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Monday, August 27, 2007

भगीरथजी मुनि की रेती पर उर्फ भगीरथ -गंगा नवकथा

भगीरथजी मुनि के रेती पर उर्फ भगीरथ गंगा नवकथा

आलोक पुराणिक

गंगा को जमीन पर लाने वाले अजर-अमर महर्षि भगीरथजी स्वर्ग में लंबी साधना के बाद जब चैतन्य हुए, तो उन्होने पाया कि भारतभूमि पर पब्लिक पानी की समस्या से त्रस्त है। समूचा भारत पानी के झंझट से ग्रस्त है। सो महर्षि ने दोबारा गंगा द्वितीय को लाने की सोची। महर्षि भारत भूमि पर पधारे और मुनि की रेती, हरिद्वार पर दोबारा साधनारत हो गये।

मुनि की रेती पर एक मुनि को भगीरथ को साधना करते देख पब्लिक में जिज्ञासा भाव जाग्रत हुआ।

छुटभैये नेता बोले कि गुरु हो न हो, जमीन पक्की कर रहा है। ये अगला चुनाव यहीं से लड़ेगा। यहां से एक और कैंडीडेट और बढ़ेगा। बवाल होगा, पुराने नेताओं की नेतागिरी पर सवाल होगा।

पुलिस वालों की भगीरथ साधना कुछ यूं लगी-हो न हो, यह कोई चालू महंत है। जरुर साधना के लपेटे में मुनि की रेती को लपेटने का इच्छुक संत है। तपस्या की आड़ में कब्जा करना चाहता है।

खबरिया टीवी चैनलों को लगा है कि सिर्फ मुनि हैं, तो अभी फोटोजेनिक खबरें नहीं बनेंगी। फोटोजेनिक खबरें तब बनेंगी, जब मुनि की तपस्या तुड़वाने के लिए कोई फोटोजेनिक अप्सरा आयेगी। टीआरपी साधना में नहीं, अप्सराओं में निहित होती है। टीवी पर खबर को फोटूजेनिक होना मांगता।

नगरपालिका वालों ने एक दिन जाकर कहा-मुनिवर साधना करने की परमीशन ली है आपने क्या।

भगीरथ ने कहा-साधना के लिए परमीशन कैसी।

नगरपालिका वालों ने कहा-महाराज परमीशन का यही हिसाब-किताब है। आप जो कुछ करेंगे, उसके लिए परमीशन की जरुरत होगी। थोड़े दिनों में आप पापुलर हो जायेंगे, एमपी, एमएलए वगैरह बन जायेंगे, तो फिर आप परमीशन देने वालों की कैटेगरी में आयेंगे।

भगीरथ ने कहा-मैं साधना तो जनसेवा के लिए कर रहा हूं। सांसद मंत्री थोड़े ही होना है मुझे।

जी सब शुरु में यही कहते हैं। आप भी यही कहते जाइए। पर जो हमारा हिसाब बनता है, सो हमें सरकाइये-नगरपालिका के बंदों ने साफ किया।

देखिये मैं साधु-संत आदमी हूं, मेरे पास कहां कुछ है-भगीरथ ने कहा।

महाराज अब सबसे ज्यादा जमीन और संपत्ति साधुओं के पास ही है। न आश्रम, न जमीन, न कार, न नृत्य की अठखेलियां, ना चेलियां-आप सच्ची के साधु हैं या फोकटी के गृहस्थ। हे मुनिवर, आजकल साधुओं के पास ही टाप टनाटन आइटम होते हैं। दुःख, चिंता ,विपन्नता तो अब गृहस्थों के खाते के आइटम हैं-नगरपालिका वालों ने समझाया।

भगीरथ यह सुनकर गुस्सा हो गये और हरिद्वार-ऋषिकेश से और ऊपर के पहाड़ों पर चल दिये।

भगीरथ को बहुत गति से पहाड़ों की तरफ भागता हुआ सा देख कतिपय फोटोग्राफर भगीरथ के पास आकर बोले देखिये, हम आपको जूते, च्यवनप्राश, अचार कोल्ड ड्रिंक, चाय, काफी, जूते, चप्पल जैसे किसी प्राडक्ट की माडलिंग के लिए ले सकते हैं।

पर माडलिंग क्या होती है वत्स-भगीरथ ने पूछा।

हा, हा, हा, हा हर समझदार और बड़ा आदमी इंडिया में माडलिंग के बारे में जानता है। आप नहीं जानते, तो इसका मतलब यह हुआ कि या तो आप समझदार आदमी नहीं हैं, या बडे़ आदमी नहीं हैं। एक बहुत बड़े सुपर स्टार को लगभग बुढ़ापे के आसपास पता चला कि उसकी धांसू परफारमेंस का राज नवरत्न तेल में छिपा है। एक बहुत बड़े प्लेयर को समझ में आया कि उसकी बैटिंग की वजह किसी कोल्ड ड्रिंक में घुली हुई है। आप की तेज चाल का राज हम किसी जूते या अचार को बना सकते हैं, बोलिये डील करें-फोटोग्राफरों ने कहा।

देखिये मैं जनसेवा के लिए साधना करने जा रहा हूं-भगीरथ ने गुस्से में कहा।

गुरु आपका खेल बड़ा लगता है। बड़े खेल करने वाले सारी यह भाषा बोलते हैं। चलिये थोड़ी बड़ी रकम दिलवा देंगे-एक फोटोग्राफर ने कुछ खुसफुसायमान होकर कहा।

(जारी कल भी)

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Saturday, August 25, 2007

भूत नाग ये वाले

आलोक पुराणिक

खबर है कि शरद पवारजी ने अपनी सांसद बिटिया को सलाह दी है कि संसद में टाइम वेस्ट ना करो, जाओ इलाके में जाकर काम करो।

संसद में नेता ज्यादातर टाइम वेस्ट ही करते हैं, यह पब्लिक तो हमेशा मानती है।

पर नेता कभी-कभार ही मानते हैं। चलो शरद पवारजी मान गये।

इलाके में जाकर नेता टाइम वेस्ट करे, तो पता लग जाता है कि वहां टाइम वेस्ट करना भी आसान नहीं है। बिजली नहीं है, कि सो कर किया जा सके। पानी नहीं है कि नहाकर किया जा सके। हां दारु के ठेके हैं, पीकर किया जा सकता है। खाने का जुगाड़ हो ना हो, पर पीने का जुगाड़ जरुर हो सकता है। पिछले दस सालों में राशन की जितनी दुकानें बंद हुई हैं, उतनी दुकानों से दोगुनी दारु की दुकानें खुल गयी हैं।

पब्लिक के खाने पर सरकार का खर्च होता है, पब्लिक के पीने से सरकार कमाती है।

पब्लिक के लिए मैसेज है-खाने के काम नेताओं के लिए छोडो, पीने का काम कर लो।

खैर मसला यह है कि सरकार जा रही है। नहीं, बच रही है। मार चपर-चूंचूं मची हुई है।

वैसे मैं खुश हूं। इस घपड़चौथ में एक काम अच्छा हुआ है कि टीवी चैनलों से नाग-भूत-प्रेत कम हो गये हैं। उस बिल्डिंग में जाते हुए नाग, इस बिल्डिंग से निकलते भूत टाइप कार्यक्रम टीवी चैनलों पर कुछ कम आ रहे हैं।

उस बिल्डिंग में जाते हुए नेता, उस बिल्डिंग से निकलते हुए नेता-इस टाइप के कार्यक्रम टीवी पर ज्यादा आ रहे हैं।

वैसे टीवी के एक गहरे जानकार का मानना है कि बेसिकली हैं ये भी भूत-नाग ही। यहां से निकल कर वहां चले जाते हैं, करना-धरना इन्हे भी कुछ भी नहीं हैं, सिवाय पब्लिक को डराने के।

अभी कल मिले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, कह रहे थे कि अमेरिका के साथ 123 का डील क्या हुआ, नौ दो ग्यारह होने की नौबत आ गयी।

मैंने कहा जी बच रहे हो, कि 123 पर नौ दो ग्यारह होने का सीन है। वरना प्याज-धनिया के भावों पर नौ दो ग्यारह होते।

नेता हंसने लगा-बोला प्याज-धनिया के भावों की चिंता हम नहीं करते। प्याज धनिया अब जो अफोर्ड कर सकते हैं, वे उस कैटेगरी के लोग हैं, जो किसी भी चीज के भाव नहीं पूछते। और जो पूछते हैं, वो धनिया और टमाटर को ज्वैलरी की तरह मानने लगे हैं, रोज यूज नहीं करते। ज्वैलरी के भावों पर सरकार आज तक नहीं गयी।

वैसे सोचिये, नेताजी गलत कह रहे हैं क्या।
आलोक पुराणिक

मोबाइल-09810018799

Monday, August 20, 2007

ईयर-फोन का सामाजिक और राजनीतिक योगदान

ईयर फोन का सामाजिक और राजनीतिक योगदान

आलोक पुराणिक

आविष्कार इसे ही कहते हैं साहब।

ईयर फोन का आविष्कार जिसने किया हो, किया हो। पर ईयर फोन के सामाजिक राजनीतिक योगदान पर शोध इस खाकसार ने की है।

एक कार्डलैस ईयर फोन में लगाये हुए मैं एमपी थ्री प्लेयर सुन रहा था।

ईयर फोन और एमपी थ्री प्लेयर इधर नेताओं के ईमान के माफिक हो चले हैं, हर नया एडीशन पुराने के मुकाबले सिकुड़ा हुआ मिलता है।

बल्कि अब तो लेवल गायब होने के लेवल पर आ लिया है, सो साहब, कार्डलैस ईयर फोन और एमपी थ्री प्लेयर गायब से थे, दिख ही नहीं रहे थे।

पत्नी सामने आयी -कुछ कहा।

मुझे ईयर फोन में वही गीत सुनायी दिया -तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया- साथ होगा।

पत्नी ने बाद में बताया कि उसने असल में कहा था-जाने किस बुरी घड़ी में तुमसे शादी हुई थी। हे भगवान, अगले जन्म में इस चिरकुट को अगर पृथ्वी पर भेजो, तो मुझे मंगल ग्रह का प्राणी बनाना, ताकि शादी की कोई आशंका ना बने।

पत्नी ने बाद में तारीफ करते हुए कहा-तुमने मेरी बात का बुरा नहीं माना।

मैंने बताया कि मुझे तुम्हारा यह संदेश सुनायी दे रहा था-तू जहां -जहां चलेगा, मेरा साया साथ-साथ होगा।

कार्ड लैस ईयर फोन बहुत करतब कर सकता है जी।

उधर से भले ही यह मैसेज ब्राडकास्ट हो रहा है कि हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आये कभी तो मत रोना।

पर ईयर फोन यह संदेश सुना सकता है-आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जाता।

सासों और बहुओं के संबंध एक झटके से सुधरने के ट्रेक पर आ जायेंगे।

एक कार्डलैस ईयर फोन सास के कान में, एक बहू के कान में।

सास इस सुकून के साथ धुआंधार सुना सकती है कि देखो बहू तो अब पलट कर जवाब ही नहीं देती।

बहू फुल कांफीडेंस के साथ कह सकती है-सुनाये जाओ, किसने सुननी है।

मुझे एक और सीन दिखायी पड़ रहा है।

संसद में सब परस्पर एक दूसरे के कान में हल्ला ठोंकने के ईयर फोन खौंस कर अपने ही कान में हल्ला मचा रहे हैं।

वामपंथी सांसदों के ईयर फोन से ये गीत आ रहा है-तू मेरा दुश्मन, दुश्मन मैं तेरा,...

कांग्रेसी ईयर फोनों से यह गीत झर रहा है-चैन से हमको कभी इक पल जीने ना दिया......

भाजपाई ईयर फोनों से यह संदेश निकल सकता है-हम को भी गम ने मारा, तुमको भी गम ने मारा, हम सबको गम ने मारा।

बसपा के ईयरफोन-चल चल मेरे हाथी- पर झूम रहे हैं।

संसद झूम बराबर झूम हो रही है।

क्या कहा जी, फिर संसद में काम क्या होगा।

जी जैसे अभी बहुत होता है।

अजी जो हल्ला अभी है, वह बहुत असंगठित टाइप का है। फिर कुछ क्रियेटिव टाइप का हल्ला होगा।

कभी कुछ राष्ट्रीय एकता टाइप कुछ दिखाना हो, तो सारे ईयर फोनों में एक ही गीत बजाया जा सकता है-मिले ईयर फोन मेरा-तुम्हारा तो, सुर बने हमारा।

कुछ इंटरनेशनल सीन देखिये।
जरा सोचिये
, बुश कुछ कहें, तो सारे ईयरफोन ठोंक ले।

फोकटी में रियेक्शन देने में भी टाइम क्यों जाया करना।

कहे, जाओ बुश जो कहना है। तुम्हारे कहने से होता क्या है।

सोचिये, बुश अपना बयान धकेल रहे हैं।

इधर से ईयर फोन से शकीरा अपना सुपर हिट गाना सुना रही हैं--हिप्स डोंट लाई।

शकीरा का संदेश नये संदर्भों में समझा जा सकता है-हिप्स डोंट लाई। बट बुश लाईस।

सच के मामले में ज्यादा पाक- साफ किसे माना जाये।

क्या ही धांसू च फांसू सीन उभरेगा। मुशर्रफ पाकिस्तान में डेमोक्रेसी और बेनजीर भुट्टो के संदर्भ में पब्लिक को कुछ भाषण ठेल रहे हैं।

सबको ईयर फोन पर सिर्फ यही सुनायी दे रहा है-तुम अगर मुझसे ना निभाओ, तो कोई बात नहीं। तुम किसी गैर से निबाहोगी, तो मुश्किल होगी।

साहब सच्ची का एक किस्सा और सुनिये। इधर स्वतंत्रता दिवस के सिलसिले में आयोजित एक समारोह में मैं तमाम नेताओं के भाषण सुनने एक प्रोग्राम में चला गया।

जाने क्या-क्या अगड़म-बगड़म नेता लोग बोलते रहे, पर मुझे ईयर फोन में सिर्फ यही सुनायी दिया-हम लूटने आये हैं, हम लूटकर जायेंगे।

आलोक पुराणिक

मोबाइल-9810018799

Saturday, July 21, 2007

शेरनी पर कूड़ा

शेरनी पर कूड़ा
आलोक पुराणिक
दूर से देखने पर तो वह ट्रक लग रहा था। और था भी।
थोड़ी कम दूरी से देखा तो उस पर लिखा था-विधायक की शेरनी-।
शेरनी पर बहुत कूड़ा लदा हुआ था।
शेरनी नगर निगम के ठेके पर चल रही थी । विधायकजी पहले जेबकट थे, फिर लघुस्तरीय चक्कूबाज हुए। कालांतर में प्रगति करते हुए विधायक हुए। विधायक होकर ट्रांसपोर्ट का काम खोला, जिसके तहत कई शेरनियां चल रही थीं। इनमें कई तो नगर निगम का कूड़ा ढो रही थीं। कुछ शेरनियां यमुना से रेत चुरा कर रेत के ठेकेदारों की मदद कर रही थीं। चार शेरनियां उन मुहल्लों में पानी की सप्लाई लेकर जाती थीं, जिन मुहल्लों में पानी की सप्लाई को विधायक के बंदे ग़डबड करा देते थे। इस तरह से विधायक की शेरनियां पानी बेचने के कारोबार में भी संलग्न थीं। हां, विधायकजी के दारु के ठेकों पर दारु पहुंचाने के काम भी इन्ही शेरनियों से लिया जा रहा था।
लोग शेरों की दशा पर चिंतित हो रहे हैं। शेरनियों का क्या हाल है, इस पर सोचने की फुरसत किसी के पास नहीं है।
वाइल्ड लाइफ वाले इस और कुछ ध्यान दें ना, शेरनियों के नाम पर ना जाने क्या-क्या हो रहा है।
अभी देखा एक बहुत जबरजंग जब्बर टाइप का ट्रक, जिसने कल स्कूली बच्चों से भरी वैन को मार गिराया था। बच्चों का नसीब, बच गये।
ट्रक पर लिखा था-मालिक का पैसा, ड्राइवर का पसीना
रोड पर चलती है, बन के हसीना।
जिसे हसीना बताया जा रहा था, उस पर लगभग हत्या की जिम्मेदारी थी।
अरे हसीनाओं, मिलकर प्रोटेस्ट करो कि तुम्हारा नाम कहां-कहां लिया जा रहा है।
जबरजंग ट्रक हसीना हुआ जा रहा है, कोई रोकने वाला नहीं है।
ट्रकों में ऐसा-ऐसा कुछ हो रहा है, कि राष्ट्र का ध्यान उस ओर जाना चाहिए।
एक और बहुत कातिल टाइप का ट्रक देखा, उस पर लिखा हुआ था-आई तुझा आशीर्वाद (मां तेरा आशीर्वाद)। ट्रक धडधडाता हुआ दौड़ रहा था, सडक के किनारे एक खोमचे को उसने लगभग उड़ा ही दिया था। ये अगर किसी मां का आशीर्वाद है, यह सोचकर मन घबराता है। भारतवर्ष की सारी मांओं को एक परिवहन मंत्रालय से मांग करनी चाहिए कि ट्रकों पर यह लिखना बंद हो-मां तेरा आशीर्वाद।
मांओं कुछ करो। अपने आशीर्वाद का ऐसा ट्रकीकरण न होने दो।
जरा यह भी सोचिये, अगर किसी मां का आशीर्वाद यह ट्रक है, तो उस मां के शाप क्या होंगे-शायद वे हवाई जहाज, जो इराक पर बम बरसाते हैं। नहीं क्या।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799