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Wednesday, July 25, 2007

कुछ फेयर औऱ हैंडसम प्रश्नोत्तर-महिलाएं इसे एकदम ना पढ़ें

आलोक पुराणिक

सवाल-महिलाओं के लिए फेयर एंड लवली क्रीम थी पर पुरुषों के लिए फेयर एंड हैंडसम क्रीम आयी है। क्या पुरुषों को लवली नहीं होना चाहिए। उनका काम सिर्फ हैंडसम होने से चल जाता है क्यों।

जवाब- हैंडसम का मतलब है हैंड में सम यानी रकम, तब ही पुरुष का मामला जमता है। उनका काम सिर्फ लवली होने से नहीं चलता। वैसे अब तो महिलाओं का भी हैंडसम होना जरुरी है। सिर्फ लवली के बाजार भाव बहुत डाऊन हैं।

सवाल-जो पुरुष फेयर एंड हैंडसम नहीं लगाते, वे क्या हैंडसम नहीं होते।

जवाब-नहीं चुपके से लगाते होंगे। बताते नहीं है, क्या पता बाद में बतायें। जैसे बरसों तक अमिताभ बच्चन की शानदार एक्टिंग देख कर सब समझते रहे कि अमिताभजी की मेहनत-समर्पण इसके पीछे है। पर उन्होने अब जाकर बताया कि वो वाला तेल, ये वाली क्रीम, ये वाला कोल्ड ड्रिंक, वो वाला च्यवनप्राश इसके लिए जिम्मेदार हैं। असली बात लोग बाद में बताते हैं जी।

सवाल-पुरुष हैंडसम हो जाये, तो क्या होता है।

जवाब-बेटा क्लियर है, ज्यादा कन्याएं उसकी ओर आकर्षित होती हैं।

सवाल-क्या पुरुष के जीवन का एकमात्र लक्ष्य यही है कि कन्याएं उसकी ओर आकर्षित हों।

जवाब-नहीं इमरान हाशमी की तमाम फिल्में देखकर पता लगता है कि पुरुषों का लक्ष्य दूसरों की पत्नियों, विवाहिताओं को आकर्षित करना भी होता है।

सवाल-मैं अगर फेयर एंड हैंडसम लगाऊं और फिर भी सुंदरियां आकर्षित न हों, तो क्या मैं कंपनी पर दावा ठोंक सकता हूं।

जवाब-नहीं, तमाम इश्तिहारों के विश्लेषण से साफ होता है कि सुंदरियां सिर्फ क्रीम लगाने भर से आकर्षित नहीं होतीं। इसके लिए वह वाला टायर भी लगाना पड़ता है। इसके लिए वो वाली बीड़ी भी पीनी पड़ती है। इसके लिए वो वाली सिगरेट भी पीने पड़ती है। इसके लिए वो वाली खैनी भी खानी पड़ती है। इसके लिए वो वाला टूथपेस्ट भी यूज करना पड़ता है। इसके लिए वो वाला कोल्ड ड्रिंक भी पीना पड़ता है।

सवाल-बंदा इसी सब में सुबह से शाम तक बिजी हो जायेगा, तो फिर वह और काम क्या करेगा।

जवाब-हां,यह सब इश्तिहारों में नहीं बताया जाता कि सुंदरियों को आकर्षित करना पार्ट-टाइम नहीं फुल टाइम एक्टिविटी है।

सवाल-तमाम इश्तिहार पुरुषों से आह्वान करते हैं कि वे ये खरीद कर या वो खऱीद कर सुंदरियों को आकर्षित करें, पर सुंदरियों से यह आह्वान नहीं किया जाता कि वे ये वाला टायर खरीदकर या वो वाली सिगरेट पीकर या बीड़ी पीकर या टूथपेस्ट यूज करके पुरुषों को आकर्षित करें। इसका क्या मतलब है।

जवाब – इसका यह मतलब है कि इस देश की महिलाएं सहज और स्वाभाविक रुप से आकर्षक हैं, पर ऐसा पुरुषों के बारे में नहीं कहा जा सकता। सो महिलाओँ को आकर्षित करने के लिए उन्हे किसी टायर, किसी सिगरेट, किसी बीड़ी की जरुरत पड़ती है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं इस देश की महिलाएं स्मार्ट और आकर्षक हैं।

और पुरुष ढीलू, चिरकुट, घोंचू च घामड़ हैं।


आलोक पुराणिक मोबाइल -09810018799

Sunday, July 15, 2007

संडे सूक्तियां-कास्ट इफेक्टिव और स्मार्ट झूठ ऐसे बोलें

संडे सूक्तियां- कास्ट इफेक्टिव और स्मार्ट झूठ ऐसे बोलें

आलोक पुराणिक

व्यक्तित्व विकास व्याख्यानमाला सीरिज के तहत इस लेखक द्वारा दिया गया यह व्याख्यान बहुतै हिट रहा है। इस व्याख्यान की मांग विभिन्न वर्गों द्वारा की जा रही है। पाठकों के हितार्थ इसके चुनिंदा संपादित अंश पेश हैं-

कतिपय प्राचीन कहावतों में सत्य और झूठ के बारे में अनर्गल बातें कही गयी हैं। जिनसे कई बार भोली-भाली जनता परेशान हो जाती है। कहावत है कि झूठ के पांव नहीं होते। इस कहावत का भावार्थ बिलकुल गलत तरीके से किया जाता है। इस कहावत का आशय यह है कि झूठ को पांवों को यानी पैदल चलने की जरुरत नहीं पड़ती। झूठ के निपुण प्रेक्टिशनर हमेशा कार, हैलीकाप्टर पर चलते हैं। सत्य वालों की पैदल चलना पड़ता है।

प्राचीन ग्रंथों के गहन अध्ययनों से ही सच और झूठ के संबंध में असली बातों का पता लग सकता है। राम और कृष्ण में से पूर्णावतार किसे माना जा सकता है। श्रीकृष्ण को। क्यों उनके बचपन का रिकार्ड देखकर यह ज्ञात किया जा सकता है-वे सरे आम खुले आम धड़ाके से झूठ बोलते थे। मक्खन उड़ाने के बाद मुंह पर लगे उसके अंशों के संबंध में बयान देते थे-ग्वाल बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुंह लपटायो। इस अदा पर उन्हे और मक्खन दिया जाता था। यानी झूठ बोलने पर उन्हे आधिकारिक रिटर्न दिया जाता था। माखनचोर कोई अपमानजनक नाम नहीं है। बड़े-बड़े भक्तों, ज्ञानियों में यह नाम सम्मान लिया जाता है। इससे साफ होता है कि अगर बंदा कायदे से झूठ बोले तो चोरी जैसी विधा को पर्याप्त सम्मान मिल जाता है

राम को पूर्णावतार का दर्जा इसलिए न मिल पाया कि झूठ बोलने में उन्होने वैसा हुनर नहीं दिखाया जैसा श्रीकृष्ण के पास था। झूठ और फरेब पर शोध करने वालों ने बताया है कि अगर राम की जगह श्रीकृष्ण की पत्नी को रावण उड़ाकर ले जाता, तो श्रीकृष्ण पुल बांधकर फौज को उस पार सत्य की लड़ाई लड़ने कदापि नहीं जाते। वो भुवनमोहिनी का रुप धारण करते, नाचते हुए रावण को रिझाकर अपने पीछे ले आते। जैसे ही मौका पाते, रावण का सर कलम कर देते। सेना निर्माण, पुलादि की लागत का बवाल भी निपट जाता। इससे यह भी साफ होता है कि सत्य के रास्ते पर चलने के लिए बहुत टीम-टाम चाहिए होते हैं। पर झूठ तो कास्ट इफेक्टिव तरीके से अपने परिणाम दे देता है।

इसलिए हमें पूर्णावतार के रास्ते पर चलना चाहिए।

हां, झूठ बोलने की कुछ माडर्न तकनीकों से खुद को समय-समय पर परिचित कराते रहना चाहिए। जैसे लेखकों को साहित्य में झूठ की नयी प्रवृत्तियों से खुद को अप टू डेट रखना चाहिए। जैसे लेखकों को साहत्य में झूठ की प्रवृत्तियों से खुद को अप टू डेट रखना चाहिए। साहित्यकारों को इस तरह के झूठ कदापि नहीं बोलने चाहिए कि उनकी फलां पुस्तक का अनुवाद अंग्रेजी में हुआ है। यह तो पकड़ में आ जाता है। यूं बोलना चाहिए –फिरांस्का के महत्वपूर्ण रचनाकार झोमारा कारावाऊ ने उनकी कृतियों का अनुवाद अपनी भाषा में किया है-ताऊकूंचा वैंटीला नाम से।

साहित्यकार कभी नहीं पूछेंगे कि यह किस देश की भाषा है।

वो पूछेंगे तो इत्ता कि गुरु सैटिंग कैसे की।

सैटिंग न बताना आपका साहित्यसिद्धाधिकार है।

ऐसे नये-नये देश और नये-नये रचनाकार आप अपनी सुविधा से ईजाद कर सकते हैं।

जैसा कि एक विदेशी विद्वान ने कहा कि झूठ हमेशा आंकड़ों के साथ बोलना चाहिए। अगर यह बताया जाये कि हाथी उड़ रहे हैं, तो लोग नहीं मानेंगे। इसे ऐसे कहा जाना चाहिए कि पृथ्वी के उस हिस्से पर, जहां रेखांश 78 डिग्री है और अक्षांश 89 डिग्री है, वहां 24 सितंबर को सुबह पांच बजकर छह मिनट पर सात हाथी उड़ते देखे गये(कंडीशंस अप्लाई)। हर झूठ के साथ कंडीशंस अप्लाई वाला क्लाज जरुर फिट करना चाहिए। हर झूठ(विज्ञापनों समेत) के साथ इसे अटैच किया जाता है।

कतिपय विद्वानों का मानना है कि दशमलव का आविष्कार ही इसलिए किया गया था कि झूठ बोलने में सुभीता रहे। आंकड़ों में दशमलव लगाकर पेश किया जाये, तो विश्वसनीयता में भारी इजाफा हो जाता है। इस बात का उदाहरण बाटा शू कंपनी द्वारा बतायी जाने वाली कीमतें हैं। क्या वे कीमतें 95 रुपये नहीं बता सकते, नहीं वे बताते हैं 94 रुपये 95 पैसे। फुटपाथ पर जूते बेचने वाला जब बताता है -90 रुपये, तो पब्लिक झिकझिक करती है। पर बाटा के यहां झिकझिक नहीं करती, दशमलव का झूठ बोलने में इस्तेमाल करने से झूठ को कई सारे चांद लग जाते हैं।

उम्र के मामले में अपने बयानों को विश्वसनीय बनाने के लिए सुंदरियों को बताना चाहिए कि मेरी उम्र 20 साल 2 माह और सोलह दिन है। झूठ में महीनों और दिनों के स्पेसिफिकेशन से विश्वनीयता बढ़ जाती है।

अब चलूं मंगल ग्रह पर झूठ पर व्याख्यान देने जाना है। मंगल प्लस टीवी चैनल पर 87.098 हर्ट्ज फ्रिक्वेंसी में इसका सीधा प्रसारण होगा।

इस चैनल को आपका टीवी कैच करता है या नहीं।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799