलजी आप तो हिंदी साहित्य की आलोचना में आ जाओ, बहुत भला होगा। पर पूडियों ने फुरसत नहीं दी मुझे। हां कोई विश्वविद्यालय बतौर गेस्ट लेक्चरर बुलाना चाहे और पूड़ीकला और आलोचना के संबंधों पर मैं बोल सकता हूं। यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि पूड़ी संसार का कोई भला इस कदम से भले ही न हो, पर साहित्य आलोचना का भला जरुर हो जायेगा।
आखिर लेखन है क्या, पूड़ी छानने जैसा ही काम तो है।
लेखन प्लाट जुटाता है, पूड़ीवाला आटा जमाता है। लेखक घुमाता है पाठकों को, स्टोरी को, पूड़ी वाला बेलन घुमाता है पूड़ी के आटे पर। मुझे बताया गया है लेखन तपता है कि अनुभव की आग में, पूड़ी तपती है गैस सिलेंडर की आग में। कुछ लेखक नीचे ही रह जाते हैं, कुछ पूड़ियां भी नीचे रह जाती हैं। कुछ लेखक एक झटके से उछल कर सबसे सामने आ जाते हैं, जैसे एकाध पूड़ी उछलकर कड़ाही से बाहर आ जाती है। पूड़ी छानने वाला चाहे तो किसी पूड़ी को अपने आप उठाकर ऊपर ले आता है। जैसे कोई आलोचक चाहे तो अपने गुट के राइटर को उठाकर ऊपर ले जाये। पूड़ी वाला चाहे तो किसी पूड़ी को कच्चा कह कर बाहर रख सकता है, आलोचक भी किसी राइटर को कच्चा घोषित करके एकदम बाहर घोषित कर सकता है। तो इस तरह से हमने देखा कि पूड़ी और लेखन में बहुत कुछ समानता है।
खैर साहब पुरस्कार तो मिल गया है मुझे, पर एक मसला और यह है कि सत्तोमलजी कबाड़ी जी ने संदेश भिजवाया है कि वह भी मुझे सम्मानित करना चाहते हैं। पर उनकी शर्त यह है कि पूड़ी सम्मान की परंपरा में मुझे पुरस्कार भाषण में लेखन और कबाड़ में समानता स्थापित करनी होगी।
समानता है, मैं जानता हूं। पर साहब खुले आम दिन दहाड़े कैसे स्थापित करूं।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-09810018799
Thursday, August 23, 2007
जो खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी बुश उर्फ कविता
आलोक पुराणिक
तो साहब मिल गया इस खाकसार को ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला सम्मान। जी साहब यह बहूत धांसू साहित्यिक पुरस्कार है, इसे उखर्रा के वरिष्ठ साहित्यप्रेमी और आगरा में सफल पूड़ी की दुकान चलाने वाले फत्तेमल गुत्थी ने दिया है। गुत्थी फत्तेमलजी का तखल्लुस है, जिसके जरिये वह साहित्य की दुनिया में दखल रखते थे , वैसे थे क्या हैं।
क्यों जी आप हंस क्यों रहे हैं. फत्तेमल पूड़ी वालेजी के साहित्यप्रेम पर।
ये गलत बात है, आईएएस अफसर कवि हो लेते हैं, सब म्याऊं भाव में स्वीकार कर लेते हैं। अगला काम आयेगा।
और तो और हरिराम ट्रेफिक हवलदार को भी कईयों ने कवि घोषित कर रखा है, टाइम-बेटाइम चालान के बदले रकम नहीं वसूलता, दो-चार कवित्त सुना देता है।
और जो ये इनकम टैक्स वाले साहित्यकार हैं, उन्हे भी आप कालजयी साहित्यकार घोषित करने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वो आपका माल बचाने की ताकत रखते हैं।
बस फत्तेमलजी को आप नहीं मान रहे हैं ना।
वैसे,फत्तेमलजी बचपन से साहित्य प्रेम रखते थे, पिताजी की पूड़ी की दुकान थी।
पिताजी ने कह रखा था –पूड़ी में घाटा न हो, तो एकाध ऐब बेटा पाल सकता है, सिगरेट, सिनेमा से लेकर लेखन तक।
और साहब फत्तेमल जी ने क्या रिजल्ट दिये। फत्तेमलजी की पूड़ी की दुकान पर हर हफ्ते एक नया बैनर टंगता था, जिसमें उनकी पूड़ी की शान में ऐसे कुछ कवित्त कहे जाते थे-
हो जायें खुश
जो खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी बुश
किसी ने फत्तेमल से कहा कि आप इस तरह से बुश के नाम का इस्तेमाल पूड़ी बेचने में कर रहे हो, बिना उनकी परमीशन के।
इस पर फत्तेमल ने कहा कि बुश चाहें, तो फत्तेमल का नाम यूज कर सकते हैं अपना कोई आइटम बेचने में। फत्तेमल को कोई आपत्ति नहीं होगी।एक कवित्त कुछ इस टाइप का था-
मन में बज उठेंगे धांसू ढोल
जो आप खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी गोल
किसी ने कहा-ये ढोल और गोल की तुकें कुछ ठीक नहीं हैं। इस पर फत्तेमलजी ने जवाब दिया, देखो पूड़ी ठीक होने के गारंटी हम देते हैं, तुकों के ठीक होने की गारंटी नहीं।
कुछ ने कहा, फत्तेमल से कि आप आधुनिक कविता की ओर भी उन्मुख हों, सिर्फ तुक वाली कविताओं में भिड़े रहने में कोई तुक नहीं।
फिर फत्तेमल आधुनिक कविता की ओर कुछ यूं मुड़े-
पूड़ी, गोल तुम भी
और दुनिया भी गोल
गोल-गोल चक्र में घूमता धूम्र वलय
वलय से गुजरती हुई ट्रेन
ट्रेन का धुआं,
धुएं में सोचता मैं कि मैं धुआं हूं या धुआं फत्तेमल हो गया है
इस तरह की कविताओं को आधुनिक कवियों ने बहूत सराहा। बल्कि आधुनिक कवियों का गोष्ठी केंद्र बन गयी उनकी पूड़ी की दुकान। बाद में हुआ यूं कि कविगण पूड़ी भी खाने लगे। फत्तेमल के पिताजी को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। पर और बाद में यूं हुआ कि कविगण पूड़ी उधार खाने लगे।
यह बात फत्तेमल के पिताजी को नागवार गुजरी और उन्होने आधुनिक कविता को खारिज कर दिया। इस तरह से फत्तेमल के पिताजी उन आलोचकों की श्रेणी में खड़े हो गये, जिन्होने आधुनिक कविता को मान्यता देने से इनकार कर दिया था।
(जारी रहेगा कल भी )
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

