Monday, May 7, 2007

शेर और बकरी की नयी कहानियां

शेर और बकरी
आलोक पुराणिक
मसला डिफरेंटात्मक हो गया है।
पुरानी कहावतों के नये मायने बच्चे तलाश लाते हैं, उन्हे समझाना मुश्किल हो गया है।
शेर और बकरी एक ही घाट पे पानी पीते थे-इस कहावत के कई आशय मेरे छात्रों ने यूं लिखे हैं-
आशय नंबर एक-शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते थे, इसमें यह नहीं बताया गया है कि पानी पीने के बाद बकरी का क्या हुआ।
जैसे कोई यह कहे कि इस इलाके में सारे वोटर एक ही बूथ पर वोट डालने जाते थे, सिर्फ इसीसे तो यह पता नहीं चल जाता कि सब मामला चकाचक था।
शेर और बकरी एक घाट पर पीने पीते हों, फिर बकरी शेर के पेट के अंदर के घाट पर पायी जाती हो। कहावतकार इस पर मौन है। इसलिए इस कहावत से कुछ साफ नहीं होता।
फिर इसका एक मतलब और हो सकता है कि शेर का कब्जा अपने घाट पर पक्का ही हो। बकरी के घाट पर कब्जा करने की नीयत से वह कभी-कभार बकरी के घाट पर भी आ जाता हो। बकरी चुप्पा-चुप्पी में कुछ बोल न पाती हो। कहावतकार ने ऐसा ही कोई सीन देख लिया हो, कह दिया हो कि देखो, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पी रहे हैं। अऱे भईया यूं भी तो कह सकते थे कि शेर बकरी के घाट पर कब्जा करके उसका पानी भी पी रहा है।

आशय नंबर दो-शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं, इसका मतलब है कि शेर को इस तरह से बकरी से साथ एक ही घाट पर पानी पीने में कुछ फायदा है। शेर और बकरी एक ही घाट पर साथ-साथ पानी पीने तब ही आते हैं, जब शेर की मजबूरी हो। वरना शेर बकरी से सिर्फ एक ही रिश्ता रखता है, खाने का। साथ पीने का मामला बहुत मजबूरी का है।
हो न हो, मीडिया को दिखाना होगा। कौमी एकता या ऐसा ही कोई समारोह चल रहा होगा। जिसमें फोटो सेशन होना होगा। शेर बकरी के साथ फोटू खिंचाने आ गया होगा। कुछ मौकों पर शेर को जरुरी होता होगा, ऐसी फोटू दिखाना।
यह फोटू दिखाकर शेर किसी इंटरनेशनल बकरी राइट्स एनजीओ से ग्रांट खींच सकता है, बकरी राइट्स की सुरक्षा के लिए।
यह फोटू दिखाकर शेर मीडियावालों को जब-तब बता सकता है कि जंगल में सब समान हैं। फोटू देख लो।
और तो और,बकरी दिवस मनाने के लिए शेर तमाम इंटरनेशनल संगठनों से पैसे खींच सकता है।
इस सबके लिए यह वाली फोटू काम आयेगी।

आशय नंबर तीन-हो सकता है कि शेर तो शेर हो, पर जिसे बकरी समझा जा रहा हो, वह भी शेर हो। बकरी की खाल ओढ़ कर आ गया हो।
कोई सच्ची की बकरी शेर के साथ पानी पीने को राजी न हुई हो।
बकरी के साथ फोटू खिंचाना जरुरी हो। ऊपर से आर्डर आ गये हों कि हर शेर को और बकरी खाने का लाइसेंस तब ही मिलेगा, जब वह बकरी के प्रति दयालुता दिखाने के लिए बकरी के साथ-साथ फोटू खिंचायेगा।
कोई बकरी यह फोटू खिंचाने के तैयार नहीं हुई हो, तो फिर कोई शेर खुद ही बकरी बन गया हो। बकरी की खाल ओढ़ने वाले शेर सच्ची की बकरी से भी ज्यादा बकरी लगते हैं।
ऐसा बकरीपना मचाते हैं कि सच्ची की बकरी भी शरमा जाये।
ऐसी बकरी तो शेर के साथ खड़ी होकर बयान तक दे सकती है कि शेरों के चलते ही उनका अस्तित्व बचा हुआ है। शेर न हों, तो बकरी भी न हों। शेरों का पूरा जीवन बकरियों को ही समर्पित है। शेरों के प्रति आभार, धन्यवाद ज्ञापन टाइप की बातें।
थैंक्यू की ऐसी विकट गचागच कि सच्ची की बकरियां शरमा जायें कि ऐसी बातें तो हमने सबसे स्मार्ट बकरे के बारे में भी कभी नहीं कीं, जैसी ये इस शेर के बारे में कह रही है।
पर किसी सच्ची की बकरी की हिम्मत नहीं होती कि वह खंडन कर दे।
बयान वही, जो शेर दिलवाये।
खंडन वही, जो शेर करवाये।
शेर की तरफ से तो शेर है ही, बकरी की तरफ से भी शेर ही।
शेर बकरी-हित में काम नहीं कर रहा है,यह बात कहने की हिम्मत किसी बकरी में है क्या।
अजी छोड़िये, जिस दिन यह बात कहने की बात बकरी में आ जायेगी, वह बकरी न होकर शेर हो जायेगी और फिर एक दिन देर-सबेर शेरों की जमात में जाकर शेरों जैसे ही बकरी-ऐसीतैसीकरण में जुट जायेगी।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-9810018799

11 comments:

Pankaj Bengani said...

स्वागत है आलोकजी,


:)


वैसे आप तो बहुत ही बोल्ड निकले. चिट्ठे में ही मोबाइल नम्बर तक जारी कर दिया. :)


वैसे यह सब चिजे इस तरह से सार्वजनिक करना कभी कभी खतरनाक सिद्ध हो सकता है.

अरुण said...

आलोक जी ये पुरानी बाते है बडा मुश्किल है टिपियाना अगर बकरियो की तरफ़दारी की तो शेरो से कौन बचायेगा,और अगर शेरो की तरफ़ से बॊला तो ये बकरिया पुराने नमाने की नही है कैमरे पर मेरी ऐसी तैसी कर देगी जो मैने सोचा नही उस पर सफ़ाई माग ली जायेगी ढेर सारी एन जी ओ उनके समर्थन मे होगी शेरो के साथ नही भाई नही भगवान ऐसे बुरे सपने दुशमन को भी न दिखाये
अपन को कोई लेना देना नही अरे हमने तो पढा ही नही,

आशीष श्रीवास्तव said...

आलोक जी,

नया चिठठे का स्वागत है। आपका प्रपंचतंत्र बंद क्यों हो गया ? उसे भी जारी रखीये !

कामगार-श्रमिक said...

नेट पर सीधे मुखातिब होने के लिए शुक्रिया ... अमर उजाला के बाद पहली बार आप से रू ब रू हूं... हां लेख तो पढ़ता रहा

गिरीन्द्र नाथ झा said...

आपके लेखों का मुरीद हूं..जहां मिलता है पढ्ने में लग जाता हूं. ब्लाग की दुनिया में देखकर मजा आ गया...अब तो भेंट होती रहेगी..
आपका
गिरीन्द्र्
www.anubhaw.blogspot.com
9868086126

Rajesh Roshan said...

Swagat hai aapka. हां !! अब आएगा मजा । ये है ब्लॉगर वर्ल्ड । Spiderman कि तरह लोग यहाँ उछल फान्द करते रहते हैं । अब जरा आपकी भी बाजिगारिया देखने को मिलेंगी

Shrish said...

शेर बकरी कथा का अच्छा पोस्टमार्टम किया है। :)

विशेष said...

स्‍वागत आलोक जी

Arvind said...

आलोक जी,
आपने एक एंगल तो छोड ही दिया. हो सकता है शेर दर असल शेर ही न हो बल्कि कोइ धोखेबाज़ बकरी ( या बकरा )हो, और अपने मुँह पर कोइ नक़ाब पहन कर आया ( आयी)हो.

दूसरी ओर यही बात बकरी पर भी लागू होती है. बकरी दर असल बकरी न होकर कोइ और शेर या शेरनी हो सकती है. वो शेर को धोखा देने की नीयत से आयी हो सकती है.

एक नया एंगल और भी है. शेर कोइ एम पी शेम पी हो सकता है. वो कबूतर बाज़ी कर रहा होगा.


और अंत मेँ: स्वागत है, चर्चा होगी.
अरविन्द चतुर्वेदी
http://bhaarateeyam.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत सही!!

शेर/बकरी की कथा को प्रणाम.

Piyush said...

बहुत बढ़िया...
लेकिन,मोबाइल नंबर जारी कर पचड़े में फंस सकते हैं आप