Wednesday, July 18, 2007

मन के मैल का वाशिंग पाऊडर उर्फ छोटी लुच्चई

मन के मैल का वाशिंग पाऊडर उर्फ छोटी लुच्चई
आलोक पुराणिक
सामने उन्तीस ब्रिटिश पौंड का चेक पड़ा है यानी दो हजार रुपये से ज्यादा की रकम। यह रकम मैंने गरीबी से कमाई है। एक इंटरनेशनल शोध संगठन ने भारत में गरीब बच्चों पर रिपोर्ट जारी की थी। एक विदेशी मीडिया हाऊस ने इस पर मेरे विचार चाहे थे, जो मैंने करीब सौ शब्दों में व्यक्त किये थे। गरीबी इतने चकाचक रिटर्न देती है, पहले पता नहीं था।
गरीबी से कमायी गयी दो हजार रुपये की अमीरी में मैं अपराधबोध और शर्म में डूब ही रहा था कि एक सीनियर प्रोफेसर ने बताया कि वह न्यूयार्क जा रहे हैं, गरीबी पर इंटरनेशनल लेक्चर देने। गरीबी का यह टूर उन्हे करीब दो लाख रुपये से अमीर कर देगा, उन्होने बताया।
उनके दो लाख रुपये के आगे मेरी उन्तीस पौंड की शर्म कुछ कम हो गयी।
शर्म से पार पाने का यही सही फंडा है आजकल।
किसी की जेब काटने का अपराध बोध हो, तो वह खबर पढ़ लेनी चाहिए कि लुटेरों में माल लूटकर हत्या भी कर दी।
मन हल्का हो जाता है, देखो, हम कितने करुणावान, किसी की जान नहीं लेते।
चारे में रकम खाने की शर्म परेशान कर रही हो, तो वह खबर पढ़नी चाहिए, जो बताती है कि नेताजी गरीब बच्चों के दूध के लिए रखी गयी रकम खा गये।
मन का मैल कम हो जाता है। अपने बारे में पावन विचार उठने लगते हैं-हाय हम कितने दयालु बच्चों को नहीं मारते।
यह तरकीब मुझे इनकम टैक्स विभाग के एक चपरासी ने सिखायी थी।
रिश्वत लेते हुए वह बताता था-जी हम तो लाख दरजा अच्छे हैं, उस वाले सरकारी अस्पताल को देखिये। वहां पोस्टमार्टम विभाग के चपरासी लाश को हैंड ओवर करने तक के लिए रिश्वत खाते हैं। हम कितने अच्छे, सिर्फ इनकम में से रिश्वत निकालते हैं, लाश से नहीं।
कमीनेपन को विकट घनघोर कमीनेपन के आगे रख दें, यह तरकीब मन के मैल का सर्फ एक्सेल साबित होती है।
खैर प्रोफेसर साहब दो लाख कमायेंगे गरीबी से, मैं सिर्फ दो हजार। यह फर्क है लोकल और इंटरनेशनल का। अमेरिका वाले गरीबी की कदर ज्यादा करते हैं।
गंजबासौदा के एक कालेज से व्याख्यान के लिए निमंत्रण आया है कि गरीबी पर व्याख्यान दे जाइए। बस से आने-जाने का किराया और दो सौ इक्यावन मानदेय देंगे।
मरभुख्खे, गरीब गंजबासौदा वाले, चले हैं इतनी सी रकम में चले हैं गरीबी पर व्याख्यान सुनने।
गरीबों को गरीबी पर व्य़ाख्यान सुनाना बेकार है जी।
गरीबी पर व्य़ाख्यान सिर्फ उनको सुनाना चाहिए, जो उसे अफोर्ड कर सकें।
एड्स, एड्स के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं-सीनियर प्रोफेसर मुझसे पूछ रहे हैं।
बहुत खतरनाक बीमारी है-मैं बता रहा हूं।
अरे, खतरनाक सबके लिए नहीं है। अफ्रीका में एड्स-इस पर एक रिसर्च पेपर तैयार करो, कनाडा से पांच लाख दिलवा सकता हूं। एड्स का चकाचक सीजन है आजकल।-प्रोफेसर कह रहे हैं।
पर अफ्रीका के एड्स पर कनाडा में पेपर, इसका क्या मतलब है-मैंने प्रोफेसर से पूछा।
अफ्रीका के लोग अफोर्ड कहां कर सकते हैं एड्स पर रिसर्च। अरे रिसर्च वहां के लिए तो की जायेगी, जहां वाले अफोर्ड कर सकते हैं-प्रोफेसर ने कहा।
दोस्तो अब मैं एड्स पर रिसर्च में लग गया हूं, जब कभी अपराधबोध और शर्म में डूबता हूं, तो उन प्रोफेसरों को देख लेता हूं, जो इराक में मरते लोग और लोकतंत्र की विजय नामक विषय पर शोध कर रहे हैं।
मन का मैल मिट जाता है।
आलोक पुराणिक--मोबाइल -9810018799

7 comments:

काकेश said...

आज आपने नया वाशिंग पाउडर इंट्रोड्युस कराया पसंद आया.अब समझ आया 'दाग अच्छे हैं"

अरुण said...

गुरुदेव माफ़ कीजीयेगा,मै अभी पहली उडान से भारत के गाव और गरीबी पर रिसर्च करने सिंगापुर ,कनाडा और स्विटजरलैन्ड जा रहा हू,लौट कर ही टिपिया पाउंगा...:)

Udan Tashtari said...

कमीनेपन को विकट घनघोर कमीनेपन के आगे रख दें, यह तरकीब मन के मैल का सर्फ एक्सेल साबित होती है।


--गजब!!! बहुत सही डिटर्जेन्ट लाये हैं. आह्ह!! सी निकल पड़ी. बहुत नमन मित्र.

Gyandutt Pandey said...

निरपेक्ष कुछ नहीं सब सापेक्ष. यह नये आइंस्टीन के सापेक्षवाद का ड्राफ्ट है क्या? मैं अग्रिम बधाई दे दूं कि शायद यह नोबेल पुरस्कार का बीज हो. आइंस्टीन को सापेक्षवाद पर तो नोबल मिल नहीं सका था. नोबल वाले अपराध बोध में होंगे ही. शायद आपको टिका दें. :)
बस हेडिंग में लुच्चई जैसे शब्द निकाल दें, जिससे मामला बौद्धिक सा लगे और फिर नोबल की लॉबिंग शुरू करें!

Sanjeet Tripathi said...

शुक्रिया टिप्स देने के लिए नई तो अपन तो अभी तक आकाशवाणी में ही टॉक्स में बोल बोल के छोटे मोटे चेक लेने में ही खुश थे!!

yunus m. said...

आलोक भैया जे तो अच्‍छा है, गरीबी गरीबी करो और चेक लेते जाओ । पिछले दिनों बोरीवली स्‍टेशन पर एक भिखारिन मर गयी, जब उसकी गद्दी झटकी गई तो नोटों की कई गड्डियां निकलीं । समझे आप । ग़रीबी आजकल सर्वत्र कमाई का ज़रिया है सरकार ।

अनूप शुक्ला said...

सही है। छोटी लकीर बड़ी लकीर् का मामला। दूसरे की बड़ी हरकत् अपनी को और् छोटी बना देती है।