Wednesday, July 11, 2007

नेता का शुभ-मंगल,, पब्लिक सावधान

नेता का शुभ -मंगल, पब्लिक सावधान

आलोक पुराणिक
हर समझदार भारतीय को राष्ट्र के प्रति नमन भाव रखना चाहिए,पर महाराष्ट्र के प्रति विशेष नमन भाव रखना चाहिए। इसलिए नहीं कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई प्रीति जिंटा या
आशिया टाकिया रहती हैं, बल्कि इसलिए कि महाराष्ट्र ने पूरे देश के एक विशेष किस्म की समझदारी दी है। यूं तो यह समझदारी मूलत शादी की रस्मों से ताल्लुक रखती है, पर इसे लगभग हर क्षेत्र में विस्तारित किया जा सकता है।
पूरे ब्रहमांड में सिर्फ महाराष्ट्र ही ऐसा इलाका है, जहां
शादी की रस्म के फाइनलीकरण से पूर्व तीन बार चेतावनी दी जाती है-शुभ मंगल सावधान। अगली बार किसी महाराष्ट्रियन शादी में जायें, तो चैक करें।
यानी कि अबे दूल्हे सावधान। दुल्हन सावधान।
दोनों एक दूसरे से सावधान। साहबजी, सूचना का अधिकार और क्या होता है। और ये सावधानीकरण अब से नहीं है, कई शताब्दियों से है।
सावधान की एक कथा यूं है कि शिवाजी के गुरुदेव समर्थ रामदासजी विवाह मंडप तक पहुंच गये थे। विवाह हुआ ही चाहता था कि सावधान सुनकर रामदासजी सावधान हो गये और भाग निकले।

रामदास अगर विवाहित हो जाते, तो समर्थ रामदास न हो पाते।

गुरुवर ने यूं भागकर साफ किया कि समझदार आदमी के पास दो ही चाइस हैं, या तो समर्थ हो रहे या विवाहित। विवाहित तो बहुत हुए, पर समर्थ रामदास ही हुए।।

समर्थ रामदास न होते, तो शिवाजी न होते। शिवाजी न होते, तो महाराष्ट्र न होता, महाराष्ट्रीयन न होते। महाराष्ट्रीयन न होते, तो गोखले, तिलक, लता मंगेशकर, पु. ल. देशपांडे, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और हां, कहने में संकोच होता है, पर कहना पड़ता है कि आलोक पुराणिक भी न होते।

गोखले, तिलक न होते, तो देश आजाद न होता। देश आजाद न होता, तो बहुत दिक्कत हो जाती। देश के बच्चे अमेरिका-इंगलैंड पर अपना झंडा फहराकर नान रेजीडेंट इंडियन कैसे बनते। क्योंकि अगर देश आजाद न होता, तो हम ब्रिटेन के हिस्से होते, बोले तो ब्रिटेन होते। अब ब्रिटेन में ही रह रहे होते, तो अमेरिका, ब्रिटेन जाने के लिए मार क्यों मचाते। अमेरिका ब्रिटेन जाने की मार ना मचाते, तो बताइए प्रख्यात इस्पात कारोबारी लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन क्यूं जाते। मित्तल साहब ब्रिटेन ना जाते, तो बताइए कि ब्रिटेन तक अपना झंडा फहर पाता। नहीं ना।

इससे पता चलता है कि अगर गुरु रामदास सावधान सुनकर ना भागते, तो लक्ष्मी मित्तल का झंडा ब्रिटेन तक नहीं फहरा पाता।

और साहब, सोचिये, गोखले, तिलक न होते, तो देश आजा न होता। देश आजाद न होता, हम आज भी ब्रिटेन के हिस्से होते। इंडिया अलग न होता, इंडिया की क्रिकेट टीम अलग न होती। न इंडिया की क्रिकेट टीम होती, न हारती, ना ग्रेग चैपल, राइट जैसे विदेश कोचों को रोजगार मिलता।

इस तरह से देखें, अगर गुरु रामदास सावधान सुनकर ना भागते, तो तमाम विदेशी कोच बेरोजगार रह जाते। विदेशी कोचों का शुभ-मंगल, फिर भी हम हारेंगे, सावधान –कहां हो पाता।

शुभ-मंगल सीरिज में यह भी कहा जा सकता है –नेता का शुभ-मंगल, पब्लिक सावधान।

खैर जी, ये बातें तो बड़े लोगों की हैं। हम जैसों का क्या।

हम जैसों के लिए शुभ-मंगल तो कम ही होता है। सो सिर्फ सावधान, बरसात में सब्जियां महंगी हो ली हैं।

वैसे सावधान रहने से भी क्या होता है।

सो चलिये यूं कहें कि काहे का शुभ-मंगल और काहे के सावधान।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

8 comments:

काकेश said...

अब हम भी आपसे सावधान हो लिये हैं जी ..कृपा बनायें रखें..

अरुण said...

ये आपकी शादी के वक्त नही कहा गया था क्या,या आपने रामदास जी की प्रेरणा नही ली....?कृपया खुळासा करे..:)

arun said...

चेतना जाग्रत करने का अचछा प्रयास, लिखते रहिये:)

परमजीत बाली said...

अलोक जी,बहुत बढिया तरीके से सावधान किआ है।लेकिन सावधान की अवस्था ज्यादा देर रहे तो अपने आप धीरे-धीरे विश्राम बन जाती है।

परमजीत बाली said...

इस लिए हमेशा सावधान नही रह पाएगें।

Gyandutt Pandey said...

इतने चेक प्वॉइण्ट होने पर भी आप समर्थ नहीं, विवाहित हो गये? लगता है परम्परा में सिस्टमिक डिफेक्ट आ गया है! :)

Shrish said...

अगर गुरु रामदास न भागे होते तो आज हम आपके व्यंग्य पढ़ने से वंचित रह जाते।

धन्य हैं, आपकी कल्पना कहाँ-कहाँ नहीं जाती।

Udan Tashtari said...

सावधान, अगर संकोची पुराणिक जी न होते तो हम यह सब कुछ न जान पाते और बिना पढ़े चैन से सो रहे होते.टिपिया भी नहीं रहे होते.