Saturday, June 9, 2007

आन मिलो ट्रांसफार्मर

आन मिलो ट्रांसफार्मर
आलोक पुराणिक
अमेरिका से आया कवि बता रहा था कि जी मैं तो अभी फिलाडेल्फिया राइटिंग प्रोग्राम में भाग लेकर आ रहा हूं। वहां हमें बताया गया है कि कविता के लिए अच्छी-अच्छी चीजों, प्रकृति के बारे में सोचना चाहिए। सो मैं आजकर चिड़िया, गौरेया पर सोच रहा हूं। आप किस पर सोच रहे हैं।
मैंने बताया-ट्रांसफार्मर पर।
अमेरिकन धराशायी हो लिया-ट्रांसफार्मर पर क्या लिखा जा सकता है।
मैंने बताया- बेट्टा हमारे व्यंग्य जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। और गरमी में हमारी जिंदगी ट्रांसफार्मर के इर्द-गिर्द घूमती है। रात में पटाखा सा भड़ाम होता है । पहले डकैती का कनफ्यूजन होता था। पर अब डकैती तो पड़ती नहीं। हमारी तरफ के सारे डकैत तो विधायक, सांसद हो लिये हैं। सो हम समझ जाते हैं, ट्रांसफार्मर का हो लिया अंतिम संस्कार। कित्ती जिंदगी ट्रांसफार्मर की दो-चार दिन, एकाध हफ्ता बहुत खिंच गया तो पंद्रह दिन। फिर नये ट्रांसफार्मर का सिलसिला शुरु होता है। बीस बार फोन करते हैं बिजली दफ्तर को। दो दिन बाद ट्रांसफार्मर आता है, दो दिन बाद फिर फुंकने के लिए। दो आरजू में कट गये, दो इंतजार में।
पर ये तो बहादुर शाह जफर का पोइट्री है ना-अमेरिकन पूछ रहा है।
हां, जफर साहब ने ट्रांसफार्मर पर ही लिखी है। लाल किले का ट्रांसफार्मर फुंक गया था, तब लिखी थी-मैंने फुंके हुए ट्रांसफार्मर की तरह बम-फटाक स्टाइल में बताया।
फिर अमेरिकन ने गौरेया, चिड़िया की कोमल टाइप बातें नहीं कीं।
मुझे ट्रांसफार्मर के नीचे जाने कितनी गौरेया, चिड़िया दबी हुई दिखायी दीं।
भाई साहब, बुरा ना मानें। मुझे तो देश की सारी टेकनीकल प्रोग्रेस कुछ यूं ही टाइप की लगती है। जब खबर आती है इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन ने कुछ धांसू सा राकेट बना दिया है, जिसे ऊपर बहुत ऊपर की कक्षा में स्थापित कर दिया गया है, जो छह महीने तक ऊपर काम करेगा। तो साहब मेरा मन होता है, पूछने का। हे वैज्ञानिको, ऐसे ट्रांसफार्मर क्यों नहीं बनते, जो नीचे ही छह महीने काम कर लें। जब मैं मंत्री बनूंगा, तो इसरो के सारे वैज्ञानिकों को ट्रांसफार्मर बनाने में ही लगाऊंगा। वैज्ञानिको खबरदार।
खैर पिछले दिनों मैं आगरा गया कुछ साहित्यिक चिंतन करने,राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर विचार-विमर्श करने। एक दिन छोटे भाई से पूछा बताओ इस शेर के बारे में क्या राय है-
हम ये कह कर दिल को बहला रहे हैं
वह चल दिये हैं, वह आ रहे हैं
छोटा भाई बोला -ये लाइनें तो ट्रांसफार्मर पर लिखी गयी हैं। आगरा में हमारे इलाके का ट्रांसफार्मर फुंक गया है। यहां के लिए नया ट्रांसफार्मर चल दिया है मेरठ से। दिल्ली से आगे पहुंच गया है। ये लाइनें हम तो हर घंटे दोहरा रहे हैं, वह चल दिये हैं, वह आ रहे हैं।
मुझे गालिब, मीर, जफर सब के सब ट्रांसफार्मर के नीचे दबे दिखायी दिये।
अगले दिन भाई के घर के आसपास की महिलाएं कुछ इस टाइप की बातें कर रही थीं-ये लेट ही होगा, ये कभी टाइम से आता ही नहीं है।
सम्मान का यह स्तर देखकर मुझे लगा कि जरुर ये अपने पतियों के बारे में बात कर रही हैं।
पर नहीं, वो ट्रांसफार्मर के बारे में बात कर रही थीं। ट्रांसफार्मर को सेल्स टैक्स वालों ने मथुरा-कोसी के पास रोक लिया था। विरह वेदना अब पतियों के लिए नहीं, ट्रांसफार्मर को लेकर होती है-आन मिलो ट्रांसफार्मर।
मैंने छोटे भाई से कहा-यार चीन ने अरुणाचल प्रदेश में अपनी जमीन दबा ली है, क्या राय है।
वह उखड़ गया-बोला जी आप भी जाने कहां की चिंता करते हैं। हमारे ट्रांसफार्मर को मथुरा-कोसी वालों ने दबा लिया है, इसकी चिंता बड़ी है।
चीन को छोड़ो, ट्रांसफार्मर दबाने वालों से निपटा जाये पहले।
सर जी अब मुझे भी समझ में आ गया है-देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है-ट्रांसफार्मर और सबसे बड़ा समाधान क्या है-जी समझे नहीं, ट्रांसफार्मर।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799

8 comments:

Sanjeet Tripathi said...

मस्त, सटीक लिखा आपने!!

कल ही शाम से आधी रात तक ट्रांसफार्मर का लोचा झेला अपन ने…प्रभु आपको जल्दी मंत्री बनाए और आप वैज्ञानिको को ट्रांसफार्मर बनाने में लगाएं। क्या पता बिल्ली के भाग से छींका टूट ही जाए।

काकेश said...

अब ट्रांसफार्मर नाराज ना हो तो क्यों ना हो ..जब आजकल सब कोई फार्मर बन रहे हैं त ट्रांसफार्मर क्या करे... वो भी अपनी मर्जी दिखा रहा है...वैसे अमरीकन को ज्ञान तो प्राप्त हो गया होगा...

अरुण said...

ट्रान्सफ़ार्मर व्यथा कथा बडी दिल को छुने वाली है
भगवान आपको कभी भी मंत्री ना बनाये कितनो का कमीशन और धंधा खा जाओगे

राजीव said...

धाँसू और सत्य भी।


हे वैज्ञानिको, ऐसे ट्रांसफार्मर क्यों नहीं बनते, जो नीचे ही छह महीने काम कर लें। जब मैं मंत्री बनूंगा, तो इसरो के सारे वैज्ञानिकों को ट्रांसफार्मर बनाने में ही लगाऊंगा। वैज्ञानिको खबरदार।

सही कहा, नहीं तो उन्हीं उपग्रहों के ट्रांसफार्मरों को पहले हमारे मुहल्ले में टेस्ट कर लो, अगर वे हमारे यहाँ 6 माह निर्बाध (अरे 2 माह भी चलेगा) चले तो भेज दो उन्हें अंतरिक्ष में, मय 50 वर्ष की गारण्टी के - काहे से वहाँ कटिया तो प्रचलित है नहीँ अभी।

bhuvnesh said...

आलोकजी यह तो हर हिन्दुस्तानी की वेदना है
हमारे तो सपने में भी त्रांसफ़ार्मर आने लगा है जो हमारी बिजली को हमसे खींचकर कहीं और ले जाता है और हम पसीना पसीना हुए हाथ मलते रह जाते हैं.
वैसे आपकी नयी किताब कब आ रही है? जब भी आये कृपया पोस्ट के माध्यम से जानकारी अवश्य दें.

sunita (shanoo) said...

आलोक जी एक बात सच-सच बताईये मंत्री बन कर भी क्या आप एसे ही लिखा करेंगे?
वैसे अच्छा रोचक लेख है परन्तु....

मंत्री तो बनिये...:)

सुनीता(शानू)

अभिनव said...

बढ़िया लगा लेख,
पर अमेरिका से आए कवि का नाम देख,
मन ज़रा डोला,
कहीं आलोक जी नें मेरी गौरैया वाली कविता के बारे में,
तो नहीं बोला।

Udan Tashtari said...

हम ये कह कर दिल को बहला रहे हैं
वह चल दिये हैं, वह आ रहे हैं


----हम समझते थे यह आपके लिये लिख गए हैं जाने वाले...आज ज्ञान प्राप्ति हुई मुझ नादान को. बताते रहा करो यूँ ही महाराज.

--बेहतरीन लिखा जा रहा है भाई!!