Tuesday, July 31, 2007

HONEST BORE VRS SINGAPORE SHOPPERS

ईमान के घिस्से बनाम सिंगापुर के किस्से

आलोक पुराणिक

कलाम साहब रिटायर हो गये। कह रहे हैं कि पढ़ायेंगे कई संस्थानों में। कलाम साहब पुन टीचरो भव की स्थिति में आ लिये हैं। अच्छा है,, रना पुराने राष्ट्रपति सिर्फ संस्मरण सुनाने भर के हो जाते हैं। बंदा जब संस्मरणात्मक मोड में आ जाये, तो उसका हाल कुछ-कुछ बिगड़े कंप्यूटर का सा हो लेता है, जो बार-बार रिस्टार्ट होता है, और कुछेक पलों के बाद घूम-फिरकर एक खास बिंदु पर रुक जाता है।

संस्मरणात्मक मोड में आम तौर पर राइटर हीं आते। कायदे के वे राइटर तो नहीं आते, जिनके दिल का उचक्कापन हमेशा बरकरार रहता है। दिल के उचक्के हमेशा भविष्योन्मुखी होते हैं, भविष्य की संभावनाओं पर विचार करते हैं। सलमान रश्दी शायद चार बार प्रेम-ऊम का मामला जमा चुके हैं, पर अभी संस्मरणात्मक मोड में नहीं आये हैं, भविष्य पर निगाह है। बल्कि यूं भी कह सकते हैं कि भला आदमी सिर्फ संस्मरणों के सहारे काटता है, उचक्के तो भविष्य के सहारे जीते हैं।

भला आदमी संस्मरणात्मक हो जाये, तो बहूत सताता है। जी वही किस्से-हमारे लिखी रिपोर्ट पर मजाल थी किसी की कि कोई उंगली रख दे या अंजू की शादी हमने ऐसी की, , सारे रिश्तेदार देखते रह गये-टाइप। मेरे एक रिटायर्ड रिश्तेदार हैं,, जिनकी अंजू की शादी सुनकर मैं कई बार बेहोश होते होते बचा हूं। ऐसों की अंजू आतंकवादी सी लगती है।

पर क्या करें , भले -ईमानदार अफसर के किस्से बहुत लिमिटेड होते हैं। मैंने उसको रिफ्यूज कर दिया, मैंने उससे मना कर दिया।

बेईमान अफसर के पास रोचक किस्से होते हैं। लास वेगास, नेपाल के जुएघरों से लेकर सिडनी की लेक में नहाने तक के, या सिंगापुर, ददुबई में शापिंग तक के।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईमानदार बंदे के पास सिर्फ बोरिंग ईमानदारी बचती है और बेईमान अफसर के पास रोचक संस्मरण।

इसलिए ईमानदार अफसरों की बीबियां बहुत दुखी रहती हैं, ईमान का शिकार करके जब अफसर घर आता है, तो बीबी को उसकी ट्राफी दिखाता है। यह अलग बात है कि जिसे वह ईमान की ट्राफी समझ रहा होता है, वह दरअसल बोरिंग सी अनझेलेबल स्टोरी होती है। और रिटायरमेंट के बाद तो यह उपन्यास हो जाती है।

और हां, इंगलिश के मास्साब भी रिटायर होकर खौफनाक हो जाते हैं। मुहल्ले भर के बच्चों की ग्रामर सुधारने के चक्कर में लग जाते हैं।

हमें अपनी कोई चिंता नहीं है, दिल का उचक्कापन रिटायरमेंट के बाद भी बरकरार रहेगा। उसमें एक क्या कई जन्म इंटरेस्टिंग बनाये जा सकते हैं।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

11 comments:

अनूप शुक्ला said...

बंदा जब संस्मरणात्मक मोड में आ जाये, तो उसका हाल कुछ-कुछ बिगड़े कंप्यूटर का सा हो लेता है, जो बार-बार रिस्टार्ट होता है, और कुछेक पलों के बाद घूम-फिरकर एक खास बिंदु पर रुक जाता है। क्या बात है। शानदार च जानदार!

अनुराग श्रीवास्तव said...

:)

Udan Tashtari said...

गजब भाई. धूम ३ के आप हीरो तय मानो. क्या छाये हो:

संस्मरणात्मक मोड में आम तौर पर राइटर नहीं आते। कायदे के वे राइटर तो नहीं आते, जिनके दिल का उचक्कापन हमेशा बरकरार रहता है।

--बहुत सही. मान गये महाराज. कई संस्मरणात्मक मोड में आये लोग एकाएक याद आ गये, आँख भर आई उनकी याद में. हा हा!! बने रहो.

Gyandutt Pandey said...

यह ऑफ द वे टिप्पणी है. कल आपने डेटिंग पर पोस्ट लिखी थी. आज आपके पोस्ट पर विज्ञापन दिख रहा है -
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यानी, आपने 24 घण्टे में कम्पनी भी खोल ली और विज्ञापन भी देने लगे! अरुण अरोड़ा को पार्टनर बनाया या नहीं?
क्यों, हमारी टिप्पणी शानदार च जानदार है या नहीं!

अरुण said...

हम तो अभी डेटिंग मे लगे है,गुरुजी के लिये डेट तलाशनी है.एक अनूप जी बोल गये है.समीर भाइ भी हमे ही काम पर लगा गये है दो डेट ढूढ कर आई डी मेल करने को..एक बढिया सी अपने लिये भी..ही ही फिर टिप्पणी उसी से करायेगे..:)

yunus said...

आज का अनमोल वचन ये है बंधु--

ईमानदार बंदे के पास सिर्फ बोरिंग ईमानदारी बचती है और बेईमान अफसर के पास रोचक संस्मरण।

Keerti Vaidya said...

sir apka likhne aa andaz itna alag hai ke mein bina padhe reh he pati...

anitakumar said...

Alok ji
jaisa meine pehle bhi comment kiya is lekh mein bhi kai naye shabd mein aapne hindi bhasha ko diye..kam se kam meine pehle nahi sune, jaise,अनझेलेबल...waise agar yeh ghyan aapse pehle mil gaya hota kai saal pehle toh kisi beimaan se na judhte....kam se kam bore toh na hote....writer bhi do prakaar ke hote hain...ek toh dil ke uchchake.. भविष्योन्मुखी...aur dooserey jo humesha संस्मरणात्मक मोड mein rehte hain aur 20 saal puraani asafal ek terfa pregatha liye hai hai kerte rehte hai...so boring...dil ke uchchakon per sahitya ka bhavishya tikka hai ..so likhte rehiye..

anitakumar said...

और अब आलोक जी..आपके कल के लेख ने क्या हलचल पैदा की, वो बताते हैं...कल शाम पतीदेव लौटे तो हमने कहा,आलोक जी ने क्या बड़िया लेख लिखा है,पढ़िऐ तो, हिन्दी से वेसे ही दूर भागने वाले, बेमन से पूछा,क्या है,हमने बड़े उत्साह से कहा,देखो डेटिग के कोन्सेप्ट को कैसा घुमाया है. बोले, अरे हाँ,याद आया,ये तुमने मुझे डेटिग का इनविटेशन कयुं भेजा जूस साइट पर..हमने बढ़ी गभींरता से बतलाया कि ये किसी डेटिग सोइट के मेनेजर की कारिस्तानी है..हमारे सब मित्रों को हमसे और हमें मित्रों से,यहां तक की खुद हमें हमारी तरफ से एसे न्योते मिले हैं और हम सब ने डीलीट कर दिए हैं.हमने बड़ी आशा से पूछा, आपने क्या किये, बोले...और क्या करता.डीलीट कर दिया..अरे, अगर न्योता मेरे नाम से था तो स्वीकार कयुं नहीं किया..कोलऍज के दिन भूल गए..कम से कम तुम तो देख कर बतला सकते थे, इसमें है क्या...अपनी झेंप मिटाने को मुस्कुराए..तुम्हें डेट करने को डेटिग साइट पर जाने की क्या जरूरत है...घर पर ही आ जाऊगां...हमने भी अर्थ भरी हुंकार भरी...आपका लेख याद किया..टेलीफोन का बिल (जिसमें internet charges)भी शामिल थे, उनकी तरफ बढ़ाते बोला..कल ही लास्ट डेट है भर देना......हा हा हा हा हा

Sanjeet Tripathi said...

अपना भी रिटायरमेंट के बाद बरकरार ही रहने का है!

अजित वडनेरकर said...

आप छा गए हैं। क्या खूब ।