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Saturday, August 25, 2007

भूत नाग ये वाले

आलोक पुराणिक

खबर है कि शरद पवारजी ने अपनी सांसद बिटिया को सलाह दी है कि संसद में टाइम वेस्ट ना करो, जाओ इलाके में जाकर काम करो।

संसद में नेता ज्यादातर टाइम वेस्ट ही करते हैं, यह पब्लिक तो हमेशा मानती है।

पर नेता कभी-कभार ही मानते हैं। चलो शरद पवारजी मान गये।

इलाके में जाकर नेता टाइम वेस्ट करे, तो पता लग जाता है कि वहां टाइम वेस्ट करना भी आसान नहीं है। बिजली नहीं है, कि सो कर किया जा सके। पानी नहीं है कि नहाकर किया जा सके। हां दारु के ठेके हैं, पीकर किया जा सकता है। खाने का जुगाड़ हो ना हो, पर पीने का जुगाड़ जरुर हो सकता है। पिछले दस सालों में राशन की जितनी दुकानें बंद हुई हैं, उतनी दुकानों से दोगुनी दारु की दुकानें खुल गयी हैं।

पब्लिक के खाने पर सरकार का खर्च होता है, पब्लिक के पीने से सरकार कमाती है।

पब्लिक के लिए मैसेज है-खाने के काम नेताओं के लिए छोडो, पीने का काम कर लो।

खैर मसला यह है कि सरकार जा रही है। नहीं, बच रही है। मार चपर-चूंचूं मची हुई है।

वैसे मैं खुश हूं। इस घपड़चौथ में एक काम अच्छा हुआ है कि टीवी चैनलों से नाग-भूत-प्रेत कम हो गये हैं। उस बिल्डिंग में जाते हुए नाग, इस बिल्डिंग से निकलते भूत टाइप कार्यक्रम टीवी चैनलों पर कुछ कम आ रहे हैं।

उस बिल्डिंग में जाते हुए नेता, उस बिल्डिंग से निकलते हुए नेता-इस टाइप के कार्यक्रम टीवी पर ज्यादा आ रहे हैं।

वैसे टीवी के एक गहरे जानकार का मानना है कि बेसिकली हैं ये भी भूत-नाग ही। यहां से निकल कर वहां चले जाते हैं, करना-धरना इन्हे भी कुछ भी नहीं हैं, सिवाय पब्लिक को डराने के।

अभी कल मिले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, कह रहे थे कि अमेरिका के साथ 123 का डील क्या हुआ, नौ दो ग्यारह होने की नौबत आ गयी।

मैंने कहा जी बच रहे हो, कि 123 पर नौ दो ग्यारह होने का सीन है। वरना प्याज-धनिया के भावों पर नौ दो ग्यारह होते।

नेता हंसने लगा-बोला प्याज-धनिया के भावों की चिंता हम नहीं करते। प्याज धनिया अब जो अफोर्ड कर सकते हैं, वे उस कैटेगरी के लोग हैं, जो किसी भी चीज के भाव नहीं पूछते। और जो पूछते हैं, वो धनिया और टमाटर को ज्वैलरी की तरह मानने लगे हैं, रोज यूज नहीं करते। ज्वैलरी के भावों पर सरकार आज तक नहीं गयी।

वैसे सोचिये, नेताजी गलत कह रहे हैं क्या।
आलोक पुराणिक

मोबाइल-09810018799

Monday, July 23, 2007

भागते भूत को सूट

भागते भूत को सूट
आलोक पुराणिक
यह निबंध बीए के उस छात्र की कापी से लिया गया है, जिसने एक निबंध प्रतियोगिता में टाप किया है। निबंध का विषय वह पुरानी कहावत थी-भागते भूत की लँगोटी।
इस कहावत में कुछ गड़बड़ है, भूत लँगोटी क्यों पहनता है।
क्या भूतलोक में भी एक-दूसरे से शर्म करने का प्रचलन है।
भूत लँगोटी पहनकर क्या साबित करना चाहता है, क्या उसके पास लँगोटी है या यह साबित करना चाहता है कि भूत लोक में भी नेतागण हैं जो इत्ते लुटेरे हैं, कि सामान्य भूतों के लिए सिर्फ लँगोटी बचती है। इस तरह से पता चलता है कि भूत लोक और इंसानी लोक कई तरह की समानताएं हैं।
भागते भूत की लँगोटी कहावत से यह पता नहीं चलता कि भूत भाग क्यों रहा है।


और उसकी लँगोटी में किसी की दिलचस्पी क्यों है। भूत की लँगोटी में दिलचस्पी किसी आम आदमी की नहीं हो सकती, जो अपनी ही लँगोटी बचाने में बिजी रहा है।
मेरे हिसाब से जरुर कोई विज्ञापन वाला उसके पीछे लगा है , वह जानना चाह रहा है कि आखिर भूत ने किस ब्रांड की लँगोटी पहनी है।

भूत की लँगोटी का ब्रांड पता करके विज्ञापन वाला भूत को प्रेरित करना चाहता है कि वह उसके ब्रांड की लँगोटी ही पहने।
पर यहां एक मसला और उठता है कि जो भूत लँगोटी पहनकर भाग रहा है, उसे लगता है अपनी महत्ता का पता नहीं है।
वह भागे जा रहा है, और तमाम टीवी चैनलों वाले उसके पीछे भागे जा रहे हैं, किसी भूत वाले प्रोग्राम में भूत को सैट करने के लिए।
भूत से कमाई होती है, उससे कई टीवी चैनल वालों के सूट-पैंट बनते हैं। हो सकता है कि कोई टीवी चैनल वाला कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिए भूत को सूट-पैंट देने के लिए भूत के पीछे भाग रहा है।
इसलिए नयी कहावत यूं हो सकती है-भागते भूत को सूट, भूत यूं ना फूट।
आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799