Sunday, July 8, 2007

आलोक पुराणिक की संडे सूक्ति -नेता घंटा ही होता है

संडे सूक्ति-नेता घंटा ही होता है
नेता उर्फ घंटा
आलोक पुराणिक
एक वरिष्ठ साहित्यकार से मैंने पूछा कि मेरा साहित्य में क्या स्थान है।
उसने कहा-घंटा।
मैं खुश हुआ, घंटा कित्ता भी सस्ता हो, कुछेक सौ रुपये का तो आता है।
अपन तो अपना स्थान दो कौड़ी का मान कर चल रहे थे।
साबजी मामला दो कौड़ी का नहीं है अपना, घंटे का है।
खैर जी खोपड़ी घंटे पर दौड़ पड़ी। कुछ घंटा सूक्तियां निकली हैं।
घंटा जैसा कि सब जानते हैं, बहुत उपेक्षित रहा है। बड़े-बड़े साहित्यकारों ने ना जाने कौन –कौन से विषयों पर कलम चलायी है, पर घंटे पर किसी का ध्यान नहीं गया। पर इस उपेक्षा से घंटे का कुछ नहीं बिगड़ा, घंटा घंटा ही रहा।
घंटा आम तौर पर मंदिरों में पाया जाता है। नेता लोग मंदिरों में घंटा चढ़ाते पाये जाते हैं। वैसे चंबल घाटी के पुराने मंदिरों में पुराने डाकू भी घंटा चढ़ाया करते थे और करते हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि घंटा नेताओं और डाकुओं के बीच एक एकता सी स्थापित करता है। वैसे घंटे के बगैर भी इन दोनों में काफी एकता दिखायी पड़ती है। पर हम बात घंटे की कर रहे हैं।
नेता और घंटे में बहुत समानता है।
दोनों ही बजते हैं। सिर्फ बजते हैं, इनसे कुछ ठोस प्राप्ति की उम्मीद व्यर्थ है।
घंटा इधर से उधर जाता है।
नेता भी एक इलाका छोड़कर दूसरे इलाके में चला जाता है।
घंटा इधर से उधर जाये, तो भी सिर्फ बजता ही है।
ऐसे ही नेता भी इधर से उधर जाये, तो सिर्फ बजता है।


घंटा चाहे कित्ती ही स्टाइल कर ले, ऐसे एंगल से वैसे एंगल तक जाये, सारे पेंच-पैंतरे दिखा ले, तब ही सिर्फ और सिर्फ बजता ही है।
यही हालत नेता की है, चाहे वो कित्ता ही फूं फां कर ले, ऐसी स्टाइलबाजी से लेकर वैसी स्टाइलबाजी तक कर ले, पर वह अंतत बजने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता।
बल्कि घंटा एक मायने में बेहतर है कि घंटे पर आजतक ये आरोप नहीं लगे कि उसने चारा घोटाला कर दिया, या भाईचारा घोटाला कर दिया।
खैर बात हम घंटे की कर रहे हैं कि लेखकों ने घंटे के साथ न्याय नहीं किया। मुहावरों में भी खतरे की घंटी बजती है, घंटा नहीं। अरे खतरे का घंटा क्यों नहीं बज सकता है। एक हास्य कवि का इस बारे में कहना है कि खतरे की घंटी इसलिए बजती है कि मुसीबत पुल्लिंग नहीं, स्त्रीलिंग होती है। वैसे यह जवाब बहुत घटिया है और महिला विरोधी है, पर चूंकि मुझे भविष्य में टीवी पत्रकार बनना है, इसलिए मैं जानता हूं कि घटिया चीजें टीआरपी देती हैं, और बाद में माफी मांगकर सब कुछ रफा-दफा हो जाता है। बल्कि अब तो माफी भी नहीं मांगनी पड़ती। जब तक माफी मांगने की नौबत आये, कोई ज्यादा घटिया आइटम सामने आ लेता है।
खैर, घंटा कैसा भी हो, प्रगतिशील होकर ऊपर पहुंच जाता है, और ऊपर लटक जाता है।
नेता का भी यही हाल है, कैसा भी हो, प्रगति करता है और ऊपर पहुंच जाता है और जनता के ऊपर लटक लेता है।
हमारी नानी एक कहावत कहा करती थीं- ना बाबा आयें ना घंटा बाजे। यानी प्राचीन काल में घंटा बजाने की गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी और घंटा भी बाबाजी ही बजा सकते थे।
बाबाजी ना आयें, तो घंटा नहीं बजता था।
तब के बाबाजी भी सिर्फ घंटा बजाकर संतुष्ट हो जाते थे। अब के बाबा सिर्फ घंटे तक सीमित नहीं रहते। कई मामलों में वे खुद घड़ियालधर्मी हो जाते हैं, और मठ-मंदिर-आश्रम सबकुछ पचा जाते हैं।
फिर अब सीन थोड़ा अलग टाइप का है। बाबाजी भी आ जाते हैं, घंटा भी होता है। पर मंदिरों में पब्लिक नहीं होती है, वह जाने कौन-कौन से टीवी सीरियल देख रही होती है।
घंटे को लेकर बाबाजी लोग बैठे रहते हैं और परेशान हो जाते हैं। इसलिए कई बाबा तो बाबागिरी को छोड़कर नेतागिरी में निकल जाते हैं। तो कहने का मतलब यह है कि घंटा किसी न किसी तरह से बाबागिरी और नेतागिरी के बीच पुल साबित होता है।
घंटे के और भी कई आयाम होते थे । जैसे एक होते थे गुरु और एक होते थे गुरु-घंटाल। सिर्फ गुरुओं से काम नहीं चलता था, घंटे वाला गुरुओं की जरुरत होती थी। बजना मांगता है साब।

जो बजता है साब, उसी का खोमचा सजता है। गुरु-घंटाल के मुहावरे से हमें यही शिक्षा मिलती है।
आलोक पुराणिक, मोबाइल-9810018799

8 comments:

Udan Tashtari said...

इस तरह से हम देखते हैं कि घंटा नेताओं और डाकुओं के बीच एक एकता सी स्थापित करता है। \\\---क्या बात कही है.

--आप टी वी पत्रकार बनें, शुभकामनायें. बहुत गज ढ़हाये हुये हो, टी वी के प्रति साहनभूति.

अरुण said...

ये समीर जी का भी कुछ करो गुरुदेव,हर घंटे आ कर हर एक का घंटा बजाकर निकल लेते है.

संजय बेंगाणी said...

खुब बजाया आपने..घं...

Sanjeet Tripathi said...

घंटे घंटे पर आपने घंटा बजाकर सुनाया घंटनाद!!

Shastri J C Philip said...

गजब का sataire है! कार्टून भी गजब के लगे. कहां से जुगाड लाये? बहुत अच्छा चुनाव किया है.

Dhyanendra said...

आलोक सर
क्या कहूँ॰॰॰ घंटे की कहानी सुनकर हर घंटा झूम उठा॰॰
आपके लेखों में गज़ब के दृश्य हैं॰ बेहद नैसर्गिक आपके लेख पाठक को पूरी तरह उद्वेलित करते हैं॰
ईशवर से प्रार्थना है कि आपकी ये मजबूत धार हमेशा यूँ ही बनी रहे॰॰

आमीन

विनोद पाराशर said...

आलोक जी,अभी तक साहित्यकारों ने ’घंटे’ को उसका उचित सम्मान नहीं दिय़ा था,आपने वह कमी पूरी कर दी.इस घंटे को लेकर ऎसे घूमें कि बडे-बडे नेता,बाबाओं की घंटी बजा दी.

Dharmendra said...

Alok ji mujhe aisa lagta hai ki aap brhamand ki kisi bhi vastu ke dukh-dard ko samajh sakte hai aur uska vyakhayan kar sakte hai. Aagle bar kis ka number hai.