Thursday, August 23, 2007

जो खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी बुश उर्फ कविता

जो खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी बुश उर्फ कविता
आलोक पुराणिक
तो साहब मिल गया इस खाकसार को ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला सम्मान। जी साहब यह बहूत धांसू साहित्यिक पुरस्कार है, इसे उखर्रा के वरिष्ठ साहित्यप्रेमी और आगरा में सफल पूड़ी की दुकान चलाने वाले फत्तेमल गुत्थी ने दिया है। गुत्थी फत्तेमलजी का तखल्लुस है, जिसके जरिये वह साहित्य की दुनिया में दखल रखते थे , वैसे थे क्या हैं।
क्यों जी आप हंस क्यों रहे हैं. फत्तेमल पूड़ी वालेजी के साहित्यप्रेम पर।
ये गलत बात है, आईएएस अफसर कवि हो लेते हैं, सब म्याऊं भाव में स्वीकार कर लेते हैं। अगला काम आयेगा।
और तो और हरिराम ट्रेफिक हवलदार को भी कईयों ने कवि घोषित कर रखा है, टाइम-बेटाइम चालान के बदले रकम नहीं वसूलता, दो-चार कवित्त सुना देता है।
और जो ये इनकम टैक्स वाले साहित्यकार हैं, उन्हे भी आप कालजयी साहित्यकार घोषित करने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वो आपका माल बचाने की ताकत रखते हैं।
बस फत्तेमलजी को आप नहीं मान रहे हैं ना।
वैसे,फत्तेमलजी बचपन से साहित्य प्रेम रखते थे, पिताजी की पूड़ी की दुकान थी।
पिताजी ने कह रखा था –पूड़ी में घाटा न हो, तो एकाध ऐब बेटा पाल सकता है, सिगरेट, सिनेमा से लेकर लेखन तक।
और साहब फत्तेमल जी ने क्या रिजल्ट दिये। फत्तेमलजी की पूड़ी की दुकान पर हर हफ्ते एक नया बैनर टंगता था, जिसमें उनकी पूड़ी की शान में ऐसे कुछ कवित्त कहे जाते थे-
हो जायें खुश
जो खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी बुश

किसी ने फत्तेमल से कहा कि आप इस तरह से बुश के नाम का इस्तेमाल पूड़ी बेचने में कर रहे हो, बिना उनकी परमीशन के।
इस पर फत्तेमल ने कहा कि बुश चाहें, तो फत्तेमल का नाम यूज कर सकते हैं अपना कोई आइटम बेचने में। फत्तेमल को कोई आपत्ति नहीं होगी।
एक कवित्त कुछ इस टाइप का था-
मन में बज उठेंगे धांसू ढोल
जो आप खायें ट्रिपल उखर्रा पूड़ी गोल

किसी ने कहा-ये ढोल और गोल की तुकें कुछ ठीक नहीं हैं। इस पर फत्तेमलजी ने जवाब दिया, देखो पूड़ी ठीक होने के गारंटी हम देते हैं, तुकों के ठीक होने की गारंटी नहीं।

कुछ ने कहा, फत्तेमल से कि आप आधुनिक कविता की ओर भी उन्मुख हों, सिर्फ तुक वाली कविताओं में भिड़े रहने में कोई तुक नहीं।
फिर फत्तेमल आधुनिक कविता की ओर कुछ यूं मुड़े-
पूड़ी, गोल तुम भी
और दुनिया भी गोल
गोल-गोल चक्र में घूमता धूम्र वलय
वलय से गुजरती हुई ट्रेन
ट्रेन का धुआं,
धुएं में सोचता मैं कि मैं धुआं हूं या धुआं फत्तेमल हो गया है

इस तरह की कविताओं को आधुनिक कवियों ने बहूत सराहा। बल्कि आधुनिक कवियों का गोष्ठी केंद्र बन गयी उनकी पूड़ी की दुकान। बाद में हुआ यूं कि कविगण पूड़ी भी खाने लगे। फत्तेमल के पिताजी को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। पर और बाद में यूं हुआ कि कविगण पूड़ी उधार खाने लगे।
यह बात फत्तेमल के पिताजी को नागवार गुजरी और उन्होने आधुनिक कविता को खारिज कर दिया। इस तरह से फत्तेमल के पिताजी उन आलोचकों की श्रेणी में खड़े हो गये, जिन्होने आधुनिक कविता को मान्यता देने से इनकार कर दिया था।
(जारी रहेगा कल भी )
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

5 comments:

Sanjeet Tripathi said...

हा हा!!
तो आपने भी नई छोड़ा "कविता" को, लपेट ही लिया न अपने अगड़म-बगड़म में।

ज्ञान दद्दा और शुकुल जी, कित्थे हो भई, उठो, सुब्बो हो गई, आलोक जी पोस्ट ले के टपक गए हैं आंगन में।

अनूप शुक्ला said...

कविता कानन में आप गज केशरी की तरह टहल रहे हैं या पूड़ी बेंच रहे हैं।

Gyandutt Pandey said...

आलोक पुराणिक का सम्मान,

बरास्ता पूड़ी की दुकान

मालिक फत्तेमल
चलाते कवियों का अस्तबल!

बस इससे ज्यादा कविता नहीं बन रही. बन गयी तो उसे बतौर पोस्ट ठेल लेंगे!

परमजीत बाली said...

कविता के हवन कुंड में आप के फत्तेमल जी की कविताएं व आपका लेख, ट्रिपल उखर्रा पूड़ी वाला सम्मान। जो बहूत धांसू साहित्यिक पुरस्कार है,लगत है आप को ही मिलेगा।:(
इतना बढिया जो लिखते हैं आप।

Ashok Kaushik said...

यू आर सिंपली ग्रेट सर जी। ग़ज़ब ढा दिया। ये बुश मार्का पूड़ी का भी खूब जिक्र किया। लेकिन यूं खुलेआम बुश का महिमा-मंडन (या कि मुंडन..???) करके आप नाहक वामपंथियों का ध्यान खींच रहे हैं। क्यूं जनाब फत्तेमल को वामपंथियों के निशाने पर ला रहे हैं...कहीं ये मनमोहिनी सरकार बचाने की कोशिश तो नहीं है...