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Wednesday, August 22, 2007

कामरेड के किस्से

कामरेड के किस्से

किस्सा नंबर एक-शादी और प्यार
कामरेड नाराज थे, नान-कामरेड साथी को बोल दिया-अब हनीमून खत्म।
नान-कामरेड साथी का जवाब था-हू केयर्स, गेट लौस्ट।
कामरेड को इस जवाब की उम्मीद ना थी। कामरेड ने फिर वही किया, जो वह 77797979797 बार कर चुके थे।
कामरेड बोले-सो व्हाट, हनीमून खत्म होने से शादी तो खत्म नहीं होती। हम साथ रह सकते हैं। चलो चार-पांच महीने साथ रह सकते हैं। पर मैं अपने स्टैंड पर कायम हूं। हनीमून खत्म।
फिर कामरेड ने एक दिन फील किया कि पीछे से उन्हे एक जोरदार लात पड़ी है। शायद नान कामरेड साथी ने दी है ,जमा कर।
कामरेड नाराज हुए और बोले-मैं नाराज हूं। हनीमून खत्म।
नान कामरेड साथी ने कहा-अबे चिरकुट, हनीमून खत्म होने की बात तू सुबह से सातवीं बार बोल रहा है। कितनी बार हनीमून खत्म करेगा।
कामरेड ने कुछ कैलकुलेट करते हुए कहा-नहीं इस बार पक्का।
नान-कामरेड साथी ने मौज लेते हुए कहा-कामरेड हनीमून आप खत्म करने की बात कैसे कर सकते हो। आप तो बाहर से सपोर्ट देते रहे हो। कोई बाहर से ही हनीमून के लेवल पर कैसे पहुंच सकता है। अगर आप हनीमून की बात कर रहे हो, तो कबूल करो कि अंदर ही थे, और हनीमूनिंग कर रहे थे। पब्लिक को बताते रहे कि क्रांति कर रहे हैं, पर सच में हनीमून कर रहे थे।
कामरेड परेशान हो गये। पब्लिक जवाब मांगने लगी-कामरेड जब तुम बाहर थे, तो हनीमून कैसे कर रहे थे। इसका मतलब तुम बाहर दिखते थे, पर अंदर थे।
कामरेड परेशान हैं-हनीमून की बात मानें, तो अंदर साबित हो जायेंगे।
हनीमून की बात ना मानें, तो कैरेक्टर पर सवाल उठेंगे कि बाहर से कोई हनीमूनिंग कैसे कर सकता है।
कामरेड परेशान हैं, कैरेक्टर पर सवाल उठ रहे हैं।
आप बतायें कि कामरेड क्या करें।


खौं खौं हें हें
कामरेड परेशान हैं, आज कुछ बैलेंस खराब हो गया।
तय यह हुआ था कि नान कामरेड के सामने दिन में पचास बार हें हें करेंगे और पच्चीस बार खौं खौं करना है।
इस पर हें हें, उस पर खौं खौं।
बल्कि यह तक तय हो गया, कि खौं खौं हें हें हो पहले हो जायेगी। यह किसलिए हुई है, यह तय बाद में कर लेंगे।
रोज कामरेड नियम से इत्ती यूनिट हें हें और उत्ती यूनिट खौं खौं भिजवाते रहे।
रिसीव करने वाले उसे रद्दी की टोकरी में डालते रहे।
एक दिन कामरेड ने खौं खौं कुछ ज्यादा की।
जैसा कि होता था कि वह भी रद्दी में चली गयी।
कामरेड गुस्सा थे-इस बार मैं सीरियस हूं।
ओह, तो अब तक आप नान सीरियस थे क्या-नान कामरेड साथी ने पूछा।
नहीं इस बार सच्ची की खौं-खौं-कामरेड गुस्सा थे।
पर क्यों-नान कामरेड साथी ने पूछा।
कामरेड बोले-तुम्हारा चाल -चलन खराब है, अमेरिका से तुम्हारे रिश्ते हैं।
नान-कामरेड ने कहा-वो तुम्हे पहले क्यों नहीं दिखे। चाल- चलन तो हमारा हमेशा से ऐसा है। कामरेड बोले-जितना जब देखना अफोर्ड कर सकते हैं, उतना ही तो देखेंगे। अब तुम्हारी बदचलनी दिख रही है।
नान कामरेड साथी बोले-बदचलनी क्या है, इससे हमें क्या नुकसान हैं। इसकी स्टडी करने के लिए हम एक कमेटी बना देते हैं। जो रिपोर्ट दे देगी। बाद में देख लेंगे।
कामरेड जैसा कि अकसर होता है, इस बार भी राजी हो गये हैं।
पब्लिक मौज ले रही है कि कामरेड इत्ते भोले हैं कि बदचलनी अब तक देख ही ना पाये। कामरेड सचमुच बहुत भोले हैं।
खैर, कामरेड आदत के मुताबिक फिर खौं खौं कर रहे हैं, पब्लिक उसे हें हें समझकर हंस रही है।
कामरेड ने एक दिन आईने में देखा, तो डर गये। वह खुद को शेर समझकर दहाड़ते थे, पर उन्होने देखा कि जिसे वह दहाड़ समझते हैं, वह म्याऊं जैसा कुछ है।
कामरेड परेशान हैं, वह खौं खौं निकाल रहे हैं, पर हें हें ही निकल रही है।
कामरेड क्या करें, यह सोच रहे हैं।
सीनियर कामरेड ने बताया है कि कुछ ना करें, कमेटी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करें। कुछेक दिन में कोई नया घोटाला सामने आ जायेगा। संजय दत्त को मिली जमानत में पेंच हो जायेंगे। पब्लिक का ध्यान हट जायेगा। फिर आप खौं खौं करे, या म्याऊं, कोई फर्क नहीं पड़ता।
सो कामरेड अब प्रतीक्षा कर रहे हैं।

कामरेड के कनफ्यूजन
कामरेड से पूछा किसी ने-कामरेड, इस न्यूक्लियर डील के रुक जाने से पाकिस्तान खुश होगा। भाजपा वाले खुश होंगे, चीन वाले खुश होंगे और आप खुश होंगे। तो बताइए कि आपको पाकिस्तान के साथ माना जाये या भाजपा के साथ।
कामरेड ने थोड़ा कैलकुलेट करके बताया-देखिये भाजपा के साथ नहीं हैं हम। भाजपा वाले अलग हल्ला मचायेंगे, हम अलग। भाजपा वाले अगर हो हो करेंगे, तो हम हाय हाय करेंगे। मतलब वैसे हम भाजपा के साथ खड़े दिखते हैं, वैसे हम पाकिस्तान के साथ खड़े भी दिख सकते हैं, पर वैसे तो हम कांग्रेस के साथ भी खड़े दिखते हैं। मतलब हम कांग्रेस को बाहर से सपोर्ट देते हैं। मतलब यूं तो चीन को भी हम यहां बाहर से ही सपोर्ट देते हैं। मतलब हम किसके साथ हैं, यह अभी क्लियर नहीं है।
कामरेड अभी कनफ्यूज्ड हैं कि वह कहां है। आपको पता लग जाये,तो उन्हे बता दीजिये प्लीज।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

Sunday, August 19, 2007

संडे सूक्तियां-कुछ अच्छी बेकार बातें

संडे सूक्तियां-कुछ अच्छी बेकार बातें
आलोक पुराणिक
स्वतंत्रता दिवस के समारोह बीत गये। आजादी के पहले संघर्ष की वर्षगांठ के 150 सालों के समारोह भी अब अंतिम से दौर में हैं।
बहुत अच्छी बातें बरसीं। कित्ते टन बरसीं, पता नहीं।
ये लेक्चर वो लेक्चर, एक सतत अमेरिका-गामी प्रोफेसर ने न्यूयार्क से सिंगापुर के रास्ते में दिल्ली में रुक कर बताया कि देश को और आगे ले जाना है। विदेशी ताकतें हमारे खिलाफ षडयंत्र कर रही हैं। उनके खिलाफ संघर्ष करना है।
मैंने कहा जी, पहले तय कर कर लो कि क्या करना है, देश को आगे ले जाना है या पहले विदेशी ताकतों के खिलाफ संघर्ष करना है। मैं कुछ ढीला टाइप बंदा हूं, एक साथ दोनों कामों में लगा दिया, तो कुछ भी नहीं करुंगा। वैसे आप जो ये अमेरिका जाते रहते हैं, वहीं विदेशी ताकतों से संघर्ष कर लीजिये।
प्रोफेसर के चंपू नाराज हो गये। बोले - अमेरिका जाते हैं, हमारे प्रोफेसर तो संघर्ष करने नहीं जाते, रिसर्च करने जाते हैं। और अगर अमेरिकियों को ही विदेशी ताकत मानकर संघर्ष कर लिया, तो फिर जायेंगे कहां।
तो मैंने कहा-अमेरिका से संघर्ष करने में अड़चन हो, तो ब्रिटेन से कर लो।
उन्होने बताया कि वहां प्रोफेसर की बिटिया को जाना है, पढ़ाई के लिए। वीसा लटका हुआ है, अगर वहां संघर्ष कर लिया, तो आफत हो जायेगी।
अब हर विदेशी ताकत, जो भारत के खिलाफ कुछ कर सकती है, वहां प्रोफेसरों को जाना है, अफसरों को जाना है, नेताओं को जाना है। उनके बेटों, बेटियों को जाना है। संघर्ष बताइये कैसे हो।
मैंने कहा-महाराज, फिर तो जांबिया, फिजी, तंजानिया से संघर्ष कर लो, यहां तो आम तौर पर किसी प्रोफेसर, अफसर, नेता को नहीं जाना।
एक अफसर बोला-कैसी बात कर रहे हैं, सब हंसेगे कि हम किनसे संघर्ष कर रहे हैं।
मैंने उसे समझाया कि आप जो भी कहते हैं, उस पर लोग हंसते इसीलिए हैं कि अब रोया कितना जा सकता है।
अफसर बुरा मान गया।
मैंने एक क्लेरिफिकेशन और मांगा तमाम विद्वानों से कि चलो देश को आगे बढ़ाना है, सो बात तो ठीक। पर किधर की तरफ बढ़ाना है। अभी तो हम ही नहीं बढ़ पाते हैं ट्रेफिक जाम में, एक किलोमीटर में कई घंटे निकल जाते हैं। पूरा देश ही अगर आगे बढ़ने पर उतारु हो गया, तो क्या होगा, तो ट्रेफिक का क्या होगा जी।
कई तोंदयुक्त विद्वानों ने बताया कि किसी के बढ़ाने से नहीं होता, देश अपने आप ही बढ़ रहा है।
ऐसे बढ़ता हुआ देश मुझे तोंद जैसा लगता है, जिसे कोई बढ़ाये या नहीं, अपने ही आप बढ़ लेती है।
पर ऐसे बढ़ना तो डेंजरस होता है-मैं विद्वानों को बताने की कोशिश कर रहा हूं।
देखिये आप बेकार की बातें कर रहे हैं। सिर्फ बढ़ाने पर फोकस रहिये, जिधर बढ़ना है, अपने आप बढ़ लेगा-विद्वान मुझे डांट रहे हैं।
पर पता नहीं क्यों मैं देश की जगह कई सारी तोंदें देख रहा हूं।
पर यह विद्वानों की नहीं, मेरी व्यक्तिगत समस्या है।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

Saturday, August 18, 2007

गोल चौराहे का गोलमाल

गोल चौराहे का गोलमाल

आलोक पुराणिक

राह से गुजर रहा था, कुछ अलग टाइप के संवाद सुनायी पड़े-

तुम्हारी ऐसी-तैसी, हमसे पंगा लेते हो। गिरा देंगे। वैसे जी आपकी कृपा है। कृपा बनी रहे, हम कहां जायेंगे जी।

देखोजी फूटना हो, तो फूट लो। जहां मूड हो वहां निकल लो। तुम्हारे लिए बैठे नहीं रहेंगे। गरज पड़े तो बैठो, वरना तुम्हारी ऐसी-तैसी। वैसे आप प्लीज हमारी बात समझ क्यों नहीं रहे हैं।

मैं समझ गया जरुर लेफ्ट फ्रंट के बंदों और कांग्रेस के बंदों में संवाद चल रहा होगा।

मैं राइट था, वह सीपीएम का दफ्तर था।

सीपीएम का एक खास दफ्तर दिल्ली में जहां है, वहां से थोड़ा सा पीछे एक गोल डाकखाने का सर्किल आता है, और थोड़ा आगे निकल कर भी एक गोल सर्किल आता है।

गोल सर्किल सीपीएम के आगे भी है, और पीछे भी है। वैसे खुद लेफ्ट की बातें अब गोल सर्किल हो गयी हैं। जहां से निकलती हैं, वहीं पहुंच लेती हैं।

लेफ्ट फ्रंट के एक सीनियर बंदे से मैंने न्यूक्लियर डील पर बात की।


जी आप न्यूक्लियर डील के विरोध में हैं। डील इस सरकार ने किया है, तो क्या इसके भी विरोध में हैं-मैंने पूछा।

नहीं वैसे तो हम विरोध में हैं, पर मतलब इसका मतलब यह ना लगाया जाये कि हम विरोध में हैं। पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम विरोध में नहीं हैं, मतलब..........लेफ्ट फ्रंट का बंदा मतलब खुद समझने में बिजी हो गया।

देखिये मैं आपको मतलब समझाता हूं-आप न्यूक्लियर डील का विरोध कर रहे हैं। यानी इस सरकार का विरोध कर रहे हैं। मतलब इस मसले पर आप भाजपा के साथ हैं। बात तो आप दोनों एक जैसी कर रहे हैं, न्यूक्लियर के मसले पर-मैंने उन्हे बताया।

देखिये, इस मसले को यूं समझिये कि इस यूपीए सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि ये हर बात में अमेरिका पर निर्भर है। मैं बताना चाहता हूं कि हम हर मामले में आत्मनिर्भर हैं। यहां तक कि सरकार की फजीहत कराने के मसले तक में हम आत्मनिर्भर हैं, इसके लिए हम भाजपा के विपक्ष तक की जरुरत भी नहीं है-लेफ्ट फ्रंट के नेता बोले।

तो मतलब साफ बताइए कि आप कहां हैं, सरकार के साथ हैं या विपक्ष के साथ हैं या क्या-मैंने पूछा।

जी मैं सोचकर बताता हूं।

लेफ्ट फ्रंट के नेताजी सोच रहे हैं। सोचते ही जा रहे हैं।

बात घूम-फिर कर गोल चौराहे पर आ गयी है।

आलोक पुराणिक

मोबाइल-9810018799

Thursday, July 12, 2007

सत्यनारायण कथा-2007

सत्यनारायण कथा-2007
आलोक पुराणिक
मामले डेंजरात्मक होते जा रहे हैं, नये बच्चों को कुछ पुरानी बातें समझाना मुश्किल हो रहा है। एक बच्चे को सत्यनारायण की पुरानी कथा समझाने की कोशिश कर रहा था-एक लकड़हारा था, वह जंगल में लकड़ी में काटने जा रहा था।
बच्चे ने पलट सवाल किया-ये लकड़हारा क्या होगा।
बेटे, वो जंगल में लकड़ी काटने जाते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
ये जंगल क्या होता है-बच्चे ने आगे पूछा।
जंगल समझो कि शहर जब खत्म हो जाता है, तो जंगल शुरु होते हैं-मैंने समझाने की कोशिश की।
शहर जब खत्म हो जाते हैं, तो फार्म हाऊस शुरु होते हैं। शापिंग माल शुरु होते हैं। हाई वे शुरु होते हैं। ढाबे शुरु होते हैं। जंगल कहां शुरु होते हैं-बच्चे ने पूछा।
समझो कि हिमालय के पास कहीं के गांव का लकड़हारा था-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।
ये हिमालय क्या होता है। ये आप अंगरेजी में क्यों बोलते हैं, हिमालय की हिंदी क्या होती है-बच्चे ने आगे पूछा।
बेटा हिमालय यानी रेंज आफ हिल्स, ये इंडिया में होती है-मैंने बताया।
मैं अच्छे स्कूल में पढ़ता हूं, हमें अमेरिका के बारे में बताया जाता है। अमेरिका के हिल्स के बारे में बताया जाता है। आखिर सैटल तो एक दिन अमेरिका में ही होना है। हमारे स्कूल वाले इंडिया की चीजों के बारे में पढ़ाने में टाइम वेस्ट नहीं करते-बच्चा बता रहा है।
ये और पेंच है। समझदार बच्चे इधर इंडिया के बारे में समझते ही नहीं है। पेरेंट्स मानकर चलते हैं कि ठीकठाक बच्चा निकला, तो अमेरिका ही जायेगा। इंडिया में थोड़े ही रुकेगा। जो इंडिया में रुक गया, वो वही है, जिसे अमेरिका नहीं तो दुबई, नहीं तो मारीशस तक का वीसा नहीं मिला।
बात में दम है, इसलिए नये बच्चों को सत्यनारायण कथा तो दूर, लकड़हारे तक के बारे में समझाना मुश्किल है। इस खाकसार ने एक नयी सत्यनारायण कथा तैयार की है, सो आपकी सब की सेवा में पेश है।
एक समय की बात है। एक सिलिकौन सिटी बंगलूर में राबर्ट और मारिया और उनका बेटा बर्टी रहता था। ये सभी इंडियन थे, पर अमेरिका में सैटल होने के ख्याल से इन्होने अपने नाम कुछ अमेरिकन टाइप कर लिये थे। सारे समझदार लोग यही करते थे। एक बार की बात है। जैसा कि सारे समझदार बच्चे करते थे, राबर्ट ने भी एक दिन वीसा के लिए अमेरिकन एंबेसी में अप्लाई किया। उसका वीजे की एप्लीकेशन रिजेक्ट हो गयी। एंबेसी से लौटते समय उसने देखा कि एक केले के वृक्ष के नीचे कुछ एक सूट-बूटधारी अपनी जीन्सधारी पत्नी के साथ पूजा कर रहा था। पूछने पर उसने बताया कि उसका वीजा भी पहले अमेरिकन एंबेसी में रिजेक्ट हो गया था। उसने सत्यनारायण भगवान की आराधना की और प्रसाद स्वरुप साफ्वेयर इंजीनयियरिंग में पढ़ने वाले छात्रों में ग्यारह सीडी बांटीं। इसके बाद उसका वीसा क्लियर हो गया।
ऐसे वचन सुनकर बर्टी ने भी मन ही मन संकल्प लिया कि वह भी ऐसा ही करेगा।
उस दिन बर्टी के पापा ने उससे सौ किलो आलू लाने का आदेश दिया, एक स्मार्ट बच्चे की तरह बर्टी सिर्फ नब्बे किलो आलू लाया और दस किलो आलू की रकम अंदर कर ली। आलू चूंकि बहुत महंगे थे, इसलिए बर्टी ने बहुत रकम बचा ली।
उसने केले के पेड़ के नीचे पूजा की और इक्कीस सीडी छात्रों में बांट दीं।
इसके परिणाम आये और अगली बार ही उसका अमेरिकन वीजा क्लियर हो गया। पर, पर, पर, वह जाने से पहले सत्यनारायण कथा करवाना भूल गया।
वह अमेरिका गया और बहुत डालर खेंचे,लौटकर जब वह या तो सूटकेस में बहुत महंगे साफ्टवेयर प्रोग्रामों की सीडी लेकर आया। वह जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरा, एक साधु ने उससे कहा-हे वत्स तेरे सूटकेस में क्या भरा है।
बर्टी ने परिहास करते हुए कहा कुछ नहीं, इसमें कीड़े-मकोड़े हैं, वायरस हैं।
साधु ने कहा-तेरे वचन सत्य हो जायें।
बर्टी ने घर जाकर उन कार्यक्रमों की सीडी को चलाया, तो उनमें वायरस आ गये। सीडी चलीं नहीं।
बर्टी बहुत रोया, परेशान हुआ उसकी बरसों की मेहनत पर वायरस फिर गया।
तब ही उसे साधु की याद आयी। फौरन से उसने केले के वृक्ष के नीचे पूजा-पाठ की, तत्काल वह साधु प्रकट हुआ और बर्टी ने उसके चरणों में पड़ते हुए कहा हे महाराज मुझसे गलती हो गयी।
साधु ने उसे आशीर्वाद दिया, तत्पश्चात बर्टी ने भारत में और तत्पश्चात अमेरिका में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। बोलो श्री............................ की जय।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

Tuesday, July 10, 2007

बांके सिपहिये-लोकल बनाम अमेरिकन

बांके सिपहिये- लोकल बनाम अमेरिकन
आलोक पुराणिक

कल ही एक थोड़ी पुरानी फिल्म देखी-ओंकारा, इस फिल्म में बिपाशा बसु एक गीत में नाच रही थीं और तमाम बांके सिपहिया उनके साथ धुत्त
होकर डांस कर रहे थे। सीन रात का ही था। अभी कुछ दिन पहले जो फिल्म देखी थी, उसमें भी नृत्यांगना कुछ इसी टाइप की शिकायत गाकर कर रही थी कि बांके सिपहिया ने रात भर परेशान किया।
वैसे सोचने की बात यह है कि कमाल का स्टे
मिना है बांके सिपहिया का, दिन में पब्लिक को परेशान करता है और फिर रात में डांसर को परेशान करता है।
और बांके सिपहिया का ऐसा सांस्कृतिक योगदान
सिर्फ समकालीन संदर्भ से ही नहीं जुड़ा हुआ है। बांके सिपहिया के सांस्कृतिक योगदान के ऐतिहासिक संदर्भ भी हैं।
पुरानी फिल्मों के कई गाने हैं, जो बताते हैं, किस तरह से बांके सिपहिया ने जाने क्या-क्या लूट लिया।
ऐसा कोई गीत प्रकाश में नहीं आया, जिसमें किसी मास्टर की, किसी डाक्टर की शिकायत की गयी हो कि हाय उसने परेशान कर दिया। हालांकि परेशान ये भी करते होंगे। पर इंडिया की पब्लिक माइंड नहीं करती। मास्टर ट्यूशन की जबरदस्ती करके परेशान करता है। डाक्टर फर्जी टाइप की दवाएं ठेलकर परेशान करता है, पर पब्लिक झेल जाती है। गीत गाकर शिकायत नहीं करती। पर बांके सिपाही के प्रति पब्लिक यह उदारता नहीं दिखाती, पता नहीं क्यों, यह शोध का विषय है।

अभी खबर आयी है कि कुछ बांके सिपहियाओं ने एक बंदे को इसलिए फंसा दिया कि वह सिपहियाओं की लूटपाट की शिकायत करहा था।
सवाल उठता है कि बांका सिपाही कुछ और भी करता है या नहीं, लूटने के अलावा।

नहीं और भी बहुत कुछ करता है, बहुतों को
फंसाने का इंतजाम करता है।
बांके सिपाही दूसरे देशों में भी हैं, लूटते वो भी हैं, पर उनके लेवल अलग हैं।

मुशर्रफ भी बांके सिपहिया ही हैं, पूरे देश को ही जेब में डाल लिया।

अमेरिका के बांके सिपहिया भी लूटते हैं,
पर अपने देश में नहीं। दूर-दूर तक जाते हैं लूटने, इराक, अफगानिस्तान ,पर अपने देश में नहीं लूटते। लूटने का यह फंडा सही है। दूर जाकर लूटो, तो किसी को आबजेक्शन नहीं होता।
पर इंडिया का बांका सिपहिया क्या करे, बाहर कहां जाये लूटने। जहां-जहां जा सकता है, वहां पहले ही अमेरिका के बैठे हैं।

गौर से देखें, तो साफ होता है कि इंडि
या का बांका सिपाही तो जो मिल जाये उसे लूटने में लग जाता है। अमेरिका के बांके इस मामले में सलेक्टिव हैं। जहां पेट्रोल हैं , तेल हैं, वहीं उनकी निगाह जाती है।

अमेरिकी सौंदर्यबोध तेल से आगे नहीं जाता।

कुछ दिनों में अमेरिकन फिल्मों में हीरोईनें गायब हो जायेंगी, हीरोईन की जगह पेट्रोल के कुएं दिखाये जायेंगे।
इतिहास
में पढ़ाया जायेगा कि बहुत पहले भी हेलन के लिए लड़ाई हुई थी और 2006-07 के आसपास भी हेलन के लिए मारधाड़ हुई थी।
हां, 2006-07 में हेलन एक आयल-फील्ड का नाम था।


अगर कहीं पेट्रोल नहीं है, तो अमेरिकन बांका बुरी निगाह नहीं डालता, बुरी क्या अच्छी भी नहीं डालता। वैसे उसके पास अच्छी नजर है भी या नहीं, यह भी शोध का विषय है।
अगर
अमेरिकन बांकों को इंडिया में तमाम ड्यूटियों में लगा दिया जाये, तो कई प्राबलम साल्व हो सकती हैं। एक तो यह कि वो वसूली सिर्फ पेट्रोल पंपों से करेंगे।
इसके अलावा, तमाम डांसर सुंदरियां फिर ये शिकायत नहीं करेंगी कि अमेरिकन बांका सिपहिया परेशान करता है।

आप ही बताइए, अमेरिकन सिपहिया क्यों परेशान करेगा, अगर सुंदरी का नाम पेट्रोल नहीं है तो।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799