Thursday, July 12, 2007

सत्यनारायण कथा-2007

सत्यनारायण कथा-2007
आलोक पुराणिक
मामले डेंजरात्मक होते जा रहे हैं, नये बच्चों को कुछ पुरानी बातें समझाना मुश्किल हो रहा है। एक बच्चे को सत्यनारायण की पुरानी कथा समझाने की कोशिश कर रहा था-एक लकड़हारा था, वह जंगल में लकड़ी में काटने जा रहा था।
बच्चे ने पलट सवाल किया-ये लकड़हारा क्या होगा।
बेटे, वो जंगल में लकड़ी काटने जाते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
ये जंगल क्या होता है-बच्चे ने आगे पूछा।
जंगल समझो कि शहर जब खत्म हो जाता है, तो जंगल शुरु होते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
शहर जब खत्म हो जाते हैं, तो फार्म हाऊस शुरु होते हैं। शापिंग माल शुरु होते हैं। हाई वे शुरु होते हैं। ढाबे शुरु होते हैं। जंगल कहां शुरु होते हैं-बच्चे ने पूछा।
समझो कि हिमालय के पास कहीं के गांव का लकड़हारा था-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।
ये हिमालय क्या होता है। ये आप अंगरेजी में क्यों बोलते हैं, हिमालय की हिंदी क्या होती है-बच्चे ने आगे पूछा।
बेटा हिमालय यानी रेंज आफ हिल्स, ये इंडिया में होती है-मैंने बताया।
मैं अच्छे स्कूल में पढ़ता हूं, हमें अमेरिका के बारे में बताया जाता है। अमेरिका के हिल्स के बारे में बताया जाता है। आखिर सैटल तो एक दिन अमेरिका में ही होना है। हमारे स्कूल वाले इंडिया की चीजों के बारे में पढ़ाने में टाइम वेस्ट नहीं करते-बच्चा बता रहा है।
ये और पेंच है। समझदार बच्चे इधर इंडिया के बारे में समझते ही नहीं है। पेरेंट्स मानकर चलते हैं कि ठीकठाक बच्चा निकला, तो अमेरिका ही जायेगा। इंडिया में थोड़े ही रुकेगा। जो इंडिया में रुक गया, वो वही है, जिसे अमेरिका नहीं तो दुबई, नहीं तो मारीशस तक का वीसा नहीं मिला।
बात में दम है, इसलिए नये बच्चों को सत्यनारायण कथा तो दूर, लकड़हारे तक के बारे में समझाना मुश्किल है। इस खाकसार ने एक नयी सत्यनारायण कथा तैयार की है, सो आपकी सब की सेवा में पेश है।
एक समय की बात है। एक सिलिकौन सिटी बंगलूर में राबर्ट और मारिया और उनका बेटा बर्टी रहता था। ये सभी इंडियन थे, पर अमेरिका में सैटल होने के ख्याल से इन्होने अपने नाम कुछ अमेरिकन टाइप कर लिये थे। सारे समझदार लोग यही करते थे। एक बार की बात है। जैसा कि सारे समझदार बच्चे करते थे, राबर्ट ने भी एक दिन वीसा के लिए अमेरिकन एंबेसी में अप्लाई किया। उसका वीजे की एप्लीकेशन रिजेक्ट हो गयी। एंबेसी से लौटते समय उसने देखा कि एक केले के वृक्ष के नीचे कुछ एक सूट-बूटधारी अपनी जीन्सधारी पत्नी के साथ पूजा कर रहा था। पूछने पर उसने बताया कि उसका वीजा भी पहले अमेरिकन एंबेसी में रिजेक्ट हो गया था। उसने सत्यनारायण भगवान की आराधना की और प्रसाद स्वरुप साफ्वेयर इंजीनयियरिंग में पढ़ने वाले छात्रों में ग्यारह सीडी बांटीं। इसके बाद उसका वीसा क्लियर हो गया।
ऐसे वचन सुनकर बर्टी ने भी मन ही मन संकल्प लिया कि वह भी ऐसा ही करेगा।
उस दिन बर्टी के पापा ने उससे सौ किलो आलू लाने का आदेश दिया, एक स्मार्ट बच्चे की तरह बर्टी सिर्फ नब्बे किलो आलू लाया और दस किलो आलू की रकम अंदर कर ली। आलू चूंकि बहुत महंगे थे, इसलिए बर्टी ने बहुत रकम बचा ली।
उसने केले के पेड़ के नीचे पूजा की और इक्कीस सीडी छात्रों में बांट दीं।
इसके परिणाम आये और अगली बार ही उसका अमेरिकन वीजा क्लियर हो गया। पर, पर, पर, वह जाने से पहले सत्यनारायण कथा करवाना भूल गया।
वह अमेरिका गया और बहुत डालर खेंचे,लौटकर जब वह या तो सूटकेस में बहुत महंगे साफ्टवेयर प्रोग्रामों की सीडी लेकर आया। वह जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरा, एक साधु ने उससे कहा-हे वत्स तेरे सूटकेस में क्या भरा है।
बर्टी ने परिहास करते हुए कहा कुछ नहीं, इसमें कीड़े-मकोड़े हैं, वायरस हैं।
साधु ने कहा-तेरे वचन सत्य हो जायें।
बर्टी ने घर जाकर उन कार्यक्रमों की सीडी को चलाया, तो उनमें वायरस आ गये। सीडी चलीं नहीं।
बर्टी बहुत रोया, परेशान हुआ उसकी बरसों की मेहनत पर वायरस फिर गया।
तब ही उसे साधु की याद आयी। फौरन से उसने केले के वृक्ष के नीचे पूजा-पाठ की, तत्काल वह साधु प्रकट हुआ और बर्टी ने उसके चरणों में पड़ते हुए कहा हे महाराज मुझसे गलती हो गयी।
साधु ने उसे आशीर्वाद दिया, तत्पश्चात बर्टी ने भारत में और तत्पश्चात अमेरिका में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। बोलो श्री............................ की जय।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

12 comments:

काकेश said...

वाह वाह ..आप धन्य है पंडित जी..कथा के अब प्रसाद भी खिलाया जाये..पंचामृत सहित.

काकेश said...

कथा के --> कथा के बाद

Gyandutt Pandey said...

यह सत्यनारायण की कथा है क्या? आपने तो समझ ली होगी जब यह लेख लिखा. मुझे तो अब अत्क नहीं समझ में आयी. और आपने और उलझा दी.

Udan Tashtari said...

बोलो आलोक पुराणिक महाराज की जय....पंचामृत के लिये हमहूँ है लाईन में एक ठो गिलास लेकर मित्र काकेश के पीछे. :)

बेहतरीन सटीक आईटम लाये हो. रोज रोज ऐसा करोगे तो वो दिन दूर नहीं जब आप चिट्ठाजगत की आईटम गर्ल (ब्वाय) से नवाजे जायेंगे.

अनूप शुक्ला said...

बोलो आइटम ब्वाय बाबा आलोक नारायण की जय।:)

eSwami said...

लेख बहुत फ़न्नी(फ़न उर्दू वाला) है!

अरुण said...

ये गलत बात है गुरुदेव हम ये कथा बाच कर अपना धंधा चला रहे थे अब हमसे कौन सुनेगा,सबने यही पढली,लगता है इन पर भी अमेरिका जाकर पेटेंत कराना पडेगा...:)वरना आप सारी छाप दोगे..:)

अनुराग श्रीवास्तव said...

पंडित जी,

यह कथा अंग्रेजी भाषा में अनुवादित करके पुनः छापिये. 'अच्छे' स्कूलों में अध्ययनरत छात्र हिंदी में लिखी कथा को समझने में पूर्णतया असमर्थ हैं.

आशा है कि आप शीघ्रातिशीघ्र 'अच्छे' स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिये रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ भी प्रकाशित करेंगे.
प्रतीक्षा रहेगी.

maanyta said...

bhut achha hai satya nayaran katha ka rimek .
sorry sir, mere pass hindi font to hai par me likh nahi pati isliye aise likha .ok
sach a nice katha.

भुवनेश शर्मा said...

वाह बोलो आलोकानारायण भगवान की जय

Sanjay Tiwari said...

जंगल में, लकड़ी में क्या काटने जा रहा था लकड़हारा?

Shrish said...

हे पंडित आलोक पुराणिक जी, जिस प्रकार पुराने समय में महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों रचना कर चारों ओर ज्ञान का प्रकाश फैलाया था, वैसे ही आज आप अपने पुराणों द्वारा नवज्ञान फैला रहे हैं, आप धन्य हैं ऋषिवर!

बोलो बाबा आलोक पुराणिक की जय!

प्रसाद कहाँ है महाराज? सत्यनारायण की कथा का प्रसाद लिए बिना जाना महा अमंगलकारी है।