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Monday, August 27, 2007

भगीरथजी मुनि की रेती पर उर्फ भगीरथ -गंगा नवकथा

भगीरथजी मुनि के रेती पर उर्फ भगीरथ गंगा नवकथा

आलोक पुराणिक

गंगा को जमीन पर लाने वाले अजर-अमर महर्षि भगीरथजी स्वर्ग में लंबी साधना के बाद जब चैतन्य हुए, तो उन्होने पाया कि भारतभूमि पर पब्लिक पानी की समस्या से त्रस्त है। समूचा भारत पानी के झंझट से ग्रस्त है। सो महर्षि ने दोबारा गंगा द्वितीय को लाने की सोची। महर्षि भारत भूमि पर पधारे और मुनि की रेती, हरिद्वार पर दोबारा साधनारत हो गये।

मुनि की रेती पर एक मुनि को भगीरथ को साधना करते देख पब्लिक में जिज्ञासा भाव जाग्रत हुआ।

छुटभैये नेता बोले कि गुरु हो न हो, जमीन पक्की कर रहा है। ये अगला चुनाव यहीं से लड़ेगा। यहां से एक और कैंडीडेट और बढ़ेगा। बवाल होगा, पुराने नेताओं की नेतागिरी पर सवाल होगा।

पुलिस वालों की भगीरथ साधना कुछ यूं लगी-हो न हो, यह कोई चालू महंत है। जरुर साधना के लपेटे में मुनि की रेती को लपेटने का इच्छुक संत है। तपस्या की आड़ में कब्जा करना चाहता है।

खबरिया टीवी चैनलों को लगा है कि सिर्फ मुनि हैं, तो अभी फोटोजेनिक खबरें नहीं बनेंगी। फोटोजेनिक खबरें तब बनेंगी, जब मुनि की तपस्या तुड़वाने के लिए कोई फोटोजेनिक अप्सरा आयेगी। टीआरपी साधना में नहीं, अप्सराओं में निहित होती है। टीवी पर खबर को फोटूजेनिक होना मांगता।

नगरपालिका वालों ने एक दिन जाकर कहा-मुनिवर साधना करने की परमीशन ली है आपने क्या।

भगीरथ ने कहा-साधना के लिए परमीशन कैसी।

नगरपालिका वालों ने कहा-महाराज परमीशन का यही हिसाब-किताब है। आप जो कुछ करेंगे, उसके लिए परमीशन की जरुरत होगी। थोड़े दिनों में आप पापुलर हो जायेंगे, एमपी, एमएलए वगैरह बन जायेंगे, तो फिर आप परमीशन देने वालों की कैटेगरी में आयेंगे।

भगीरथ ने कहा-मैं साधना तो जनसेवा के लिए कर रहा हूं। सांसद मंत्री थोड़े ही होना है मुझे।

जी सब शुरु में यही कहते हैं। आप भी यही कहते जाइए। पर जो हमारा हिसाब बनता है, सो हमें सरकाइये-नगरपालिका के बंदों ने साफ किया।

देखिये मैं साधु-संत आदमी हूं, मेरे पास कहां कुछ है-भगीरथ ने कहा।

महाराज अब सबसे ज्यादा जमीन और संपत्ति साधुओं के पास ही है। न आश्रम, न जमीन, न कार, न नृत्य की अठखेलियां, ना चेलियां-आप सच्ची के साधु हैं या फोकटी के गृहस्थ। हे मुनिवर, आजकल साधुओं के पास ही टाप टनाटन आइटम होते हैं। दुःख, चिंता ,विपन्नता तो अब गृहस्थों के खाते के आइटम हैं-नगरपालिका वालों ने समझाया।

भगीरथ यह सुनकर गुस्सा हो गये और हरिद्वार-ऋषिकेश से और ऊपर के पहाड़ों पर चल दिये।

भगीरथ को बहुत गति से पहाड़ों की तरफ भागता हुआ सा देख कतिपय फोटोग्राफर भगीरथ के पास आकर बोले देखिये, हम आपको जूते, च्यवनप्राश, अचार कोल्ड ड्रिंक, चाय, काफी, जूते, चप्पल जैसे किसी प्राडक्ट की माडलिंग के लिए ले सकते हैं।

पर माडलिंग क्या होती है वत्स-भगीरथ ने पूछा।

हा, हा, हा, हा हर समझदार और बड़ा आदमी इंडिया में माडलिंग के बारे में जानता है। आप नहीं जानते, तो इसका मतलब यह हुआ कि या तो आप समझदार आदमी नहीं हैं, या बडे़ आदमी नहीं हैं। एक बहुत बड़े सुपर स्टार को लगभग बुढ़ापे के आसपास पता चला कि उसकी धांसू परफारमेंस का राज नवरत्न तेल में छिपा है। एक बहुत बड़े प्लेयर को समझ में आया कि उसकी बैटिंग की वजह किसी कोल्ड ड्रिंक में घुली हुई है। आप की तेज चाल का राज हम किसी जूते या अचार को बना सकते हैं, बोलिये डील करें-फोटोग्राफरों ने कहा।

देखिये मैं जनसेवा के लिए साधना करने जा रहा हूं-भगीरथ ने गुस्से में कहा।

गुरु आपका खेल बड़ा लगता है। बड़े खेल करने वाले सारी यह भाषा बोलते हैं। चलिये थोड़ी बड़ी रकम दिलवा देंगे-एक फोटोग्राफर ने कुछ खुसफुसायमान होकर कहा।

(जारी कल भी)

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Saturday, August 25, 2007

भूत नाग ये वाले

आलोक पुराणिक

खबर है कि शरद पवारजी ने अपनी सांसद बिटिया को सलाह दी है कि संसद में टाइम वेस्ट ना करो, जाओ इलाके में जाकर काम करो।

संसद में नेता ज्यादातर टाइम वेस्ट ही करते हैं, यह पब्लिक तो हमेशा मानती है।

पर नेता कभी-कभार ही मानते हैं। चलो शरद पवारजी मान गये।

इलाके में जाकर नेता टाइम वेस्ट करे, तो पता लग जाता है कि वहां टाइम वेस्ट करना भी आसान नहीं है। बिजली नहीं है, कि सो कर किया जा सके। पानी नहीं है कि नहाकर किया जा सके। हां दारु के ठेके हैं, पीकर किया जा सकता है। खाने का जुगाड़ हो ना हो, पर पीने का जुगाड़ जरुर हो सकता है। पिछले दस सालों में राशन की जितनी दुकानें बंद हुई हैं, उतनी दुकानों से दोगुनी दारु की दुकानें खुल गयी हैं।

पब्लिक के खाने पर सरकार का खर्च होता है, पब्लिक के पीने से सरकार कमाती है।

पब्लिक के लिए मैसेज है-खाने के काम नेताओं के लिए छोडो, पीने का काम कर लो।

खैर मसला यह है कि सरकार जा रही है। नहीं, बच रही है। मार चपर-चूंचूं मची हुई है।

वैसे मैं खुश हूं। इस घपड़चौथ में एक काम अच्छा हुआ है कि टीवी चैनलों से नाग-भूत-प्रेत कम हो गये हैं। उस बिल्डिंग में जाते हुए नाग, इस बिल्डिंग से निकलते भूत टाइप कार्यक्रम टीवी चैनलों पर कुछ कम आ रहे हैं।

उस बिल्डिंग में जाते हुए नेता, उस बिल्डिंग से निकलते हुए नेता-इस टाइप के कार्यक्रम टीवी पर ज्यादा आ रहे हैं।

वैसे टीवी के एक गहरे जानकार का मानना है कि बेसिकली हैं ये भी भूत-नाग ही। यहां से निकल कर वहां चले जाते हैं, करना-धरना इन्हे भी कुछ भी नहीं हैं, सिवाय पब्लिक को डराने के।

अभी कल मिले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, कह रहे थे कि अमेरिका के साथ 123 का डील क्या हुआ, नौ दो ग्यारह होने की नौबत आ गयी।

मैंने कहा जी बच रहे हो, कि 123 पर नौ दो ग्यारह होने का सीन है। वरना प्याज-धनिया के भावों पर नौ दो ग्यारह होते।

नेता हंसने लगा-बोला प्याज-धनिया के भावों की चिंता हम नहीं करते। प्याज धनिया अब जो अफोर्ड कर सकते हैं, वे उस कैटेगरी के लोग हैं, जो किसी भी चीज के भाव नहीं पूछते। और जो पूछते हैं, वो धनिया और टमाटर को ज्वैलरी की तरह मानने लगे हैं, रोज यूज नहीं करते। ज्वैलरी के भावों पर सरकार आज तक नहीं गयी।

वैसे सोचिये, नेताजी गलत कह रहे हैं क्या।
आलोक पुराणिक

मोबाइल-09810018799

Monday, August 20, 2007

ईयर-फोन का सामाजिक और राजनीतिक योगदान

ईयर फोन का सामाजिक और राजनीतिक योगदान

आलोक पुराणिक

आविष्कार इसे ही कहते हैं साहब।

ईयर फोन का आविष्कार जिसने किया हो, किया हो। पर ईयर फोन के सामाजिक राजनीतिक योगदान पर शोध इस खाकसार ने की है।

एक कार्डलैस ईयर फोन में लगाये हुए मैं एमपी थ्री प्लेयर सुन रहा था।

ईयर फोन और एमपी थ्री प्लेयर इधर नेताओं के ईमान के माफिक हो चले हैं, हर नया एडीशन पुराने के मुकाबले सिकुड़ा हुआ मिलता है।

बल्कि अब तो लेवल गायब होने के लेवल पर आ लिया है, सो साहब, कार्डलैस ईयर फोन और एमपी थ्री प्लेयर गायब से थे, दिख ही नहीं रहे थे।

पत्नी सामने आयी -कुछ कहा।

मुझे ईयर फोन में वही गीत सुनायी दिया -तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया- साथ होगा।

पत्नी ने बाद में बताया कि उसने असल में कहा था-जाने किस बुरी घड़ी में तुमसे शादी हुई थी। हे भगवान, अगले जन्म में इस चिरकुट को अगर पृथ्वी पर भेजो, तो मुझे मंगल ग्रह का प्राणी बनाना, ताकि शादी की कोई आशंका ना बने।

पत्नी ने बाद में तारीफ करते हुए कहा-तुमने मेरी बात का बुरा नहीं माना।

मैंने बताया कि मुझे तुम्हारा यह संदेश सुनायी दे रहा था-तू जहां -जहां चलेगा, मेरा साया साथ-साथ होगा।

कार्ड लैस ईयर फोन बहुत करतब कर सकता है जी।

उधर से भले ही यह मैसेज ब्राडकास्ट हो रहा है कि हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आये कभी तो मत रोना।

पर ईयर फोन यह संदेश सुना सकता है-आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जाता।

सासों और बहुओं के संबंध एक झटके से सुधरने के ट्रेक पर आ जायेंगे।

एक कार्डलैस ईयर फोन सास के कान में, एक बहू के कान में।

सास इस सुकून के साथ धुआंधार सुना सकती है कि देखो बहू तो अब पलट कर जवाब ही नहीं देती।

बहू फुल कांफीडेंस के साथ कह सकती है-सुनाये जाओ, किसने सुननी है।

मुझे एक और सीन दिखायी पड़ रहा है।

संसद में सब परस्पर एक दूसरे के कान में हल्ला ठोंकने के ईयर फोन खौंस कर अपने ही कान में हल्ला मचा रहे हैं।

वामपंथी सांसदों के ईयर फोन से ये गीत आ रहा है-तू मेरा दुश्मन, दुश्मन मैं तेरा,...

कांग्रेसी ईयर फोनों से यह गीत झर रहा है-चैन से हमको कभी इक पल जीने ना दिया......

भाजपाई ईयर फोनों से यह संदेश निकल सकता है-हम को भी गम ने मारा, तुमको भी गम ने मारा, हम सबको गम ने मारा।

बसपा के ईयरफोन-चल चल मेरे हाथी- पर झूम रहे हैं।

संसद झूम बराबर झूम हो रही है।

क्या कहा जी, फिर संसद में काम क्या होगा।

जी जैसे अभी बहुत होता है।

अजी जो हल्ला अभी है, वह बहुत असंगठित टाइप का है। फिर कुछ क्रियेटिव टाइप का हल्ला होगा।

कभी कुछ राष्ट्रीय एकता टाइप कुछ दिखाना हो, तो सारे ईयर फोनों में एक ही गीत बजाया जा सकता है-मिले ईयर फोन मेरा-तुम्हारा तो, सुर बने हमारा।

कुछ इंटरनेशनल सीन देखिये।
जरा सोचिये
, बुश कुछ कहें, तो सारे ईयरफोन ठोंक ले।

फोकटी में रियेक्शन देने में भी टाइम क्यों जाया करना।

कहे, जाओ बुश जो कहना है। तुम्हारे कहने से होता क्या है।

सोचिये, बुश अपना बयान धकेल रहे हैं।

इधर से ईयर फोन से शकीरा अपना सुपर हिट गाना सुना रही हैं--हिप्स डोंट लाई।

शकीरा का संदेश नये संदर्भों में समझा जा सकता है-हिप्स डोंट लाई। बट बुश लाईस।

सच के मामले में ज्यादा पाक- साफ किसे माना जाये।

क्या ही धांसू च फांसू सीन उभरेगा। मुशर्रफ पाकिस्तान में डेमोक्रेसी और बेनजीर भुट्टो के संदर्भ में पब्लिक को कुछ भाषण ठेल रहे हैं।

सबको ईयर फोन पर सिर्फ यही सुनायी दे रहा है-तुम अगर मुझसे ना निभाओ, तो कोई बात नहीं। तुम किसी गैर से निबाहोगी, तो मुश्किल होगी।

साहब सच्ची का एक किस्सा और सुनिये। इधर स्वतंत्रता दिवस के सिलसिले में आयोजित एक समारोह में मैं तमाम नेताओं के भाषण सुनने एक प्रोग्राम में चला गया।

जाने क्या-क्या अगड़म-बगड़म नेता लोग बोलते रहे, पर मुझे ईयर फोन में सिर्फ यही सुनायी दिया-हम लूटने आये हैं, हम लूटकर जायेंगे।

आलोक पुराणिक

मोबाइल-9810018799

Friday, August 17, 2007

अब चीप चाइनीज हजबैंड भी-चेतावनी -महिलाएं इसे ना पढ़ें

अब चीप चाइनीज हसबैंड भी-वैधानिक चेतावनी महिलाएं इसे ना पढ़ें

आलोक पुराणिक

एक एक्सपर्ट बता रहे हैं कि सन् 2200 तक भारत में चीनी कंप्यूटरों, मोटरसाइकिलों और कारों के साथ चीनी पतियों की आमद बढ़ जायेगी।

ये चीनी पति सस्ते में बहुत काम करेंगे।

मैंने शंका व्यक्त की-चीनी आइटम ज्यादा नहीं चलते।

तो एक्सपर्ट ने बताया-यह खामी नहीं, खूबी मानी जाती है। चीनी हसबैंड एकाध साल चलेंगे, फिर सस्ते नये ले लेंगे।

मैंने फिऱ कहा-पर चीनी हसबैंड ही क्यों, चीन से वाइफें क्यों नहीं आयेंगी।

एक्सपर्ट ने बताया-भारतीय वाइफों का रिप्लेसमेंट पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। उसने एक कहावत के बारे में बताया कि स्वर्ग की परिभाषा के तहत ऐसे बंदे को स्वर्ग जैसी स्थितियों में बताया जाता है, जिसकी सेलरी अमेरिकन हो, मकान ब्रिटिश हो और पत्नी इंडियन हो। नर्क का मामला यह है कि सेलरी चीनी हो, मकान जापानी हो और पत्नी अमेरिकन हो।


डर रहा हूं, अगर चीनी हसबैंड आने लगे, तो। जब हर तरह की आउटसोर्सिंग संभव है, तो हसबैंडों की क्यों नहीं।

कुछ सीन इस तरह के होंगे-

एक भारतीय हसबैंड की पत्नी उसे हड़का रही है-तुम्हे शर्म नहीं आती, तुम सिर्फ अठारह घंटे काम करते हो, और दो टाइम का खाना और तीन टाइम की चाय मांगते हो। देखो बगल के च्यांग शू को , चीन से कित्ते सस्ते में पड़ा है। सिर्फ एक टाइम खाना खाता है और बीस घंटे काम करता है।

सारी काबिल कन्याओँ के पिता बीजिंग की फ्लाइट में दिखायी पड़ेंगे-जी कहां जा रहे हैं। जी अपनी बिटिया फलां बैंक में सीईओ हो गयी है, बीजिंग में एकाध अच्छा सा लड़का देखने जा रहे हैं। जी हम भी वहीं जा रहे हैं। हमारी बिटिया ने बेवकूफी की, एक इंडियन से ही लव का चक्कर चला लिया। पर बाद में वह समझ गयी कि लव से काम नहीं चलता। सस्ते और कामकाजी पति ही वैवाहिक जीवन को बेहतर बनाते हैं। और फिर अच्छी बात तो यह है कि चीन के हसबैंड ज्यादा चलते भी नहीं हैं, चार-पांच साल काम देंगे, फिर नये से रिप्लेस कर लेंगे। थोक में बुकिंग का आर्डर दे देंगे, तो सस्ते पड़ जायेंगे। मैं तो अभी से बारह का आर्डर दे कर जा रहा हूं, हर पांच साल पर डिलीवरी ले लूंगा। आपने कित्ते का आर्डर किया। जी हमने पचास का आर्डर किया है, जी पांच साल कौन झेले। हम तो हर साल ही रिप्लेस करवा देंगे। अभी सस्ते पड़ रहे हैं, आगे ये महंगे हो जायेंगे। आप भी आठ-दस ज्यादा ही बुक करा दो। आगे मौका लगे, तो ब्लैक में बेच लेंगे जी।

बहूत डेंजरस सीन है।

अभी सिर्फ पंजाब और हरियाणा से रिपोर्ट आती हैं कि विवाह योग्य लड़कियां उपलब्ध नहीं हैं।

फिर पूरे भारत में यह हो लेगा। च्यांग शाऊ रामकुमार को पीट लेगा। सस्ते का जमाना है।


मुझे लगता है कि नेता भी चीन से आने चाहिए। सस्ते पड़ेंगे।

इंडिया में नेताओँ के चंपू तक हजारों प्लाट खा जाते हैं। हम सिर्फ छोले बेचने वाले मल्होत्राजी की बात नहीं कर रहे हैं। चीनी नेता शायद एकाध प्लाट खाकर या एकाध कार में ही काम कर देंगे।

पर शायद ऐसा नहीं है। चीनी नेता कब चुपके से एकाध प्रदेश पर कब्जा कर लें, यह नहीं पता। चीनी नेता अभी ही धमकी ठोंकते रहते हैं कि अरुणाचल प्रदेश पर हमारा कब्जा है। फिर पूरे देश पर ही कब्जा घोषित ना कर दें।

इस मामले में चीनी नेता ज्यादा डेंजरस हैं।

यहां वाले पांच -सात हजार प्लाटों से मान जाते हैं, वहां वालों को पूरा का पूरा प्रदेश चाहिए।

मुझे लगता है कि चीन से पुलिस वालों की आउटसोर्सिंग होनी चाहिए। इंसपेक्टर चुंग शुंग ली, सस्ते में निपटा देंगे। लोकल जेबकट जितना हफ्ता एक हफ्ते की जेबकटी के लिए देते हैं, उतने में चीनी इंसपेक्टर एक महीने जेबकटी की परमीशन दे सकते हैं। या ये भी हो सकता है कि इंस्पेक्टर चुंग शुंग ली भारत में भी चीनी जेबकटों और उचक्कों को प्रोत्साहित करने लगें। तमाम इंडियन गैंगों की जगह चुंग शुंग गैग, च्यांग काई गैंग वगैरह इंडिया में आपरेट करने लगें। पर सुनते हैं कि ये सस्ते में निपटा देते हैं। हो सकता है कि ये पूरी जेब खाली कराने के बजाय सिर्फ सौ रुपये फी बंदा लूटें, चीन वाले कम में सब्र करते हैं ना।

हां, ज्यादा को लूट लें, यह अलग बात है।

आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

Wednesday, August 15, 2007

देश उर्फ विंडोज 1947

देश उर्फ विंडोज 1947
आलोक पुराणिक
आज सारे मुद्दे एक तरफ फेंकिये, सिर्फ और सिर्फ देश की तरफ देखिये।
भाई साहब, दूर से पास अंधेरे और उजाले का फ्यूजन ही फ्यूजन है, फ्यूजन क्या विकट कनफ्यूजन है।
वैसे, देश क्या है, सोचो तो देश एक बड़ा सा, विकट सा, विराट सा मोबाइल दिखायी पड़ता है, बातें ही बातें। इधर से बातें, उधर से बातें। तरह –तरह की रिंगटोन्स, बातों के झर-झर झरने बह रहे हैं, संसद से, विधानसभाओं से। बात वालों ने बहुत कमाया है, साठ सालों में। हम सिर्फ टेलीकाम कंपनियों की बात नहीं कर रहे हैं। मारे बातों के बुरे हाल हैं, न जाने कितने मिस्ड काल हैं।
इधर से देखो, तो देश किसी ब्यूटी क्रीम का माडल लगता है, झक्कास चिकनत्व से भरपूर, एकदम निश्चिंत। सिर्फ त्वचा की बात करता हुआ। संदेश देता हुआ कि अगर सिर्फ अपने चिकनत्व की चिंता में लग ले बंदा ,तो फुलमफुल निश्चिंतता पैदा हो जाती है। हम सिर्फ सुंदरियों, माडलों की बात नहीं कर रहे हैं, हम नेताओं की बात भी कर रहे हैं।
एक तरफ से देखो, तो देश एक बहुत बड़ा टीवी चैनल लगता है, जहां सिर्फ सेक्स और सेनसेक्स है। अब देश इससे बाहर भी होता है, तो ये देश का प्राबलम है। टीवी चैनल का नहीं।
देश एक तरफ से देखो, तो न्यूयार्क सा लगता है।
देश को दूसरी तरफ से देखो, तो युगांडा लगता है।
इधर से देखें तो देश पक्के तौर पर फिक्स लगता है। युगांडा और न्यूयार्क का रिमिक्स-न्यूगांडा लगता है।

एक तरफ से देखो, तो देश लैपटाप लगता है, विंडोज विस्टा, लेटेस्ट माडल वाला।
दूसरी तरफ से देखो, तो देश विंडोज 98 तो छोड़ो अभी विंडोज 47 भी नहीं दिखता। विंडोज 47 क्या विंडोज 1857 भी नहीं दिखता। एक तरफ से देखो तो देश डार्कनेस वर्जन 2007 लगता है।
वैसे विंडोज क्या, देश एक तरफ से बहुत बड़ा दरवाजा लगता है। मारे जाओ टक्कर, अगर आप एनआरआई नहीं हैं, आप किसी मंत्री के भाई नहीं हैं। किसी मंत्री के घरवाले नहीं, किसी अफसर के साले नहीं हैं।
देश एक तरफ से दरवाजा क्या चोर दरवाजा लगता है, जिससे सारे बाइज्जत बरी प्रयाण कर जाते हैं।
देश एक तरफ से कमाल लगता है, जी एयरकंडीशंड शापिंग माल लगता है।
हां कभी देश निढाल भी लगता है, ठेले के सब्जी वाले का हाल भी लगता है।
फिर देश -हू केयर्स -लगता है, फिर प्रभुओं की चीयर्स लगता है।
वैसे कभी अटका खिर्र-खिर्र गीयर लगता है।
यूं देश कभी आधा-कभी पूरा लगता है, देश जैसे दिल्ली विधानसभा के कैंटीन ठेकेदार का छोला भटूरा लगता है। वैसे देश कभी कैंटीन लगता है, जहां विराट महाभोज चल रहा है, पर सिर्फ विधायकों के लिए, सांसदों का, अफसरों का, तस्करों का, हथियार डीलरों का।
पर दूसरी तरफ से देखो, तो देश वेटर लगता है कि सिर्फ वेट किये जा रहा है। नंबर नहीं आ रहा है।

वैसे तो देश एक विकट प्रपंच लगता है, एक विकट बूफे लंच लगता है, जो खींच लें, वो खा जायें। और जो न खा पायें, वो कहां जायें। ये हम क्यों बतायें, यह देखने के लिए चालू चैनल के प्रोग्राम –नये टूरिस्ट एट्रेक्शन -पर जायें।

खैर, आज सारे अड़गम-बड़गम को भुलायें, स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएं।
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Tuesday, August 14, 2007

मुन्नाभाई व्हाईट हाऊस में

मुन्नाभाई व्हाईट हाऊस में
आलोक पुराणिक
संजय दत्त उर्फ मुन्नाभाई अंदर हो गये, कैद बामशक्कत के लिए। मशक्कत के लिए उनसे कारपेंटरी करवायी जायेगी। मुन्नाभाई कुरसी बनाना ऐसी कि नेता उस पर एक बार बैठे, तो फिर उठ ही ना पाये। नेता सिर्फ एक कुरसी का हो कर जाये तो देश की बहुत सेवा हो जायेगी। शरद पवार साहब सिर्फ कृषि मंत्री की कुरसी के होकर रह जायें, तो देश का क्रिकेट बच जाये। सब सिर्फ अपने-अपने इलाके चौपट करें, क्रिकेट वाले क्रिकेट को और कृषि वाले कृषि को।
बाद में इस कुरसी की डिमांड विदेशों से भी आ सकती है। पाकिस्तान की पब्लिक ऐसी कुरसी को इंपोर्ट करना चाहेगी कि परवेज मुशर्रफ सिर्फ और सिर्फ सेना के जनरल की कुरसी भर के हो कर रह जायें, बाकी देश को चौपट करने का नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो शेयर करें।
चौपटीकरण पर किसी एक कुरसी की मोनोपोली नहीं होनी चाहिए, सब मिल-जुलकर बांट कर चौपट करें, तो पब्लिक कुछेक साल तो कनफ्यूजन में ही निकाल देती है, हल्ला नहीं करती।
इंडिया में मिला-जुला काम होता है, तो सब सेफ रहता है। अब देखिये, दिल्ली विधानसभा कैंटीन के ठेकेदार अशोक मल्होत्रा को कारों के धांसू नंबर, प्लाट किसने दिये थे, यह तय हो पाना अब असंभव है। सरकार वाली कुरसी कह रही है कि ये काम पुराने टाइम का है, बीजेपी के टाइम का। बीजेपी और पुरानी कुरसी पर ठेल सकती है। इतने में तो नये चुनाव आ जायेंगे, और सीबीआई को नये घोटालों पर काम करना पड़ेगा।
वैसे कारपेंटरी करते हुए संजय दत्त को एक कुरसी वाममोर्चा के लिए बनानी चाहिए, जो ऊपर से तो कांग्रेस से अलग सीट दिखाने का फरेब दिखाती हो, पर अंदर –अंदर ऐसे खांचे फिट हों, सब सैटिंग-गैटिंग अंदर से होती रहे। वाममोर्चा के बहुत काम आयेगी ऐसी कुरसी। न्यूक्लियर पर कुछ भी क्लियर ना हो पाये, इस काम आयेगी यह कुर्सी।
खैर मशक्कत के नाम पर कारपेंटरी बहुत आसान सा काम है। सही मायने में सजा देनी हो, कुछ दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। जैसे संजय दत्त को व्हाईट हाऊस ट्रांसफर कर दिया जाना चाहिए। बुश का गाली अफसर बनाया जा सकता है, बोले तो जितनी गालियां बुश खाते हैं, वो संजय दत्त अपने एकाउंट में ले जायेंगे।
वैसे संजय दत्त के लिए यह सजा थोड़ी कड़ी हो जायेगी।
पर इस मामले में संजय दत्त को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि उन्हे बुश द्वारा दिये गये बयानों की कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए, वरना बाद में और कुछेक सालों की सजा झूठ बोलने के आरोप में भी हो जायेगी।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799

Saturday, August 11, 2007

FREEDOM TO BE INSULTED AT HIGHER PRICE

आजादी बेइज्जती के रेट बढ़ाने की

आलोक पुराणिक

15 अगस्त के आसपास वातावरण देशभक्ति टाइप बातों से गचागच हो जाता है। पूरे साल की देशभक्ति इसी दिन भड़भड़ाकर निकलती है, सो ओवरसप्लाई सी हो लेती है। 15 अगस्त, को जैसी कि परंपरा है कि पुराने टाइप के लोग कुछ-कुछ सेंटीमेंटल हो जाते हैं। मैं भी जब बच्चा था, नासमझ था तो सेंटीमेंटल हो लेता था। कुछ-कुछ इसलिए भी कि स्कूल में कोई महान टाइप आते थे और देश प्रेम पर व्याख्यान देते थे और फिर उनके कर-कमलों से लड्डू बंटते थे।

बाद में पता लगा जिसे देश से वो प्रेम करते थे, वह शहर के बारह पेट्रोल पंपों में निहित था। हमें वे सिर्फ लड्डुओं से प्रेम करने छोड़ देते थे। और बाद में पता लगा कि पूरे देश में महान यही कर रहे हैं कि खुद तो पेट्रोल पंप, गैस एजेसियों और फार्म हाऊसों में निहित देश से प्यार कर रहे हैं और पब्लिक को सिर्फ लड्डुओं के आश्वासन से प्रेम करने के लिए कह रहे हैं।

पर नयी पीढ़ी स्मार्ट है। अभी मैंने पूछा एक नये बच्चे से बताओ 15 अगस्त का क्या महत्व है।

उसने बताया-इस दिन से तीन की महाछूट आफर फलां बाजार में मिलना शुरु होता है।

पर बेटा, छूट को छोड़ो, स्वतंत्रता को समझ लो-मैंने समझाने की कोशिश की।

जी मुझे समझ में आ गया कि सबको स्वतंत्रता है , निठारी नोएडा में बच्चे मरने को, किडनैप होने को स्वतंत्र हैं। किडनैपर नोट वसूलने, मारने को स्वतंत्र हैं। दिल्ली में कैंटीन ठेकेदार छोले भटूरे में लपेटकर प्लाट खाने को स्वतंत्र है, सीबीआई इन्क्वायरी न करने को स्वतंत्र है। या वैसी करने को स्वतंत्र है, जैसी वह अब तक सारे घोटालों में करती आयी है।
पुलिस अफसर हत्यारों की चंपूगिरी करने को स्वतंत्र हैं। हत्यारे मंत्री बनने को स्वतंत्र हैं। मंत्री अपने सालों को गुंडागिरी के छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। नेता पुत्र स्मैक मर्डर को स्वतंत्र है। बहुत भारी स्वतंत्रता मची है, सब तरफ। इसे तो स्वतंत्रता कहते हैं ना-बच्चे ने पलट जवाब दिया।

पर बेटा, समझो हम अब वाकई आजाद हैं, अंगरेजों से आजाद हैं-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।

हां, अब हम आजाद हैं, पहले अंगरेज यहां आकर हमारी बेइज्जती करते थे, मुफ्त में। अब शिल्पा शेट्टी आजाद हैं कि वह ब्रिटेन जाकर बिग ब्रदर शो में तीन करोड़ रुपये में बेइज्जत हों। पहले मुफ्त में यहीं गाली खाने की आजादी थी, हम अब अमेरिका जाकर भी गाली खा सकते हैं। बेइज्जती के रेट बढ़ाने की आजादी हो गयी है। यही तो आजादी है ना-बच्चा पूछ रहा है।

आप ही समझाइए कि मैं कैसे समझाऊं कि स्वतंत्रता का क्या मतलब होता है।

चलूं बीस मर्डर, पांच बलात्कारों के बाद बाइज्जत (बरी) हुए नेताजी का स्वागत करुं, कालोनी के समारोह के मुख्य अतिथि वही बने हैं। मुख्य अतिथि इसलिए बनाया है कि वो आयेंगे, तो सड़क नालियां साफ हो जायेंगी। मेरे लिए स्वतंत्रता का मतलब यही है कि सड़क नालियां साफ कराने के लिए किसी बाइज्जत को मुख्य अतिथि बना सकता हूं।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Friday, August 10, 2007

राजा भृतहरि की वैराग्य नवकथा

राजा भृतहरि की वैराग्य नवकथा

आलोक पुराणिक

राजा रथरी ने राज की बात अपनी परम-प्रिय रानी को कही हे सुमुखे, लेटेस्ट मेडिकल टेस्ट में मुझे कैंसर का शक बताया गया है। इस बीमारी का इलाज, सुनते हैं, स्विटजरलैंड में होता है। वहां जाकर अपन इलाज भी करवा आयेंगे। और हाल के हवाई जहाज घोटाले में जो रकम बटोरी है, उसे स्विस बैंक में जमा भी करा आयेंगे। हे रानी, तुम ही एकमात्र ऐसी हो, जिसे राज की यह बात पता है। क्योंकि जिस डाक्टर ने मेरा मेडिकल चेकअप किया था, उसका भी मैंने मर्डर करवा दिया है। मर्डर का इलजाम मैंने उस आधुनिक कवि पर लगवा दिया है, जो सबको कविताएं सुनाकर बोर करता है। मैं यह घोषणा करवा दूंगा कि इस कवि ने उस डाक्टर को अपनी पचास कविताएं जबरन सुना दीं, सो वह बोरियत से मर गया।

रानी यह सुनकर कांप उठी, क्योंकि वह कवि उसका प्रेमी था।

उस रात में कवि-प्रेमी को रानी ने बताया-हे कवि, तू यहां से फूट ले, नहीं तो जिंदगी से ही हूट हो जायेगा। तू जाकर फ्रांस में एनआरआई बनकर सैटल हो जा, फिर भी वहीं आ जाऊंगी। तेरे-मेरे इश्क पर उस बुढ़ऊ राजा का लगा ग्रहण छंटने वाला है, क्योंकि राजा निपटने वाला है। बस यह राज की बात किसी से मत कहना।

कवि प्रेमी यह सुनकर कांप उठा कि उसे रानी के साथ पूरी जिंदगी काटनी पड़ेगी। कवि-प्रेमी तो इस चक्कर में था कि राजा चलता रहे, रानी के साथ चक्कर भी चलता रहे। उसके मुर्गे-मोबाइल-लाइफ-स्टाइल के बिल रानी भरती रहे, संक्षेप में वह रानी की पत्नी बनकर ही कवि से प्रेम करती रहे।

कवि-प्रेमी ने पूरा किस्सा अपनी प्रेमिका नंबर टू को बताया कि यह किसी से ना कहना।

प्रेमिका नंबर टू का भी प्रेमी नंबर टू था-एक दरोगा।

उसने पूरा किस्सा उस दरोगा को बताया।

दरोगा की स्वाभाविक तौर पर एक स्मगलर से दोस्ती थी। एक खाऊ-पीऊ बैठक में दरोगा ने स्मगलर को बताया कि राजा टें बोलने वाला है, नये सेट अप में सैटिंग गैटिंग का जुगाड़मेंट कर लो। यह बात बहुत राज की है, किसी से ना कहना।

स्मगलर का हमजोली एक नेता था। नेता से स्मगलर ने कहा-गुरु राजा टें बोलने वाला है। उसे जाकर समझाओ कि कुछ रकम आपके थ्रू आपके दारु, स्मैक, चरस, कैबरे, हवाला, के धंधे में लगवा दे। बहुत रिटर्न मिलेगा, स्विस बैंकों से ज्यादा। पर यह बात बहुत राज की है, किसी से मत ना कहना।

अगले दिन वह नेता राजा से बात करने गया कि इस विषय पर कि क्यों स्विस बैंकों के चक्कर में पड़ रहे हो, यहीं रकम लगा देंगे धांसू धंधों में।

राजा ने ताड़ लिया कि मामला कुछ सीरियस है। उसने दहाड़ते हुए कहा तुझे मेरी स्विस यात्रा और बीमारी की बात कैसे पता चली, अगर तूने मुझे नहीं बताया, तो मैं तुझे उस कवि की सौ कविताएं सुनने के लिए कवि के कमरे में ठेल दूंगा। बोल।

नेता ने बहुत डरते-डरते पूरा किस्सा बयान किया कि नेता ने स्मगलर से पूछा, स्मगलर ने दरोगा से सुना, दरोगा ने अपनी प्रेमिका से सुना, प्रेमिका ने प्रेमी नंबर वन यानी कवि से सुना, कवि ने अपनी प्रेमिका नंबर वन यानी रानी से सुना और रानी ने राजा से सुना।

भरथरी का दिल टूट गया। समझ में आ गया कि दुनिया गोल है और गोलमाल भी। वैराग्य फुल धड़ल्ले से दिल में एंट्री ले गया। यही निश्चय करके वो सब कुछ छोड़कर जंगल जाने का निर्णय सुनाने रानी को आयेमन में सोच रहे थे कि अगर रानी माफी मांगेगी, तो साथ ले चलूंगा। रानी से उन्होने वैराग्य की इच्छा जतायी।

ओ के गो अहेड-लेकिन स्विस खातों के सीक्रेट नंबर तो मुझे देते ही जाओ। माया का त्याग कर रहे हो, तो अपनों की झोली में ही करो ना।

रानी के ऐसे वचन सुनकर भरथरी को मौका-ए-वारदात पर ही खटाक मोक्ष प्राप्त हो गया।

बोल नोटाय नम्, बोल खोटाय नम्।

आलोक पुराणिक

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Thursday, August 9, 2007

BEGGARS OF DELHI

दिल्ली के भिखारी

आलोक पुराणिक

दिल्ली में आईटीओ चौराहे पर दिल्ली में एक नौजवान भिखारी भीख मांग रहा था। मैंने कहा- भीख मांगते हो, अरे कुछ मेहनत किया करो।

भिखारी ने मुझसे पूछा-क्या आपने कभी भीख मांगी है।

मैंने हैरान होकर कहा-नहीं।

फिर आपको क्या पता कि भीख मांगना कितनी मेहनत का काम है-भिखारी ने बताया।

सच्ची में भीख मांगना बहुत मुश्किल काम है, ये पता लग रहा है दिल्ली सरकार चलानेवालों को देखकर। बार-बार पब्लिक को बताना पड़ता है कि देखो यूपी वाले पानी की भीख नहीं दे रहे हैं, दे रहे हैं, तो पूरा नहीं दे रहे हैं।

खबर है कि उत्तर प्रदेश सरकार भिखारियों का रिकार्ड तैयार कर रही है। उत्तर प्रदेश सरकार भिखारियों की गिनती करायेगी। मैं यह सोचकर डर रहा हूं- सारे दिल्ली वाले भी उसमें शामिल किये जायेंगे क्या।

दिल्ली वाले रोज यूपी सरकार से पानी मांगते हैं और साहब किस अंदाज से मांगते हैं। जैसे उधार वसूल रहे हों, जैसे पानी की भीख देना उत्तर प्रदेश सरकार का कर्तव्य हो।

बहुत पहले, बहुत पहले मैंने एक हास्टल का भिखारी देखा था। हास्टल शहर से थोड़े दूर बने कालेज का था। भिखारी हास्टल में लड़कों के कमरे के बाहर फुल जोरदारी से अपना कटोरा बजाता था और कहता था कि समझ लो, यहां आकर भीख मांग रहा हूं, तुम पर अहसान कर रहा हूं। वरना इत्ती दूर कौन आता है मांगने। चलो दे दो, तुम भी क्या याद रखोगे, इत्ती दूर आया मैं तुम्हे पुण्य का मौका देने।

दिल्ली वाले जब पानी मांगते हैं, तो ऐसे ही लगते हैं-यूपी गवर्नमेंट हमको थैंक्यू के साथ पानी दो, पुण्य का मौका दिया।

ये दिल्ली का कैरेक्टर है, मांगने का भी इस्टाइल है।

अब यूपी वाले पानी दे रहे हैं, जो नेताओं के ईमान से थोड़ा कम गंदा है।

दिल्ली वाले इस पर हाय-हाय कर रहे हैं-हाय गंदा पानी।

वैसे इस मौके का मुहावरा हो सकता है-भीख के पानी की गंदगी नहीं देखी जाती।

पर नहीं, दिल्ली का कैरेक्टर है, दिल्ली की स्टाइल है। दिल्ली वाले दान की बछिया के भी दांत गिनते हैं।

यूपी वाले इस पर आगे कह रहे हैं-दिल्ली को पानी गंदा ही मिलेगा, क्योंकि दिल्ली वाले यमुना को इतनी गंदी करके आगे भेजते हैं। दिल्ली में जब यमुना घुसती है, तो साफ होती है, निकलती है, तो गंदी हो चुकी होती है।

ये भी साहब दिल्ली का कैरेक्टर है, कई नेता, सांसद जब दिल्ली में पहली बार घुसते हैं, तो

साफ होते हैं, जब यहां से निकलते हैं, तो यमुना से भी ज्यादा गंदे हो चुके हैं।

दिल्ली का कैरेक्टर है। दिल्ली की स्टाइल है।

दे दीजिये, अबे दे दे, नहीं देगा, तेरी तो ..................कुछ भिखारीनुमा आवाजें आ रही हैं।

मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि ये पैसे मांगने वाले भिखारी हैं या यूपी से पानी मांगने वाले भिखारी।

आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

Sunday, August 5, 2007

SUNDAY FUNDAS- NIGHTINGALE TO CROWS

संडे सूक्ति-राष्ट्र के कऊए, बहुराष्ट्रीय तोंद

आलोक पुराणिक

बच्चों के सवाल ऐसे टेढ़े हो रहे हैं कि सारा ज्ञान ढेंचू लगता है।

मैं कल बच्चों को बता रहा था कि उन विदुषी नेत्री को पूरा राष्ट्र सम्मान से राष्ट्रीय कोकिला के नाम से पुकारता था।

एक बच्चे ने पूछा-सर अगर राष्ट्रीय कोकिला हो सकती हैं, तो फिर राष्ट्रीय कऊए भी हुए होंगे। राष्ट्रीय गिद्ध भी हुए होंगे। राष्ट्रीय सफेद हाथी भी हुए होंगे। राष्ट्रीय सियार भी होंगे। राष्ट्रीय उल्लू भी होंगे।

बच्चे की बात में दम है।

फुल चिड़ियाघर की संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए।

अभी इस बवाल से जूझ रहा था कि दूसरा सवाल खड़ा हो गया।

मैं समझा रहा था कि स्वतंत्रता संग्राम में आदरणीय वल्लभ भाई पटेल महात्मा गांधी के दायें हाथ जैसे थे।

दूसरे बच्चे ने पूछा-जी जब नेता दायां हाथ हो सकता है, तो कोई नेता कुछ और भी हुआ होगा। पुराने नेता हाथ हो सकते थे, तो नये नेता तोंद भी हो सकते हैं। जैसे हम कह सकते हैं, कि अलां नेता फलां नेता की तोंद हैं। मतलब कि अलां नेता फलां नेता के बिहाफ पर खाते हैं। वैसे इस हिसाब से तो यूं भी हो सकता है कि फलां नेता अलां नेता की जेब हैं। यानी वो कमा के लाते हैं, और इनकी जेब में डाल देते हैं, फिर ये प्रापर्टी, शेयर, तस्करी में यथोचित लगाते हैं।

वैसे देखा जाये, तो लगभग सारे नेता या तो देश की तोंद हैं या देश की जेब हैं।

बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वो वाले नेता तो राष्ट्रीय तोंद हैं, और वो वाले नेता बहुर्राष्ट्रीय तोंद हैं। मतलब राष्ट्रीय वाले तो सिर्फ लोकल डील में खाते हैं और इंटरनेशनल सौदे वगैरह के कट-कमीशन बहुराष्ट्रीय तोंद के खाते में जाते हैं।

वो वाले नेता इन वाले नेता के मुंह हैं, यानी उनके बिहाफ पर बकवास ये करते हैं।

या वो वाले इन नेता की लात हैं। यानी उनके बिहाफ पर ये गुटबाजी करते हैं, विरोधियों को लात जमाते हैं। लात, मुंह, तोंद, इनके अलावा नेता और क्या हो सकते हैं।

जी कुछ राष्ट्रीय कऊए हो सकते हैं। कोकिला होना तो बंद हो गया है। कऊओं की है- परमानेंट काऊं-काऊं, धारावाहिक चुनाव दर चुनाव। इलाका दर इलाका।

सियार भी हो सकते हैं। हुआं, हुआं, कुछ ना हुआ। पूरे पांच साल की भाषणबाजी हुआं-हुआं के सिवाय क्या है। अपने सेरी-भत्ते बढ़वाने हों, तो सारे एक ही सुर में हुआं-हुआं। वैसे एक दूसरे पर हुआं-हुआं। कई नेताओँ को देखो, तो तरस सा आता है, हाय कैसा फील कर रहे होंगे, पहले इस पार्टी पर हुआं करते थे, अब इस पार्टी की तरफ से हुआं कर रहे हैं।

पर सियार इतने सेंसिटिव होकर सोचने लगें, तो वो सियार कहां रह जायेंगे। और अगर सियार नहीं रह जायेंगे, तो पालिटिक्स में क्या करेंगे। फिर तो आम आदमी हो जायेंगे और सब आम आदमी हो गये, तो समस्या पैदा हो जायेगी।

सियार के मुंह और तोंद में शिकार किसका जायेगा।

आलोक पुराणिक

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