Saturday, August 4, 2007

SOME CHOLESTEROL,MANY PHOTOS

चंद तस्वीरें बुतां और कुछ कोलस्ट्रोल
आलोक पुराणिक
देखोजी कैसी-कैसी फ्राडबाजी है दुनिया में। कैसा भला सा नाम है कोलस्ट्रोल, जैसे लुईस कैरोल, जैसे पामेला एंडरसन, जैसे शिंडी क्राफर्ड, पर कोलस्ट्रोल की हरकतें देख लो। एक ज्ञानी हार्ट –स्पेशलिस्ट ने बताया कि कोलस्ट्रोल दिल का ट्रेफिक जाम कर देता है।
बड़ी विकट सी कल्पना उभरती है -दिल के एक कोने में इस हसीन की तस्वीर है, दिल के उस कोने में उस हसीन की तस्वीर हैं, कि कोलेस्ट्रोल कूद लिया है, सबको साफ करता हुआ। खुद जमता हुआ। दिल के ट्रेफिक में कोलस्ट्रोल भभ्भड़ मचाये हुए है। जगह ना मिलने पर दिल का ट्रेफिक जाम करता हुआ, राम नाम सत्य है।
सच, किसी हसीन की तस्वीर तो छोड़ो, तस्वीर के ख्याल से ही कोलस्ट्रोल का हौला बैठ जाता है कि हसीन को जगह दे देंगे, तो कोलस्ट्रोल को निकलने की जगह कैसे मिलेगी। जगह नहीं मिलेगी, तो ट्रेफिक जाम हो जायेगा। मेरी सलाह यह है कि मनचलों, लुच्चों को कोलस्ट्रोल कोर्स के तहत खौफनाक तरीके से यह समझा दिया जाये कि कोलस्ट्रोल की निकासी की राह ठीक-ठाक रखनी है, तो दिल को खाली रखो, किसी हसीन का ख्याल तक न करो।
एक हिट शेर है ना-बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला, चंद तस्वीरे बुतां औऱ कुछ हसीनों के खतूत
ये शेर अब कुछ इस तरह से रिवाइज किया है
-बाद हार्ट अटैक के दिल से ये सामां निकला, कुछ हसरते नाकाम और कुछ कोलस्ट्रोल।
खैर, मेरे मित्र लोग खुश न हों, मुझे हार्ट अटैक नहीं हुआ है। दिल के एक्सपर्टों से यूं ही बातचीत हो गयी।
पुराना वक्त अच्छा था, जब कोलस्ट्रोल नहीं होता था।
तब दिल में कईयों को जगह दी जा सकती थी। इधर जैसे-जैसे नालेज बढ़ी है, इंसान को नये-नये टेंशनात्मक तरीकों से डराने का जुगाड़ हो गया है। एक कोलस्ट्रोल फ्री बटर का पैकेट देख रहा था, उसमें लिखा था-जिसमें लिखा था-रिफाइन्ड वेजीटेबल आयल्स, स्किम्ड मिल्क पाऊडर, कामन साल्ट, इमल्सिफाइर्स, स्टेबलाइजर्स, क्लास टू प्रीजर्वेटिव्स, सीक्वेस्टरिंग एजेंट्स एंड एंटीआक्साइडेंट्स, विटामिन ए नाट लैस दैन 30 आईयू-जी, विटामिन डी 2 आईयू-जी, विटामिन ई 3 एमजी। दो-चार शब्दों के अलावा इसमें कुछ समझ नहीं आया। जिसे सिर्फ मक्खन समझकर खाया जा रहा है, उसमें एजेंट्स पड़े हैं, सीक्वेस्टरिंग एजेंट। दूसरे ज्ञानी ने बताया कि इससे भी खतरा है। खतरा सिर्फ आईएसआई के एजेंट से नहीं है, सीक्वेस्टरिंग एजेंस से भी है।
खतरे कोलस्ट्रोल में तो हैं ही, उसकी अनुपस्थिति में अन्य खतरे हैं।
कोलस्ट्रोल से बचे बंदा, तो क्या पता किडनैप ही हो जाये। किडनैप न हो, तो क्या पता भारतीय रेल में दुर्घटनाग्रस्त हो जाये। रेल से बचे, तो रेल के पानी से मर जाये, जो ज्ञानदत्तजी( http://hgdp.blogspot.com/) की रेल में कुछ लोग पिलाते घूम रहे हैं।
अजी इंडिया में इतनी वजहें हैं मरने की, अकेले कोलस्ट्रोल को क्या ब्लेम करें।
तो क्या करें, भरपूर मक्खन खाकर कोलस्ट्रोल जनित हार्ट-अटैक से मर जायें।
नहीं,हार्ट अटैक में यही आफत है कि काम इतना चटापट हो जाता है कि मरने वाला मरने का मजा भी नहीं ले पाता। वैसे, मरने का मजा तो सिर्फ कैंसर में होता था, जिसमें बंदा पुराने दौर के राजेश खन्ना युग के हीरो की तरह कई गाने गाते हुआ एकाधिक सुंदरियों को प्रभावित करने का डौल जमा लेता था। राजेश खन्ना की आनंद देखकर मैंने भी एक बार इच्छा व्यक्त की, कि हाय मौत हो, तो कैंसर से। इस पर घऱवालों ने बहुत डांटा कि बहुत खर्च हो जाता है कैंसर में, इतने पैसे कहां से आयेंगे। अधिकांश लेखकों के घऱ वाले सौंदर्यबोध को नहीं समझते, कैंसर के खर्च को देखते हैं, इसके कला पक्ष को नहीं। घर वालों ने कहा कि मरना हो,तो रोड एक्सीडेंट में मरो, या हार्ट अटैक में, न्यूनतम खर्च में। फिर अमेरिका स्थित सारे रिश्तेदारों ने कहा, देखो गर्मी की छुट्टियों में मरना, वरना नहीं आ पायेंगे। अमेरिका में अपने मरने की छुट्टी भी नही मिलती।
सो साहब जी रहे हैं। लेखक की आत्मा बहुत सख्त होती है, अरे जिसे प्रकाशकों की बेरुखी, रायल्टी पेमेंट भुगतान की देरी, आलू-उड़द के बढ़ते भाव नहीं मार सकते, उसे कोलस्ट्रोल क्या मार लेगा। चलो दिल खोलकर मक्खन खायें। कोलस्ट्रोल तेरी ऐसी-तैसी।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

11 comments:

अनूप शुक्ला said...

दिल के ट्रेफिक में कोलस्ट्रोल भभ्भड़ मचाये हुए है। क्या डायलाग है। आपका लिखा पढ़ने से चाय अच्छी लगने लगी है। अंतिम आवाहन जानदार है-लेखक की आत्मा बहुत सख्त होती है, अरे जिसे प्रकाशकों की बेरुखी, रायल्टी पेमेंट भुगतान की देरी, आलू-उड़द के बढ़ते भाव नहीं मार सकते, उसे कोलस्ट्रोल क्या मार लेगा। चलो दिल खोलकर मक्खन खायें। कोलस्ट्रोल तेरी ऐसी-तैसी।

Gyandutt Pandey said...

सुप्रभात पुराणिक भाई. यह स्ट्रॉल (सवेरे की सैर) का समय है. कहां कोल-स्ट्रॉल को ले आये. बगीचे में जाइये. वहां दिल भी होगा, दिल फैंक भी और नामुराद कोल-स्ट्रॉल भी कम होगा.
सबेरे की पोस्ट तो आपने कर दी है. बस लत्तावाला (वाकिंग) जूता पहनिये और कोल-स्ट्रॉल को मारिये गोली. हमारी मानेंगे तो 8 नहीं 12 दशक चलेंगे! :)

Neeraj Rohilla said...

पुराणिकजी,

ये कोलेस्ट्रोल हमें डरा के दिखाये तो जाने,
दो परांठो पर १०० ग्राम मक्खन रख के खाते हैं फ़िर भी ससुरा न तो १ ग्राम वजन वढता है । पता नहीं सारा खाना जाता कहाँ है :-)

वैसे कोलेस्ट्रोल से बचना हो तो थोडा दौडना भागना शुरू कर लीजिये, मुम्बई में हों तो मुम्बई मैराथन में नाम लिखवा लीजिये, :-)

yunus said...

जे अच्‍छी रही । मुंबई मेराथन भेज दो । अरे नीरज भाई मैराथन की जरूरत दिल्‍ली वालों को ज्‍यादा है । मुंबई में रहना तो वैसे भी मैराथन में दौड़ने जैसा है । दूध शूद लस्‍सी वस्‍सी घी शी खात्‍ते हैं जी । दिल्‍ली में बारह मैराथन शुरू कराईये और सबमें आलोक जी को भी दौड़ाईये ।

अरुण said...

अब कहा मिलता है जी कोले वाला स्टाल.अब तो रेलवे स्टेशनो पर गैस के चूल्हे लगे है जी..और फ़ोटो आपने एक भी नही दिखाई..ज्ञान जी से ही माग लेते ..ये ज्ञान जी के चक्करो मे मत आईयेगा,इस उमर मे दिल फ़ेकोगे कोई कैच करेगा नही,खामखा दिल जमीन पर गिरेगा,कही चोट फ़ेट लग गई तो और डाक्टर का खर्चा,अब ज्ञान जी को कौन बताये ये दिल्ली और आस पास अब दिल बस सोफ़्टवेयर लाईन के लोगो के ही कैच किये दिये और लिये जाते है..इस लाईन मे मास्साबो का नंबर कही नही आता..:)

पुनीत ओमर said...

भाई बाकी सब तो ठीक है पर एक पुरानी कहावत हमने भी सुन रखी है कि भूत पिशाच जिन्न और लेखकों की उम्र बड़ी लम्बी होती है। इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते। आलोक जी, आप नाहक ही परेशान हैं। जब तक ये मिशनरी पाठक हैं यहाँ आपके ब्लॉग में, आप चाहें तो भी आपको कुछ नहीं होने वाला। आखिर पिशाचगीरी थोड़ी बहुत हम पाठकों के खून में भी दौड़ती है (और वो भी बिना कोलेस्ट्रॉल के)तो बेफ़िक्र होकर व्यस्त रहें-मस्त रहें। आपकी दीर्घायु के लिये शुभकामनायें। वैसे बाकी सब ठीक ही है।

Sanjeeva Tiwari said...

लेखक की करूण कथा
आपका दिल चोक करे कोलस्‍ट्राल दिमाग चोक न करे, नहीं तो हमें चाय नास्‍ते में ऐसे सुविचार कहां मिल पायेंगें ।

आमीन

संजीव का आरंभ

Sanjeet Tripathi said...

विशेष नोट-: मक्खन खाने के लिए कम और लगाने के लिए ज्यादा उपलब्ध और फ़ायदेमंद है!

anuradha srivastav said...

किसी की सहानुभूति तो नहीं बटोरनी थी ,आखिर ये दिल का मामला है ।

bhuvnesh sharma said...

कालेस्ट्राल बेचारा कहां आ फ़ंसा :)

Udan Tashtari said...

लेखक की आत्मा बहुत सख्त होती है, अरे जिसे प्रकाशकों की बेरुखी, रायल्टी पेमेंट भुगतान की देरी, आलू-उड़द के बढ़ते भाव नहीं मार सकते, उसे कोलस्ट्रोल क्या मार लेगा। चलो दिल खोलकर मक्खन खायें। कोलस्ट्रोल तेरी ऐसी-तैसी।


--बहुत सही. वैसे कैलेस्ट्राल जैसे ट्रेफिक जाम को अर्जुनारिष्ट से साल में दो बार १५-१५ दिन साफ करें और अभी आने वाले कई दशकों तक ब्रह्मांड के सबसे बडे व्यंगकार के लेख धड़धड़ाते हुये छापते रहें. वाकई, कोलस्ट्रोल तेरी ऐसी-तैसी। :)