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Wednesday, July 18, 2007

मन के मैल का वाशिंग पाऊडर उर्फ छोटी लुच्चई

मन के मैल का वाशिंग पाऊडर उर्फ छोटी लुच्चई
आलोक पुराणिक
सामने उन्तीस ब्रिटिश पौंड का चेक पड़ा है यानी दो हजार रुपये से ज्यादा की रकम। यह रकम मैंने गरीबी से कमाई है। एक इंटरनेशनल शोध संगठन ने भारत में गरीब बच्चों पर रिपोर्ट जारी की थी। एक विदेशी मीडिया हाऊस ने इस पर मेरे विचार चाहे थे, जो मैंने करीब सौ शब्दों में व्यक्त किये थे। गरीबी इतने चकाचक रिटर्न देती है, पहले पता नहीं था।
गरीबी से कमायी गयी दो हजार रुपये की अमीरी में मैं अपराधबोध और शर्म में डूब ही रहा था कि एक सीनियर प्रोफेसर ने बताया कि वह न्यूयार्क जा रहे हैं, गरीबी पर इंटरनेशनल लेक्चर देने। गरीबी का यह टूर उन्हे करीब दो लाख रुपये से अमीर कर देगा, उन्होने बताया।
उनके दो लाख रुपये के आगे मेरी उन्तीस पौंड की शर्म कुछ कम हो गयी।
शर्म से पार पाने का यही सही फंडा है आजकल।
किसी की जेब काटने का अपराध बोध हो, तो वह खबर पढ़ लेनी चाहिए कि लुटेरों में माल लूटकर हत्या भी कर दी।
मन हल्का हो जाता है, देखो, हम कितने करुणावान, किसी की जान नहीं लेते।
चारे में रकम खाने की शर्म परेशान कर रही हो, तो वह खबर पढ़नी चाहिए, जो बताती है कि नेताजी गरीब बच्चों के दूध के लिए रखी गयी रकम खा गये।
मन का मैल कम हो जाता है। अपने बारे में पावन विचार उठने लगते हैं-हाय हम कितने दयालु बच्चों को नहीं मारते।
यह तरकीब मुझे इनकम टैक्स विभाग के एक चपरासी ने सिखायी थी।
रिश्वत लेते हुए वह बताता था-जी हम तो लाख दरजा अच्छे हैं, उस वाले सरकारी अस्पताल को देखिये। वहां पोस्टमार्टम विभाग के चपरासी लाश को हैंड ओवर करने तक के लिए रिश्वत खाते हैं। हम कितने अच्छे, सिर्फ इनकम में से रिश्वत निकालते हैं, लाश से नहीं।
कमीनेपन को विकट घनघोर कमीनेपन के आगे रख दें, यह तरकीब मन के मैल का सर्फ एक्सेल साबित होती है।
खैर प्रोफेसर साहब दो लाख कमायेंगे गरीबी से, मैं सिर्फ दो हजार। यह फर्क है लोकल और इंटरनेशनल का। अमेरिका वाले गरीबी की कदर ज्यादा करते हैं।
गंजबासौदा के एक कालेज से व्याख्यान के लिए निमंत्रण आया है कि गरीबी पर व्याख्यान दे जाइए। बस से आने-जाने का किराया और दो सौ इक्यावन मानदेय देंगे।
मरभुख्खे, गरीब गंजबासौदा वाले, चले हैं इतनी सी रकम में चले हैं गरीबी पर व्याख्यान सुनने।
गरीबों को गरीबी पर व्य़ाख्यान सुनाना बेकार है जी।
गरीबी पर व्य़ाख्यान सिर्फ उनको सुनाना चाहिए, जो उसे अफोर्ड कर सकें।
एड्स, एड्स के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं-सीनियर प्रोफेसर मुझसे पूछ रहे हैं।
बहुत खतरनाक बीमारी है-मैं बता रहा हूं।
अरे, खतरनाक सबके लिए नहीं है। अफ्रीका में एड्स-इस पर एक रिसर्च पेपर तैयार करो, कनाडा से पांच लाख दिलवा सकता हूं। एड्स का चकाचक सीजन है आजकल।-प्रोफेसर कह रहे हैं।
पर अफ्रीका के एड्स पर कनाडा में पेपर, इसका क्या मतलब है-मैंने प्रोफेसर से पूछा।
अफ्रीका के लोग अफोर्ड कहां कर सकते हैं एड्स पर रिसर्च। अरे रिसर्च वहां के लिए तो की जायेगी, जहां वाले अफोर्ड कर सकते हैं-प्रोफेसर ने कहा।
दोस्तो अब मैं एड्स पर रिसर्च में लग गया हूं, जब कभी अपराधबोध और शर्म में डूबता हूं, तो उन प्रोफेसरों को देख लेता हूं, जो इराक में मरते लोग और लोकतंत्र की विजय नामक विषय पर शोध कर रहे हैं।
मन का मैल मिट जाता है।
आलोक पुराणिक--मोबाइल -9810018799

Monday, July 16, 2007

आई लव यू,, माननीय मुख्यमंत्री के नेतृ्त्व में

आई लव यू, माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में

आलोक पुराणिक

सावन के अंधे को हरा ही हरा ही सूझता है-जिसने भी यह कहावत गढ़ी है, वह कभी किसी जनसंपर्क अधिकारियों से न मिला होगा वरना कहावत रिवाइज कर देता –बात एक ही अकलवाली, जनसंपर्की को परमानेंट हरियाली।

कुछ दिनों पहले एक राज्य सरकार के बहुत सीनियर जनसंपर्क अधिकारी बता रहे थे कि उनके मुख्यमंत्री के शासन में इत्ता ला, इत्ता आर्डर। इतनी बारिश, इतना गेहूं। पर पब्लिक ने नहीं सुनी, चुनाव में सरकार बदल गयी। अब वो जनसंपर्की बता रहे हैं कि नये शासन में इत्ता ला, इत्ता आर्डर। नये शासन में इत्ती लू कम, इत्ती ज्यादा बारिश। साहब, कलेजा चाहिए, इतनी स्पीड से बारिश का क्रेडिट उन वाले मुख्यमंत्री के खाते से ट्रांसफर करके नये शासन के खाते में डालने के लिए। पर जनसंपर्की बगैर हिचक के करता है।

पहले उसका हरा, अब इसका हरा।

एक सीनियर जनसंपर्की से और साबका पड़ा, उसके बेटे की फर्स्ट डिवीजन की बधाई देने गया, तो वह बोल उठा-माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य प्रगति कर रहा है। उसमें मेरे बेटे की फर्स्ट डिवीजन आयी है। यह सब माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हो रहा है। शासन की दूरदर्शितापूर्ण नीतियों के परिणाम स्वरुप हो रहा है।

मैंने कहा –और ये जो बिजली कई हफ्ते फरार रहती है। यह सब भी माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही रहा है। शासन की दूरदर्शिता के परिणाम स्वरुप हो रहा है। सारा शासन दूर ही देखता रहता है। मौका देखकर दूर कहीं जर्मन, फ्रांस निकल लेता है गर्मियों में।

जनसंपर्की खून में मिल जाये, तो बहुत डेंजरस मामला हो जाता है।

मैं कल्पना करता हूं कि तमाम राज्य सरकारों के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पत्नी से अंतरंग वार्तालाप में भी कुछ यूं कहते होंगे-माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य चतुर्दिक प्रगति कर रहा है। नागरिक सुख-शांति से है। ऐसे शांतिपूर्ण माहौल में ही मैं तुमसे कह पा रहा हूं कि तुम कितनी सुंदर लग रही हो, माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में। आई लव यू रीयली, माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में।

अपनी यह कल्पना मैंने एक सीनियर जनसंपर्की को बतायी।

जनसंपर्की हें हें करने लगा। दांत दिखाने लगा।

हें हें, दांत दिखाने का जनसंपर्क में भारी योगदान होता है। राज्य सरकारों की तमाम उपलब्धियों के जो इश्तिहार छपते हैं, उनमें मुख्यमंत्री, मंत्री भी हें हें –दांत दिखाऊ मुद्राओं में होते हैं।

अभी बुश का फोन था-पूछ रहे थे कि इराक में बहुत थू-थू हो रही है, कुछ करवाओ।

मैंने कहा कि इंडिया से कुछ जनसंपर्कियों को बुलाओ-वो इश्तिहार में बतायेंगे-इराक प्रगति कर रहा है माननीय प्रेसीडेंट के दूरदर्शितापूर्ण नेतृत्व में। जो इराकी बिजली, पानी, दवाई के अभाव में दो-तीन साल में टें बोलते, वो बम धमाकों में एक दिन में निपटकर कष्टों से निजात पा जाते हैं, माननीय प्रेसीडेंट के नेतृत्व में।

बुश बोले-पर मेरे साथ काम करने वालों को बहुत झूठा होना चाहिए।

मैंने बता दिया है कि हमारे जनसंपर्की आपसे बहुत आगे हैं।

बुश तैयार हो गये हैं। चलूं कामर्स मिनिस्ट्री को बता आऊं कि भारत से जनसंपर्की झूठ की आउटसोर्सिंग की विकट संभावनाएं हैं।

आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799

Friday, July 13, 2007

पतली गली की बाईक भावना के पक्ष में

पतली गली की बाईक भावना के पक्ष में

आलोक पुराणिक

गर्मी बढ़ रही ना-उन्होने कहा।

जी बढ़ रही है।

बाइक गर्मियों में बहुत अनकमफर्टेबल सी हो जाती है-उन्होने एक चाबी घुमाते हुए कहा।

अब मेरे कान खड़े हो गये।

मैंने कहा-बधाई नयी एल्टो कार के लिए।

चकराकर उन्होने बताया कि अरे मैंने तो आपको बताया ही नहीं कि मैंने एल्टो ले ली है।

जी मुझे पता है -7979798790879098773 मामलों का अनुभव है कि जब कोई टू व्हीलर वाला अपने स्कूटर या बाइक को अनकमफर्टेबल बताये या कहे कि दिल्ली की सड़कों पर बाइक सेफ नहीं रही या यह कहे कि बच्चे बहुत जिद कर रहे थे कि अब तो कार ले ही लो, या कहे कि बाइक पर फेमिली के साथ जाने बहुत दिक्कत होती थी। तो समझ लेना चाहिए कि अगला एल्टो पर शिफ्ट हो गया है, पहले मारुति 800 पर शिफ्ट होते थे।

कार वाले दो तरह के होते हैं-एक वो जो कार से कार पर शिफ्ट होते हैं। जैसे एल्टो से जेन पर गये। जेन से क्वालिस पर चले गये। क्वालिस से मर्सीडीज पर चले गये, इस तरह की शिफ्टिंग कार समाज का आंतरिक मामला है। वैसे आपसी मारधाड़ कार समाज में भी यूं है कि यहां मर्सीडीज वाला मारुति 800 वाले को ऐसे देखता है जैसे न्यूयार्क वाला युगांडा वाले को देखता है, या जैसे दिल्ली में ग्रीन पार्क वाला मंगोलपुरी और त्रिलोक पुरी वाले को देखता है या मुंबई में नरीमन पाइंट वाला मीरा रोड वाले को देखता है।

यह कार समाज के आंतरिक मसले हैं, इससे मुझे शिकायत नहीं है।

कार पर शिफ्ट होने वाले दूसरे तरह के वो बंदे हैं, जो बाइक से एल्टो या कुछ मामलों में मारुति 800 पर शिफ्ट होते हैं। इनसे मुझे शिकायत है। कार पर जाना अच्छा है। पर बाइक को अनकमफर्टेबल और अनसेफ बताना अच्छा नहीं है। सच्ची बताओ, इस मुल्क में कमफर्ट में कौन है जी, जो सिर्फ बाइक को ही अनकमफर्टेबल बताओ। और इस मुल्क में सेफ कौन है, जो सिर्फ बाइक को ही अनसेफ बताओ।

दिल्ली में लू से मरे, गुजरात में पानी से मरे।

साहबजी, इस मुल्क में मामला सेफ और अनसेफ की चाइस का नहीं है।

मामला ये चाइस का है कि किस तरह से अनसेफ होना पसंद है। हैजे वाली अनसेफ्टी पसंद है या पीलिया वाली। गाजियाबाद में अपहरण की अनसेफ्टी पसंद है या मुंबई में किसी भाई की धमकी की अनसेफ्टी। चाइस यही है।

बताइए, सेफ कौन है। रेलगाड़ी में आईएएस महिला के साथ छेड़ाखानी हो ली।

चाइस इस अनसेफ्टी की है कि गुंडे द्वारा छेड़ाखानी हो या डीआईजी साहब द्वारा।

सेफ कोई नहीं है, तो सिर्फ बाइक को ही अनसेफ क्यों बताओ जी।

वैसे बाइक को गौर से देखें, तो इसमें छिपा देश के विकास का हाल है। बाइक पैदल और कार के बीच का संक्रमण काल है।

बाइक उस मंझोले नेता की तरह से है, जिससे कईयों के कई काम निकलते हैं।

बाइक, फुटपाथ के ऊपर से, सड़क के किनारे कच्चे से, गढ्ढे में घुस कर फिर निकलने, दो कारों के बीच जरा से फासले से ऐसे, वैसे या कैसे भी निकल जाने की खालिस भारतीय जिजीविषा का प्रतीक है।

बाइक इस देश में पतली गलियों से निकालक है। हमारा देश पतली गली प्रधान है। जो कहीं भी पतली गली तलाश लेता है, वही आगे बढ़ जाता है।

बाइक उन कारोबारियों की शुरुआती सिचुएशन का प्रतीक है, जिन्होने नियमों के ट्रैफिक से तमाम पतली गलियां निकाली और आगे निकल गये।

बाइक भावना यह है कि हर बाइक वाला दूसरे बाइक वाले की इतनी चिंता करता है कि दिन में भी अगले की हैडलाइट जली हो, तो उसे हाथ के इशारे से बताता है कि भईया बुझा ले।

परस्पर एक-दूसरे की बत्ती बुझाने की उत्कट अभिलाषा को हमारे समाज की केंद्रीय भावना नहीं कहा जा सकता क्या।

सो कुल मिलाकर मसला यह है कि हे बाइक से कार के प्रयाणकर्ता कार पर जा, बार बार जा, पर जरा मुहब्बत से जा। बाइक को यूं अनकमफर्टत्व और अनसेफत्व के डंडे से पीटते हुए तो ना जा।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Thursday, July 12, 2007

सत्यनारायण कथा-2007

सत्यनारायण कथा-2007
आलोक पुराणिक
मामले डेंजरात्मक होते जा रहे हैं, नये बच्चों को कुछ पुरानी बातें समझाना मुश्किल हो रहा है। एक बच्चे को सत्यनारायण की पुरानी कथा समझाने की कोशिश कर रहा था-एक लकड़हारा था, वह जंगल में लकड़ी में काटने जा रहा था।
बच्चे ने पलट सवाल किया-ये लकड़हारा क्या होगा।
बेटे, वो जंगल में लकड़ी काटने जाते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
ये जंगल क्या होता है-बच्चे ने आगे पूछा।
जंगल समझो कि शहर जब खत्म हो जाता है, तो जंगल शुरु होते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
शहर जब खत्म हो जाते हैं, तो फार्म हाऊस शुरु होते हैं। शापिंग माल शुरु होते हैं। हाई वे शुरु होते हैं। ढाबे शुरु होते हैं। जंगल कहां शुरु होते हैं-बच्चे ने पूछा।
समझो कि हिमालय के पास कहीं के गांव का लकड़हारा था-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।
ये हिमालय क्या होता है। ये आप अंगरेजी में क्यों बोलते हैं, हिमालय की हिंदी क्या होती है-बच्चे ने आगे पूछा।
बेटा हिमालय यानी रेंज आफ हिल्स, ये इंडिया में होती है-मैंने बताया।
मैं अच्छे स्कूल में पढ़ता हूं, हमें अमेरिका के बारे में बताया जाता है। अमेरिका के हिल्स के बारे में बताया जाता है। आखिर सैटल तो एक दिन अमेरिका में ही होना है। हमारे स्कूल वाले इंडिया की चीजों के बारे में पढ़ाने में टाइम वेस्ट नहीं करते-बच्चा बता रहा है।
ये और पेंच है। समझदार बच्चे इधर इंडिया के बारे में समझते ही नहीं है। पेरेंट्स मानकर चलते हैं कि ठीकठाक बच्चा निकला, तो अमेरिका ही जायेगा। इंडिया में थोड़े ही रुकेगा। जो इंडिया में रुक गया, वो वही है, जिसे अमेरिका नहीं तो दुबई, नहीं तो मारीशस तक का वीसा नहीं मिला।
बात में दम है, इसलिए नये बच्चों को सत्यनारायण कथा तो दूर, लकड़हारे तक के बारे में समझाना मुश्किल है। इस खाकसार ने एक नयी सत्यनारायण कथा तैयार की है, सो आपकी सब की सेवा में पेश है।
एक समय की बात है। एक सिलिकौन सिटी बंगलूर में राबर्ट और मारिया और उनका बेटा बर्टी रहता था। ये सभी इंडियन थे, पर अमेरिका में सैटल होने के ख्याल से इन्होने अपने नाम कुछ अमेरिकन टाइप कर लिये थे। सारे समझदार लोग यही करते थे। एक बार की बात है। जैसा कि सारे समझदार बच्चे करते थे, राबर्ट ने भी एक दिन वीसा के लिए अमेरिकन एंबेसी में अप्लाई किया। उसका वीजे की एप्लीकेशन रिजेक्ट हो गयी। एंबेसी से लौटते समय उसने देखा कि एक केले के वृक्ष के नीचे कुछ एक सूट-बूटधारी अपनी जीन्सधारी पत्नी के साथ पूजा कर रहा था। पूछने पर उसने बताया कि उसका वीजा भी पहले अमेरिकन एंबेसी में रिजेक्ट हो गया था। उसने सत्यनारायण भगवान की आराधना की और प्रसाद स्वरुप साफ्वेयर इंजीनयियरिंग में पढ़ने वाले छात्रों में ग्यारह सीडी बांटीं। इसके बाद उसका वीसा क्लियर हो गया।
ऐसे वचन सुनकर बर्टी ने भी मन ही मन संकल्प लिया कि वह भी ऐसा ही करेगा।
उस दिन बर्टी के पापा ने उससे सौ किलो आलू लाने का आदेश दिया, एक स्मार्ट बच्चे की तरह बर्टी सिर्फ नब्बे किलो आलू लाया और दस किलो आलू की रकम अंदर कर ली। आलू चूंकि बहुत महंगे थे, इसलिए बर्टी ने बहुत रकम बचा ली।
उसने केले के पेड़ के नीचे पूजा की और इक्कीस सीडी छात्रों में बांट दीं।
इसके परिणाम आये और अगली बार ही उसका अमेरिकन वीजा क्लियर हो गया। पर, पर, पर, वह जाने से पहले सत्यनारायण कथा करवाना भूल गया।
वह अमेरिका गया और बहुत डालर खेंचे,लौटकर जब वह या तो सूटकेस में बहुत महंगे साफ्टवेयर प्रोग्रामों की सीडी लेकर आया। वह जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरा, एक साधु ने उससे कहा-हे वत्स तेरे सूटकेस में क्या भरा है।
बर्टी ने परिहास करते हुए कहा कुछ नहीं, इसमें कीड़े-मकोड़े हैं, वायरस हैं।
साधु ने कहा-तेरे वचन सत्य हो जायें।
बर्टी ने घर जाकर उन कार्यक्रमों की सीडी को चलाया, तो उनमें वायरस आ गये। सीडी चलीं नहीं।
बर्टी बहुत रोया, परेशान हुआ उसकी बरसों की मेहनत पर वायरस फिर गया।
तब ही उसे साधु की याद आयी। फौरन से उसने केले के वृक्ष के नीचे पूजा-पाठ की, तत्काल वह साधु प्रकट हुआ और बर्टी ने उसके चरणों में पड़ते हुए कहा हे महाराज मुझसे गलती हो गयी।
साधु ने उसे आशीर्वाद दिया, तत्पश्चात बर्टी ने भारत में और तत्पश्चात अमेरिका में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। बोलो श्री............................ की जय।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

Wednesday, July 11, 2007

नेता का शुभ-मंगल,, पब्लिक सावधान

नेता का शुभ -मंगल, पब्लिक सावधान

आलोक पुराणिक
हर समझदार भारतीय को राष्ट्र के प्रति नमन भाव रखना चाहिए,पर महाराष्ट्र के प्रति विशेष नमन भाव रखना चाहिए। इसलिए नहीं कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई प्रीति जिंटा या
आशिया टाकिया रहती हैं, बल्कि इसलिए कि महाराष्ट्र ने पूरे देश के एक विशेष किस्म की समझदारी दी है। यूं तो यह समझदारी मूलत शादी की रस्मों से ताल्लुक रखती है, पर इसे लगभग हर क्षेत्र में विस्तारित किया जा सकता है।
पूरे ब्रहमांड में सिर्फ महाराष्ट्र ही ऐसा इलाका है, जहां
शादी की रस्म के फाइनलीकरण से पूर्व तीन बार चेतावनी दी जाती है-शुभ मंगल सावधान। अगली बार किसी महाराष्ट्रियन शादी में जायें, तो चैक करें।
यानी कि अबे दूल्हे सावधान। दुल्हन सावधान।
दोनों एक दूसरे से सावधान। साहबजी, सूचना का अधिकार और क्या होता है। और ये सावधानीकरण अब से नहीं है, कई शताब्दियों से है।
सावधान की एक कथा यूं है कि शिवाजी के गुरुदेव समर्थ रामदासजी विवाह मंडप तक पहुंच गये थे। विवाह हुआ ही चाहता था कि सावधान सुनकर रामदासजी सावधान हो गये और भाग निकले।

रामदास अगर विवाहित हो जाते, तो समर्थ रामदास न हो पाते।

गुरुवर ने यूं भागकर साफ किया कि समझदार आदमी के पास दो ही चाइस हैं, या तो समर्थ हो रहे या विवाहित। विवाहित तो बहुत हुए, पर समर्थ रामदास ही हुए।।

समर्थ रामदास न होते, तो शिवाजी न होते। शिवाजी न होते, तो महाराष्ट्र न होता, महाराष्ट्रीयन न होते। महाराष्ट्रीयन न होते, तो गोखले, तिलक, लता मंगेशकर, पु. ल. देशपांडे, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और हां, कहने में संकोच होता है, पर कहना पड़ता है कि आलोक पुराणिक भी न होते।

गोखले, तिलक न होते, तो देश आजाद न होता। देश आजाद न होता, तो बहुत दिक्कत हो जाती। देश के बच्चे अमेरिका-इंगलैंड पर अपना झंडा फहराकर नान रेजीडेंट इंडियन कैसे बनते। क्योंकि अगर देश आजाद न होता, तो हम ब्रिटेन के हिस्से होते, बोले तो ब्रिटेन होते। अब ब्रिटेन में ही रह रहे होते, तो अमेरिका, ब्रिटेन जाने के लिए मार क्यों मचाते। अमेरिका ब्रिटेन जाने की मार ना मचाते, तो बताइए प्रख्यात इस्पात कारोबारी लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन क्यूं जाते। मित्तल साहब ब्रिटेन ना जाते, तो बताइए कि ब्रिटेन तक अपना झंडा फहर पाता। नहीं ना।

इससे पता चलता है कि अगर गुरु रामदास सावधान सुनकर ना भागते, तो लक्ष्मी मित्तल का झंडा ब्रिटेन तक नहीं फहरा पाता।

और साहब, सोचिये, गोखले, तिलक न होते, तो देश आजाद न होता। देश आजाद न होता, हम आज भी ब्रिटेन के हिस्से होते। इंडिया अलग न होता, इंडिया की क्रिकेट टीम अलग न होती। न इंडिया की क्रिकेट टीम होती, न हारती, ना ग्रेग चैपल, राइट जैसे विदेश कोचों को रोजगार मिलता।

इस तरह से देखें, अगर गुरु रामदास सावधान सुनकर ना भागते, तो तमाम विदेशी कोच बेरोजगार रह जाते। विदेशी कोचों का शुभ-मंगल, फिर भी हम हारेंगे, सावधान –कहां हो पाता।

शुभ-मंगल सीरिज में यह भी कहा जा सकता है –नेता का शुभ-मंगल, पब्लिक सावधान।

खैर जी, ये बातें तो बड़े लोगों की हैं। हम जैसों का क्या।

हम जैसों के लिए शुभ-मंगल तो कम ही होता है। सो सिर्फ सावधान, बरसात में सब्जियां महंगी हो ली हैं।

वैसे सावधान रहने से भी क्या होता है।

सो चलिये यूं कहें कि काहे का शुभ-मंगल और काहे के सावधान।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Tuesday, July 10, 2007

बांके सिपहिये-लोकल बनाम अमेरिकन

बांके सिपहिये- लोकल बनाम अमेरिकन
आलोक पुराणिक

कल ही एक थोड़ी पुरानी फिल्म देखी-ओंकारा, इस फिल्म में बिपाशा बसु एक गीत में नाच रही थीं और तमाम बांके सिपहिया उनके साथ धुत्त
होकर डांस कर रहे थे। सीन रात का ही था। अभी कुछ दिन पहले जो फिल्म देखी थी, उसमें भी नृत्यांगना कुछ इसी टाइप की शिकायत गाकर कर रही थी कि बांके सिपहिया ने रात भर परेशान किया।
वैसे सोचने की बात यह है कि कमाल का स्टे
मिना है बांके सिपहिया का, दिन में पब्लिक को परेशान करता है और फिर रात में डांसर को परेशान करता है।
और बांके सिपहिया का ऐसा सांस्कृतिक योगदान
सिर्फ समकालीन संदर्भ से ही नहीं जुड़ा हुआ है। बांके सिपहिया के सांस्कृतिक योगदान के ऐतिहासिक संदर्भ भी हैं।
पुरानी फिल्मों के कई गाने हैं, जो बताते हैं, किस तरह से बांके सिपहिया ने जाने क्या-क्या लूट लिया।
ऐसा कोई गीत प्रकाश में नहीं आया, जिसमें किसी मास्टर की, किसी डाक्टर की शिकायत की गयी हो कि हाय उसने परेशान कर दिया। हालांकि परेशान ये भी करते होंगे। पर इंडिया की पब्लिक माइंड नहीं करती। मास्टर ट्यूशन की जबरदस्ती करके परेशान करता है। डाक्टर फर्जी टाइप की दवाएं ठेलकर परेशान करता है, पर पब्लिक झेल जाती है। गीत गाकर शिकायत नहीं करती। पर बांके सिपाही के प्रति पब्लिक यह उदारता नहीं दिखाती, पता नहीं क्यों, यह शोध का विषय है।

अभी खबर आयी है कि कुछ बांके सिपहियाओं ने एक बंदे को इसलिए फंसा दिया कि वह सिपहियाओं की लूटपाट की शिकायत कर रहा था।
सवाल उठता है कि बांका सिपाही कुछ और भी करता है या नहीं, लूटने के अलावा।

नहीं और भी बहुत कुछ करता है, बहुतों को
फंसाने का इंतजाम करता है।
बांके सिपाही दूसरे देशों में भी हैं, लूटते वो भी हैं, पर उनके लेवल अलग हैं।

मुशर्रफ भी बांके सिपहिया ही हैं, पूरे देश को ही जेब में डाल लिया।

अमेरिका के बांके सिपहिया भी लूटते हैं,
पर अपने देश में नहीं। दूर-दूर तक जाते हैं लूटने, इराक, अफगानिस्तान ,पर अपने देश में नहीं लूटते। लूटने का यह फंडा सही है। दूर जाकर लूटो, तो किसी को आबजेक्शन नहीं होता।
पर इंडिया का बांका सिपहिया क्या करे, बाहर कहां जाये लूटने। जहां-जहां जा सकता है, वहां पहले ही अमेरिका के बैठे हैं।

गौर से देखें, तो साफ होता है कि इंडि
या का बांका सिपाही तो जो मिल जाये उसे लूटने में लग जाता है। अमेरिका के बांके इस मामले में सलेक्टिव हैं। जहां पेट्रोल हैं , तेल हैं, वहीं उनकी निगाह जाती है।

अमेरिकी सौंदर्यबोध तेल से आगे नहीं जाता।

कुछ दिनों में अमेरिकन फिल्मों में हीरोईनें गायब हो जायेंगी, हीरोईन की जगह पेट्रोल के कुएं दिखाये जायेंगे।
इतिहास
में पढ़ाया जायेगा कि बहुत पहले भी हेलन के लिए लड़ाई हुई थी और 2006-07 के आसपास भी हेलन के लिए मारधाड़ हुई थी।
हां, 2006-07 में हेलन एक आयल-फील्ड का नाम था।


अगर कहीं पेट्रोल नहीं है, तो अमेरिकन बांका बुरी निगाह नहीं डालता, बुरी क्या अच्छी भी नहीं डालता। वैसे उसके पास अच्छी नजर है भी या नहीं, यह भी शोध का विषय है।
अगर
अमेरिकन बांकों को इंडिया में तमाम ड्यूटियों में लगा दिया जाये, तो कई प्राबलम साल्व हो सकती हैं। एक तो यह कि वो वसूली सिर्फ पेट्रोल पंपों से करेंगे।
इसके अलावा, तमाम डांसर सुंदरियां फिर ये शिकायत नहीं करेंगी कि अमेरिकन बांका सिपहिया परेशान करता है।

आप ही बताइए, अमेरिकन सिपहिया क्यों परेशान करेगा, अगर सुंदरी का नाम पेट्रोल नहीं है तो।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Sunday, July 8, 2007

आलोक पुराणिक की संडे सूक्ति -नेता घंटा ही होता है

संडे सूक्ति-नेता घंटा ही होता है
नेता उर्फ घंटा
आलोक पुराणिक
एक वरिष्ठ साहित्यकार से मैंने पूछा कि मेरा साहित्य में क्या स्थान है।
उसने कहा-घंटा।
मैं खुश हुआ, घंटा कित्ता भी सस्ता हो, कुछेक सौ रुपये का तो आता है।
अपन तो अपना स्थान दो कौड़ी का मान कर चल रहे थे।
साबजी मामला दो कौड़ी का नहीं है अपना, घंटे का है।
खैर जी खोपड़ी घंटे पर दौड़ पड़ी। कुछ घंटा सूक्तियां निकली हैं।
घंटा जैसा कि सब जानते हैं, बहुत उपेक्षित रहा है। बड़े-बड़े साहित्यकारों ने ना जाने कौन –कौन से विषयों पर कलम चलायी है, पर घंटे पर किसी का ध्यान नहीं गया। पर इस उपेक्षा से घंटे का कुछ नहीं बिगड़ा, घंटा घंटा ही रहा।
घंटा आम तौर पर मंदिरों में पाया जाता है। नेता लोग मंदिरों में घंटा चढ़ाते पाये जाते हैं। वैसे चंबल घाटी के पुराने मंदिरों में पुराने डाकू भी घंटा चढ़ाया करते थे और करते हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि घंटा नेताओं और डाकुओं के बीच एक एकता सी स्थापित करता है। वैसे घंटे के बगैर भी इन दोनों में काफी एकता दिखायी पड़ती है। पर हम बात घंटे की कर रहे हैं।
नेता और घंटे में बहुत समानता है।
दोनों ही बजते हैं। सिर्फ बजते हैं, इनसे कुछ ठोस प्राप्ति की उम्मीद व्यर्थ है।
घंटा इधर से उधर जाता है।
नेता भी एक इलाका छोड़कर दूसरे इलाके में चला जाता है।
घंटा इधर से उधर जाये, तो भी सिर्फ बजता ही है।
ऐसे ही नेता भी इधर से उधर जाये, तो सिर्फ बजता है।


घंटा चाहे कित्ती ही स्टाइल कर ले, ऐसे एंगल से वैसे एंगल तक जाये, सारे पेंच-पैंतरे दिखा ले, तब ही सिर्फ और सिर्फ बजता ही है।
यही हालत नेता की है, चाहे वो कित्ता ही फूं फां कर ले, ऐसी स्टाइलबाजी से लेकर वैसी स्टाइलबाजी तक कर ले, पर वह अंतत बजने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता।
बल्कि घंटा एक मायने में बेहतर है कि घंटे पर आजतक ये आरोप नहीं लगे कि उसने चारा घोटाला कर दिया, या भाईचारा घोटाला कर दिया।
खैर बात हम घंटे की कर रहे हैं कि लेखकों ने घंटे के साथ न्याय नहीं किया। मुहावरों में भी खतरे की घंटी बजती है, घंटा नहीं। अरे खतरे का घंटा क्यों नहीं बज सकता है। एक हास्य कवि का इस बारे में कहना है कि खतरे की घंटी इसलिए बजती है कि मुसीबत पुल्लिंग नहीं, स्त्रीलिंग होती है। वैसे यह जवाब बहुत घटिया है और महिला विरोधी है, पर चूंकि मुझे भविष्य में टीवी पत्रकार बनना है, इसलिए मैं जानता हूं कि घटिया चीजें टीआरपी देती हैं, और बाद में माफी मांगकर सब कुछ रफा-दफा हो जाता है। बल्कि अब तो माफी भी नहीं मांगनी पड़ती। जब तक माफी मांगने की नौबत आये, कोई ज्यादा घटिया आइटम सामने आ लेता है।
खैर, घंटा कैसा भी हो, प्रगतिशील होकर ऊपर पहुंच जाता है, और ऊपर लटक जाता है।
नेता का भी यही हाल है, कैसा भी हो, प्रगति करता है और ऊपर पहुंच जाता है और जनता के ऊपर लटक लेता है।
हमारी नानी एक कहावत कहा करती थीं- ना बाबा आयें ना घंटा बाजे। यानी प्राचीन काल में घंटा बजाने की गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी और घंटा भी बाबाजी ही बजा सकते थे।
बाबाजी ना आयें, तो घंटा नहीं बजता था।
तब के बाबाजी भी सिर्फ घंटा बजाकर संतुष्ट हो जाते थे। अब के बाबा सिर्फ घंटे तक सीमित नहीं रहते। कई मामलों में वे खुद घड़ियालधर्मी हो जाते हैं, और मठ-मंदिर-आश्रम सबकुछ पचा जाते हैं।
फिर अब सीन थोड़ा अलग टाइप का है। बाबाजी भी आ जाते हैं, घंटा भी होता है। पर मंदिरों में पब्लिक नहीं होती है, वह जाने कौन-कौन से टीवी सीरियल देख रही होती है।
घंटे को लेकर बाबाजी लोग बैठे रहते हैं और परेशान हो जाते हैं। इसलिए कई बाबा तो बाबागिरी को छोड़कर नेतागिरी में निकल जाते हैं। तो कहने का मतलब यह है कि घंटा किसी न किसी तरह से बाबागिरी और नेतागिरी के बीच पुल साबित होता है।
घंटे के और भी कई आयाम होते थे । जैसे एक होते थे गुरु और एक होते थे गुरु-घंटाल। सिर्फ गुरुओं से काम नहीं चलता था, घंटे वाला गुरुओं की जरुरत होती थी। बजना मांगता है साब।

जो बजता है साब, उसी का खोमचा सजता है। गुरु-घंटाल के मुहावरे से हमें यही शिक्षा मिलती है।
आलोक पुराणिक, मोबाइल-9810018799