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Thursday, August 16, 2007

शमशान में मोबाइल

शमशान में मोबाइल
आलोक पुराणिक
और सर कैसे हैं, क्या हाल हैं। क्या जोरदार लेख है आपका। तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद और भारतेंदु हरिश्चचंद्र के बाद पहली बार किसी ने इस विषय को इस तरह से उठाया है। वैसे लेख में कहीं-कहीं शेक्सपियर और बर्नार्ड शा की भी झलक मारती है।
उनको मोबाइल पर काल करके मैं चमचागिरी का भरपूर निवेश करने की कोशिश कर रहा था।
निवेश का रिटर्न मुझे यह चाहिए था कि उनकी मैगजीन में मुझे अपने खेमे के एक लेखक का इंटरव्यू छपवाना था।
देखिये मैं फिलहाल शमशान में हूं, किसी परिचित का क्रिया कर्म हो रहा है-उधर से ठंडा सा जवाब आया।
शमशान में मोबाइल, सो बंद अपनी फाइल।
शमशान ने मेरा खेल खराब कर दिया।
अब चमचागिरी को शमशान से उठाकर फिर कायदे से जमाने में बहुत वक्त लग जायेगा।
खैर शमशान वाले हादसे एक तरकीब हाथ लग गयी। जिसे मोबाइल पर बात न करनी हो, उससे कह दो-मैं फिलहार शमशान में हूं। सो जी , मैंने इस तरकीब का जमकर इस्तेमाल किया। थोड़े ही दिनों में यह हाल हो लिया कि उधर से मोबाइल पर काल करने वाला पूछे-आप शमशान में तो नहीं हैं।
फिर खंडन करना पडा की अपन ने शमशान में कोई दुकान नहीं खोली है।
ये मोबाइल बहुत मारक यंत्र है जी। जैसे आप इधर से कहें , बधाई, गुरु बहुत स्मार्ट कन्या के साथ दिख रहे थे माल रोड पर।
तो उधर से नाराज स्वर उभर सकता है-अबे स्मार्ट के बच्चे, मैं फिलहाल अस्पताल में हूं। उसी कन्या के भाईयों ने मुझे जमकर धुना है। पुराने टाइप के टेलीफोनों में यह खतरा नहीं था।
पुराने टाइप के फोनों में हद से हद यह होता था कि बंदा अपने घर पर ना मिले। या दफ्तर में न मिले। अब मोबाइल पर बंदा मिल तो जाता है, पर किस हाल में मिलेगा, इसका कुछ अता-पता नहीं होता।
बड़े –बुजुर्गों ने ने जब कहा होगा कि कोई बात समय और स्थान देखकर कहनी चाहिए, तब उनके दिमाग में मोबाइल ना रहा होगा। मोबाइल पर समय तो हम तय कर सकते हैं। जैसे आपके साथी का प्रमोशन हुआ हो, तो उसे प्रमोशन की खबर मिलते ही बधाई दे दीजिये। वह खुश होकर ले लेगा। कुछ समय बाद अगर उसे पता लग जाये कि उसके साथी का भी प्रमोशन हो गया है तो वह बधाई देने वालों पर हिंसक हमले भी कर सकता है। प्रमोशन तब ही तक प्रमोशन लगता है, जब तक कि साथी को ना मिले।
समय का ध्यान रखते हुए खट से बधाई दे दीजिये। पर स्थान का मामला पेचीदा है।
हमें क्या मालूम की मोबाइल काल रिसीवक कहां है, तमाम मोबाइलों में कुछ सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि खट से पता लग जाना चाहिए कि काल रिसीवक कहां है। जैसे अगर यह पता लग जाये कि बास अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ लोदी गार्डन में है, तो इस हिसाब से रणनीति तय कर ली जाये। बास अच्छे मूड में हो, तो अपने प्रतिद्वंद्वी की बुराई की जा सकती है। यह बताया जा सकता है कि कि सर बहुत दिन हुए, कुछ टूर का जुगाड़मेंट नहीं ना हुआ। सर इंक्रीमेंट का महीना एकैदम करीब आ रहा है,क्या इस साल भी वही पिछले साल वाला।
इस तरह की बातें तब बिलकुल नहीं हो सकतीं, जब बास को उसकी बीबी डांट रही हो, इस बात के लिए कि इस उम्र में भी गर्लफ्रेंड की सूझती है, शर्म नहीं आती।
मोबाइल से एक बात इधऱ और सीखी है। अगर नियमित झूठ बोलना हो, तो साऊंडप्रूफ मोबाइल होना चाहिए, जिसमें अपनी आवाज के अलावा कोई और आवाज न आये। एक बार मैं घर से निकला काम की कहकर औरकभी खुशी, कभी गम देखने चला गया। वहां मोबाइल पर पत्नी का काल आया, तो उसने हड़काया-ये कौन गा रहा है-ना जुदा होंगे हम, कभी खुशी कभी गम।
मोबाइल ने मरवा दिया। धर-पकड़ हो ली।
चलूं एक साऊंडप्रूफ मोबाइल खरीद लाऊं, आज फिर चुपके से एक फिल्म मारनी है।
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Thursday, August 2, 2007

MOBILE OF AKBER THE GREAT

बादशाह अकबर का मोबाइल
आलोक पुराणिक

जिस दौर में चपरासियों तक का काम भी मोबाइल बगैर नहीं चल रहा है, मैं सोच रहा हूं कि अकबर जैसे बादशाह ने अपनी हुकूमत बगैर मोबाइल कैसे चलायी होगी।
कैसे, कैसे अकबर फतेहपुर सीकरी से फास्ट कांटेक्ट करने होंगे-अकबराबाद के उस कोतवाल से, जिसे सलीम की गतिविधियों पर नजर रखने का जिम्मा दिया गया होगा। कोतवाल
साहब बच गये तब। अब का सा टाइम होता , तो अकबर हर मिनट की रिपोर्ट मोबाइल पर मांगते। नेटवर्क एरिया से सलीम बाहर निकल जाते, तो कोतवाल की नौकरी खतरे में पड़ जाती।
अब तो कुछ मोबाइ
ल सेवाएं ये भी बता सकती हैं कि जिससे बात की जा रही है, वह शहर के किस इलाके में हैं, कनाट प्लेस या राजा गार्डन में। फंस जाते सलीम-घर कह कर जाते कि राजा गार्डन जा रहा हूं-कालेज में पढ़ने के लिए।
उधर से अकबर फोन करके पता लगा लेते कि सलीम कनाट प्लेस में है, अनारकली के साथ। बहुत आफत हो जाती, सलीम मियां सही टाइम पर धरती पर आकर सही टाइम पर ही ऊपर को कट लिये। अब के सलीम-अनारकलियों के लिए बहुत आफत है।
मैं देखता हूं अपनी क्लास में, कई बच्चे मोबाइल आन करके बैठते हैं।
मैं मोबाइल आफ करने के लिए कहता हूं, तो कहते हैं-सर आपकी आवाज मोबाइल के थ्रू पापा तक पहुंच जायेगी तो उन्हे तसल्ली हो जायेगी कि हम क्लास में ही हैं। वरना पापा समझेंगे कि हम कहीं लफंटूशी कर रहे हैं। पापा हमारी नहीं सुनते, मोबाइल की गवाही सुनते हैं।
अकबर भी यही करते, थमाते मोबाइल सलीम को और कहते कि जाओ क्लास से अपने उस्ताद की आवाज मोबाइल के जरिये सुनवाओ।
वैसे सलीम स्मार्ट होते, तो करते यह कि खुद अनारकली से बातचीत में बिजी हो जाते और अपना मोबाइल उस छात्र को थमा देते, तो क्लास में रेगुलर जाता हो।

जरा सोचिये, कैसे बीरबल बगैर मोबाइल बगैर ए
सएमएस चुटकुलों के बादशाह के मनोरंजन के लिए नये-नये मनोरंजक किस्से गढ़ते होंगे। बहुत पेचीदा सवाल है। है ना। भले निपट गये, अकबर उस दौर में। अब का सा मामला होता, तो आफत हो लेती। रोज –रोज नयी चाल के मोबाइल फोन आते और नवरत्न डिमांड करते कि अब पांच लाख मुद्राओं वाला नया मोबाइल दिलवाइये ना।
बड़ी आफत होती- जब अकबर को पता चलता कि एकदम लेटेस्ट चाल के नये नौ मोबाइल फोनों के लिए जितनी रकम चाहिए, उसके जुगाड़मेंट के लिए लाहौर के किले का डिसइनवेस्टमेंट करके उसे बाजार में बेचना होगा।
बड़ी आफत होती-अकबर इंटेलेक्चु्अलाना अंदाज में दीन-ए-इलाही पर प्रवचन दे रहे हैं ।
और बीरबल बोरियत से बचने के लिए कतई नान-इंटेलेक्चुअल एसएमएस चुटकुले पढ़ रहे हैं, मोबाइल पर। या अचानक रहीम का मोबाइल घनघना उठता, कोई कवि हैं उधर लाइन पर। पूरा कवित्त मोबाइल पर ही सुनाने पर आमादा हैं। रहीम कह रहे हैं कि थोड़ी देर बाद बात करुंगा।
उधर वाला कवि कह रहा है कि बस एक मिनट, असली लाइनें तो अब आने वाली हैं।
ऊपर वाले को शुक्रिया कहिये, बादशाह अकबर ऊपर जन्नत में बैठकर कि भईया सही टाइम पर धरती से वापस होकर ऊपर आ लिये। नहीं क्या।
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Wednesday, July 25, 2007

कुछ फेयर औऱ हैंडसम प्रश्नोत्तर-महिलाएं इसे एकदम ना पढ़ें

आलोक पुराणिक

सवाल-महिलाओं के लिए फेयर एंड लवली क्रीम थी पर पुरुषों के लिए फेयर एंड हैंडसम क्रीम आयी है। क्या पुरुषों को लवली नहीं होना चाहिए। उनका काम सिर्फ हैंडसम होने से चल जाता है क्यों।

जवाब- हैंडसम का मतलब है हैंड में सम यानी रकम, तब ही पुरुष का मामला जमता है। उनका काम सिर्फ लवली होने से नहीं चलता। वैसे अब तो महिलाओं का भी हैंडसम होना जरुरी है। सिर्फ लवली के बाजार भाव बहुत डाऊन हैं।

सवाल-जो पुरुष फेयर एंड हैंडसम नहीं लगाते, वे क्या हैंडसम नहीं होते।

जवाब-नहीं चुपके से लगाते होंगे। बताते नहीं है, क्या पता बाद में बतायें। जैसे बरसों तक अमिताभ बच्चन की शानदार एक्टिंग देख कर सब समझते रहे कि अमिताभजी की मेहनत-समर्पण इसके पीछे है। पर उन्होने अब जाकर बताया कि वो वाला तेल, ये वाली क्रीम, ये वाला कोल्ड ड्रिंक, वो वाला च्यवनप्राश इसके लिए जिम्मेदार हैं। असली बात लोग बाद में बताते हैं जी।

सवाल-पुरुष हैंडसम हो जाये, तो क्या होता है।

जवाब-बेटा क्लियर है, ज्यादा कन्याएं उसकी ओर आकर्षित होती हैं।

सवाल-क्या पुरुष के जीवन का एकमात्र लक्ष्य यही है कि कन्याएं उसकी ओर आकर्षित हों।

जवाब-नहीं इमरान हाशमी की तमाम फिल्में देखकर पता लगता है कि पुरुषों का लक्ष्य दूसरों की पत्नियों, विवाहिताओं को आकर्षित करना भी होता है।

सवाल-मैं अगर फेयर एंड हैंडसम लगाऊं और फिर भी सुंदरियां आकर्षित न हों, तो क्या मैं कंपनी पर दावा ठोंक सकता हूं।

जवाब-नहीं, तमाम इश्तिहारों के विश्लेषण से साफ होता है कि सुंदरियां सिर्फ क्रीम लगाने भर से आकर्षित नहीं होतीं। इसके लिए वह वाला टायर भी लगाना पड़ता है। इसके लिए वो वाली बीड़ी भी पीनी पड़ती है। इसके लिए वो वाली सिगरेट भी पीने पड़ती है। इसके लिए वो वाली खैनी भी खानी पड़ती है। इसके लिए वो वाला टूथपेस्ट भी यूज करना पड़ता है। इसके लिए वो वाला कोल्ड ड्रिंक भी पीना पड़ता है।

सवाल-बंदा इसी सब में सुबह से शाम तक बिजी हो जायेगा, तो फिर वह और काम क्या करेगा।

जवाब-हां,यह सब इश्तिहारों में नहीं बताया जाता कि सुंदरियों को आकर्षित करना पार्ट-टाइम नहीं फुल टाइम एक्टिविटी है।

सवाल-तमाम इश्तिहार पुरुषों से आह्वान करते हैं कि वे ये खरीद कर या वो खऱीद कर सुंदरियों को आकर्षित करें, पर सुंदरियों से यह आह्वान नहीं किया जाता कि वे ये वाला टायर खरीदकर या वो वाली सिगरेट पीकर या बीड़ी पीकर या टूथपेस्ट यूज करके पुरुषों को आकर्षित करें। इसका क्या मतलब है।

जवाब – इसका यह मतलब है कि इस देश की महिलाएं सहज और स्वाभाविक रुप से आकर्षक हैं, पर ऐसा पुरुषों के बारे में नहीं कहा जा सकता। सो महिलाओँ को आकर्षित करने के लिए उन्हे किसी टायर, किसी सिगरेट, किसी बीड़ी की जरुरत पड़ती है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं इस देश की महिलाएं स्मार्ट और आकर्षक हैं।

और पुरुष ढीलू, चिरकुट, घोंचू च घामड़ हैं।


आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

Tuesday, July 24, 2007

होनोटूंबू महाद्वीप की खोज

होनोटूंबू महाद्वीप की खोज
आलोक पुराणिक
बताओ अहमद शाह अब्दाली दिल्ली पर चढ़ाई करने में सफल क्यों हो गया।
क्योंकि जीटी करनाल रोड पर उन दिनों ट्रेफिक नहीं होता था। अब का सा टाइम होता, तो ट्रेफिक में फंस जाता। ना दिल्ली की तरफ बढ़ पाता, ना पीछे की और जा पाता।
भिखारी भीख मांग-मांगकर परेशान कर देते। ट्रेफिक जाम के चक्कर में खीरे वाले खीरे के भाव बढ़ा देते। खीरे खरीदने में ही लूट का सारा माल खत्म हो लेता।
फिर भी ट्रेफिक नहीं खुलता। पता चलता कि आगे बीचों-बीच सड़क पर एक ट्रक खराब हो गया है। ट्रक के पुरजे लेने के लिए ड्राइवर करोलबाग दिल्ली गया है, पैदल। परसों लौटेगा।
मार ट्रेफिक की झाऊं-झाऊं में ही नादिर शाह की सेना दम तोड़ देती।
बड़े-बड़े युध्दवीर भारतीय ट्रेफिक से परास्त हो जाते।
ट्रेफिक अपने आप में युध्द सा है जी।
देखिये किसी सुबह या शाम, कैसे कतार में कार वगैरह एक के बाद खड़े होते हैं। मानो कहीं युध्द के लिए प्रयाण हो रहा हो। वैसे ट्रेफिक का मामला इधर से गौर से देखा, तो बहुत बातें नजर आयीं। इधर हुआ यूं कि आगरा स्थित एक मित्र ने लव मैरिज की और दिल्ली स्थित एक मित्र ने भी लव मैरिज की। छह महीने बाद आगरा से लडाई-झगड़े के समाचार आने लगे। दिल्ली शांत थी।
पूछताछ की तो पता चला कि पति महोदय तो दिल्ली से गुड़गांव नौकरी करने जाते हैं, और पत्नी करीब चालीस किलोमीटर ड्राइव करके जाती है।लड़ाई-झगड़े का सारा कोटा दोनों रास्ते में अलग -अलग निपटा कर लौटते हैं।

आगे की कार वाले को गालियां, पीछे की कार वाले की गालियां। उस बंदे को सामूहिक गालियां,जिसकी कार सड़क के बीचों-बीच पंक्चर हो गयी हो।

मुझे लगता है कि बुश इतनी गालियां साल भर में भी नहीं खाते होंगे, जितनी गालियां बीच सड़क में खराब कार का मालिक खाता है।

जिसे सहनशीलता बढ़ाने का कोर्स सिखाना हो, उसकी कार खराब करके सड़क के बीचों-बीच खड़ा कर दो। सारा हेकड़ी फरार हो जायेगी।
मार हार्न पे हार्न। रास्ते में इतनी मार-धाड़ हो लेती है कि घर पर चाऊं-चाऊं के लिए ऊर्जा ही नहीं बचती।
यह ट्रेफिक का सकारात्मक पक्ष है। घरों में शांति इसलिए है कि बंदा निचुड़ कर लौटता है, अब झगड़ा कैसे हो। संडे को झगड़े का टाइम मिलता है, तो बंदा उसमें पड़ोसियों से झगड़े कि घर वालों से। जिन शहरों में ट्रेफिक ज्यादा होता है, उन शहरों में घरों में शांति रहती है।
ट्रेफिक बढ़ता है, तो बंदों में कोलंबस प्रवृति बढ़ती है, वो नये-नये इलाके ढूंढ़ते हैं। एक बार मैंने दिल्ली में एक जगह कार पार्किंग की ठीया तलाशने की कोशिश की और वह तलाशने की कोशिश में चलता गया, चलता गया, बाद में मुझे पता लगा कि मैं बीकानेर के आसपास हूं।


भविष्य में बंदे इस लपेटे में नये द्वीप या नये महाद्वीप तलाश सकते हैं।
नया इतिहास यूं लिखा जायेगा-होनोटूंबू महाद्वीप किसने खोजा था।
आलोक पुराणिक ने, पार्किंग स्पेस की तलाश में वह बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत ही दूर निकल गये, वहां नया महाद्वीप मिल गया जी।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Thursday, July 19, 2007

बिप्स के लिप्स की टिप्स

बिप्स के लिप्स की टिप्स..........
आलोक पुराणिक
उस टीवी चैनल का रिपोर्टर कुछ दिनों से कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिख रहा है। उसने तीसरी बार मेरी प्रशंसा की। प्रशंसा को लेकर अपना फंडा यह है कि अगर कोई एक बार प्रशंसा करे, तो इसे शिष्टाचार मानना चाहिए।
दूसरी बार प्रशंसा लिफ्टाचार की वजह से की जा सकती है। अगर किसी के कार-स्कूटर पर लिफ्ट चाहिए, और लगातार चाहिए, तो इस तरह की प्रशंसा आम तौर पर कर दी जाती है।
पर तीसरी बार की प्रशंसा में भ्रष्टाचार को सूंघना चाहिए। मैं भ्रष्टाचार को सूंघने लगा। मैंने पूछा-गुरु क्या खेल है। फोकटी में प्रशंसा क्यों।
वह बोला-जी आपने जितने आइडिये मुझे मजाक-मजाक में दिये थे, उन सब पर हमारे टीवी चैनल ने प्रोग्राम बना लिये हैं। सारे के सारे हिट जा रहे हैं। कुछ और आइडिये दीजिये ना।
क्या मतलब-मैंने पूछा।
देखिये हमारे बास का कहना है कि जितने भी घटिया टाइप लेखक हैं, उन सबके पास हिट टीवी प्रोग्रामों के लिए बहुत ही कारगर आइडिये हैं। सो सर आपको पकड़ा है-वह बिलकुल भक्ति भाव से बोला।
उसके मुंह पर छाई सच्चाई देखकर मुझे लगा कि उसने यह बात सच में मेरे सम्मान में ही कही है। सो साहब, इस खाकसार ने कुछ और आइडिये उस टीवी चैनल को दिये हैं। आप भी गौर फरमायें-
बाबी चार्मिंग की गुड मार्निंग
बाबा इधर टीवी पर बहुत हो लिये हैं। अब बाबी चाहिए। कुछेक स्मार्ट बाबियों की सख्त दरकार हैं। ये स्मार्ट बाबियां अगर ये बतायें कि जीवन क्षण –भंगुर हैं, तो कई दर्शक इस क्षण को ही जीवन का सार्थक क्षण मानकर देखेंगे। बल्कि इसमें कुछ अमेरिकन कन्याओं को बतौर अध्यात्म गुरु पेश किया जाये। कार्यक्रम का नाम हो- बाबी चार्मिंग की गुड मार्निंग ।
अमेरिकन बाबी को लाने से प्रोग्राम कुछ अपमार्केट बनेगा। क्या है कि देसी बाबाओं से मार्केट डाऊन मार्केट हो जाता है। नहीं चलेगा।
इस प्रोग्राम में क्या होगा, जी वही होगा, जो और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में होता है।
थोड़ा सा सत्य-सत्य, बाबाजी के प्रचचनों ने हमे इतना सुखी बनाया-यह बताते हुए बाबाजी के कुछ भृत्य, फिर अंत में बाबीजी के कुछ नृत्य।

बिप्स के लिप्स के टिप्स
यह प्रोग्राम बिपाशा बसु पेश करेंगी। या जो लड़की पेश करे, उसका नाम बिपाशा रख दिया जाये। बिपाशा को अपमार्केट इलाकों में यही कहा जाता है-बिप्स।
वह ब्यूटी की टिप्स बतायेंगी, सिर्फ मर्दों को।
कमर का साइज कम करने के लिए करेले का जूस टमाटर के छिलकों में मिलाकर खायें, पानी की कैलोरी कम करने के लिए उसे उस स्पेशल छलनी से छानें, जिसका निर्माता यह प्रोग्राम स्पांसर करेगा।
बताओ साइज, ले जाओ प्राइज-यह कांटेस्ट इस प्रोग्राम में चलाये जायेगी।
इसमें पूछा जायेगा कि बताओ बिपाशा की जीन्स का साइज क्या है 30, 32, 36, 38, जिस दर्शक का उत्तर सही होगा, उसे बिपाशा अपनी एक जीन्स बतौर गिफ्ट देंगी, स्पेशल प्राइज पर सिर्फ पांच हजार रुपये पर सिर्फ।
आप ही बताइए। प्रोग्राम चलेगा या नहीं।
आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

Friday, July 13, 2007

पतली गली की बाईक भावना के पक्ष में

पतली गली की बाईक भावना के पक्ष में

आलोक पुराणिक

गर्मी बढ़ रही ना-उन्होने कहा।

जी बढ़ रही है।

बाइक गर्मियों में बहुत अनकमफर्टेबल सी हो जाती है-उन्होने एक चाबी घुमाते हुए कहा।

अब मेरे कान खड़े हो गये।

मैंने कहा-बधाई नयी एल्टो कार के लिए।

चकराकर उन्होने बताया कि अरे मैंने तो आपको बताया ही नहीं कि मैंने एल्टो ले ली है।

जी मुझे पता है -7979798790879098773 मामलों का अनुभव है कि जब कोई टू व्हीलर वाला अपने स्कूटर या बाइक को अनकमफर्टेबल बताये या कहे कि दिल्ली की सड़कों पर बाइक सेफ नहीं रही या यह कहे कि बच्चे बहुत जिद कर रहे थे कि अब तो कार ले ही लो, या कहे कि बाइक पर फेमिली के साथ जाने बहुत दिक्कत होती थी। तो समझ लेना चाहिए कि अगला एल्टो पर शिफ्ट हो गया है, पहले मारुति 800 पर शिफ्ट होते थे।

कार वाले दो तरह के होते हैं-एक वो जो कार से कार पर शिफ्ट होते हैं। जैसे एल्टो से जेन पर गये। जेन से क्वालिस पर चले गये। क्वालिस से मर्सीडीज पर चले गये, इस तरह की शिफ्टिंग कार समाज का आंतरिक मामला है। वैसे आपसी मारधाड़ कार समाज में भी यूं है कि यहां मर्सीडीज वाला मारुति 800 वाले को ऐसे देखता है जैसे न्यूयार्क वाला युगांडा वाले को देखता है, या जैसे दिल्ली में ग्रीन पार्क वाला मंगोलपुरी और त्रिलोक पुरी वाले को देखता है या मुंबई में नरीमन पाइंट वाला मीरा रोड वाले को देखता है।

यह कार समाज के आंतरिक मसले हैं, इससे मुझे शिकायत नहीं है।

कार पर शिफ्ट होने वाले दूसरे तरह के वो बंदे हैं, जो बाइक से एल्टो या कुछ मामलों में मारुति 800 पर शिफ्ट होते हैं। इनसे मुझे शिकायत है। कार पर जाना अच्छा है। पर बाइक को अनकमफर्टेबल और अनसेफ बताना अच्छा नहीं है। सच्ची बताओ, इस मुल्क में कमफर्ट में कौन है जी, जो सिर्फ बाइक को ही अनकमफर्टेबल बताओ। और इस मुल्क में सेफ कौन है, जो सिर्फ बाइक को ही अनसेफ बताओ।

दिल्ली में लू से मरे, गुजरात में पानी से मरे।

साहबजी, इस मुल्क में मामला सेफ और अनसेफ की चाइस का नहीं है।

मामला ये चाइस का है कि किस तरह से अनसेफ होना पसंद है। हैजे वाली अनसेफ्टी पसंद है या पीलिया वाली। गाजियाबाद में अपहरण की अनसेफ्टी पसंद है या मुंबई में किसी भाई की धमकी की अनसेफ्टी। चाइस यही है।

बताइए, सेफ कौन है। रेलगाड़ी में आईएएस महिला के साथ छेड़ाखानी हो ली।

चाइस इस अनसेफ्टी की है कि गुंडे द्वारा छेड़ाखानी हो या डीआईजी साहब द्वारा।

सेफ कोई नहीं है, तो सिर्फ बाइक को ही अनसेफ क्यों बताओ जी।

वैसे बाइक को गौर से देखें, तो इसमें छिपा देश के विकास का हाल है। बाइक पैदल और कार के बीच का संक्रमण काल है।

बाइक उस मंझोले नेता की तरह से है, जिससे कईयों के कई काम निकलते हैं।

बाइक, फुटपाथ के ऊपर से, सड़क के किनारे कच्चे से, गढ्ढे में घुस कर फिर निकलने, दो कारों के बीच जरा से फासले से ऐसे, वैसे या कैसे भी निकल जाने की खालिस भारतीय जिजीविषा का प्रतीक है।

बाइक इस देश में पतली गलियों से निकालक है। हमारा देश पतली गली प्रधान है। जो कहीं भी पतली गली तलाश लेता है, वही आगे बढ़ जाता है।

बाइक उन कारोबारियों की शुरुआती सिचुएशन का प्रतीक है, जिन्होने नियमों के ट्रैफिक से तमाम पतली गलियां निकाली और आगे निकल गये।

बाइक भावना यह है कि हर बाइक वाला दूसरे बाइक वाले की इतनी चिंता करता है कि दिन में भी अगले की हैडलाइट जली हो, तो उसे हाथ के इशारे से बताता है कि भईया बुझा ले।

परस्पर एक-दूसरे की बत्ती बुझाने की उत्कट अभिलाषा को हमारे समाज की केंद्रीय भावना नहीं कहा जा सकता क्या।

सो कुल मिलाकर मसला यह है कि हे बाइक से कार के प्रयाणकर्ता कार पर जा, बार बार जा, पर जरा मुहब्बत से जा। बाइक को यूं अनकमफर्टत्व और अनसेफत्व के डंडे से पीटते हुए तो ना जा।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799