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Tuesday, July 24, 2007

होनोटूंबू महाद्वीप की खोज

होनोटूंबू महाद्वीप की खोज
आलोक पुराणिक
बताओ अहमद शाह अब्दाली दिल्ली पर चढ़ाई करने में सफल क्यों हो गया।
क्योंकि जीटी करनाल रोड पर उन दिनों ट्रेफिक नहीं होता था। अब का सा टाइम होता, तो ट्रेफिक में फंस जाता। ना दिल्ली की तरफ बढ़ पाता, ना पीछे की और जा पाता।
भिखारी भीख मांग-मांगकर परेशान कर देते। ट्रेफिक जाम के चक्कर में खीरे वाले खीरे के भाव बढ़ा देते। खीरे खरीदने में ही लूट का सारा माल खत्म हो लेता।
फिर भी ट्रेफिक नहीं खुलता। पता चलता कि आगे बीचों-बीच सड़क पर एक ट्रक खराब हो गया है। ट्रक के पुरजे लेने के लिए ड्राइवर करोलबाग दिल्ली गया है, पैदल। परसों लौटेगा।
मार ट्रेफिक की झाऊं-झाऊं में ही नादिर शाह की सेना दम तोड़ देती।
बड़े-बड़े युध्दवीर भारतीय ट्रेफिक से परास्त हो जाते।
ट्रेफिक अपने आप में युध्द सा है जी।
देखिये किसी सुबह या शाम, कैसे कतार में कार वगैरह एक के बाद खड़े होते हैं। मानो कहीं युध्द के लिए प्रयाण हो रहा हो। वैसे ट्रेफिक का मामला इधर से गौर से देखा, तो बहुत बातें नजर आयीं। इधर हुआ यूं कि आगरा स्थित एक मित्र ने लव मैरिज की और दिल्ली स्थित एक मित्र ने भी लव मैरिज की। छह महीने बाद आगरा से लडाई-झगड़े के समाचार आने लगे। दिल्ली शांत थी।
पूछताछ की तो पता चला कि पति महोदय तो दिल्ली से गुड़गांव नौकरी करने जाते हैं, और पत्नी करीब चालीस किलोमीटर ड्राइव करके जाती है।लड़ाई-झगड़े का सारा कोटा दोनों रास्ते में अलग -अलग निपटा कर लौटते हैं।

आगे की कार वाले को गालियां, पीछे की कार वाले की गालियां। उस बंदे को सामूहिक गालियां,जिसकी कार सड़क के बीचों-बीच पंक्चर हो गयी हो।

मुझे लगता है कि बुश इतनी गालियां साल भर में भी नहीं खाते होंगे, जितनी गालियां बीच सड़क में खराब कार का मालिक खाता है।

जिसे सहनशीलता बढ़ाने का कोर्स सिखाना हो, उसकी कार खराब करके सड़क के बीचों-बीच खड़ा कर दो। सारा हेकड़ी फरार हो जायेगी।
मार हार्न पे हार्न। रास्ते में इतनी मार-धाड़ हो लेती है कि घर पर चाऊं-चाऊं के लिए ऊर्जा ही नहीं बचती।
यह ट्रेफिक का सकारात्मक पक्ष है। घरों में शांति इसलिए है कि बंदा निचुड़ कर लौटता है, अब झगड़ा कैसे हो। संडे को झगड़े का टाइम मिलता है, तो बंदा उसमें पड़ोसियों से झगड़े कि घर वालों से। जिन शहरों में ट्रेफिक ज्यादा होता है, उन शहरों में घरों में शांति रहती है।
ट्रेफिक बढ़ता है, तो बंदों में कोलंबस प्रवृति बढ़ती है, वो नये-नये इलाके ढूंढ़ते हैं। एक बार मैंने दिल्ली में एक जगह कार पार्किंग की ठीया तलाशने की कोशिश की और वह तलाशने की कोशिश में चलता गया, चलता गया, बाद में मुझे पता लगा कि मैं बीकानेर के आसपास हूं।


भविष्य में बंदे इस लपेटे में नये द्वीप या नये महाद्वीप तलाश सकते हैं।
नया इतिहास यूं लिखा जायेगा-होनोटूंबू महाद्वीप किसने खोजा था।
आलोक पुराणिक ने, पार्किंग स्पेस की तलाश में वह बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत ही दूर निकल गये, वहां नया महाद्वीप मिल गया जी।

आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799

Wednesday, July 4, 2007

दिल की कॉल नहीं, कॉल सेंटर

दिल की कॉल नहीं, कॉल सेंटर
आलोक पुराणिक
रास्ते कई हैं। रास्ते दिखाने वाले उनसे ज्यादा हैं।
जी मैं आध्यात्मिक रास्तों की बात नहीं कर रहा हूं। वहां तो भभ्भड़ मचा हुआ है। मार ट्रेफिक जाम हो रखा है। एक बाबा प्रवचन करते हैं-परमात्मा की विरह अग्नि में मैं तप रहा हूं, ऐसा वह चार एयरकंडीशनरों वाले कमरे में बैठकर बोलते हैं। भईया ऐसे चार एयरकंडीशनरों का जुगाडमेंट हो ले,तो हम भी तपते रहें विरह अग्नि में। बाहर पैंतालीस सेंटीग्रेड के टेंपरेचर में रास्ते में निकलो, तो सिर्फ एक ही डर होता है कि भईया हम न तप लें। बाबाजी को यह गर्मी नहीं व्यापती, इसलिए विरह अग्नि अफोर्ड कर सकते हैं। घरवाले कहते हैं कि प्याज जेब में धर लो, लू-लपट से बच जाओगे। पर सस्ता प्याज कहां मिलता है, इसका रास्ता भी कोई बाबा नहीं बताता। सारे के सारे परमात्मा में उलझे हुए हैं।
टीवी पर एक और बाबा कह रहे हैं, आत्मा में परमात्मा है। दूसरे कह रहे हैं कि परमात्मा ही दरअसल आत्मा है। दोनों बाबाओं के चेहरे पर तर माल की आभा है। दोनों को आत्माओं की बेहतरी के रास्ते पता हैं, शरीर को सुरक्षित रखने की चिंताओं से बहूत आगे जा चुके बंदों का यही होता है। अपनी चिंता अभी शरीर को सुरक्षित रखने की है, सो रास्ता पूछते हैं उस दुकान का, जहां सरकार सस्ती दालें बिकवाने की घोषणा करती है।
घोषणाएं सबको मालूम हैं। पर ऐसी दुकानों का रास्ता किसी को नहीं मालूम।अपन सस्ती दाल की दुकान का रास्ता देख रहे हैं।
बाबाजी आत्मा-परमात्मा के रास्ते दिखा रहे हैं। रास्ते दिखाने का प्रवचन जिसने स्पांसर किया है, उस खब्बूमल कट्टोमल फर्म के मालिकान को जानता हूं, आटे की जमाखोरी में इनके बाप बंद हुए थे इमरजेंसी के दौर में। बहुत रकम पीट ली थी। बंदा एक बार चकाचक इंतजाम कर ले, फिर आत्मा-परमात्मा पर पवचन क्या, परमात्मा को ही स्पांसर कर सकता है। स्पांसर क्या, खुद को ही डिक्लेयर कर सकता है।
सो साहब अभी हम तो बहूत बेसिक किस्म के रास्ते पूछते हैं जैसे अग्रवाल स्वीट हाऊस या अमर सर्कस का रास्ता। यार की गली का रास्ता पूछने के लिए जिस किस किस्म का कलेजा चाहिए, वह हरेक के पास नहीं होता। फिर अब यार के पास फुरसत नहीं है।
अधिकांश यार पढाई पूरी करने से पहले की काल सेंटर में भरती हो रहे हैं। दिल की कॉल सुनने का टाइम नहीं है। टाइम है तो नोट छापने में लगाया जाये। इसलिए अब यार की गली के रास्तों का जिक्र लेखकों की रचनाओं में नहीं होता।
जिक्र तो रास्ते बताने वालों का हो रहा था।
रास्ते तरह-तरह की स्टाइलों में बताये जाते हैं। हमारे छोटे शहर में रास्ते अलग तरह से बताये जाते थे। वहां का स्टाइल यह है, किसी सडक पर पूछिये-गुप्ताजी हैं। एक बंदा टेढे एंगल से आपकी ओर देखता हुआ पूछता है, वही गुप्ताजी, जो अभी रिश्वत के आऱोप में पकड़ लिये गये हैं।
अब पूछने वाला सकपकाता है-जी पता नहीं , वह तो टेलीफोन के दफ्तर में काम करते हैं।
टेलीफोन दफ्तर वाले गुप्ताजी की तो लड़की भाग गई है। उन्ही के यहां जा रहे हैं आप-टेढे एंगल वाला चालू रहता है।
पूछने वाला फिर सकपकाऊ स्टाइल में बोलता है-जी मुझे नहीं पता, आप बताइए कि गुप्ताजी का घर कहां हैं।
जी घर तो पता नहीं, पर हमने सुना है कि गुप्ताजी की लडकी भाग गयी है।
लडकी भागी-विमर्श खत्म करने को अगला तैयार ही नहीं होता था।
एक पान वाले को मैं जानता हूं, जो रास्ता बताने को तब तैयार होता था, जब उससे पान खरीद लिया जाये। वह पान में हशीश डाला करता था। एक बार जो उसका पान खाता था, फिर बार-बार उसका पान खाने आता था। पान वाला एक रास्ता दिखाने के लिए दूसरे रास्ते पर चला देता था। वैसे क्या यही काम नेतागण भी नहीं करते क्या। किस रास्ते पर चलाने की बात होती है, और कहां ले जाकर छोड देते हैं।
पर उससे क्या, जो परेशान होते हैं, वो दोबारा पूछने नहीं आते, वो कहीं और चले जाते हैं।
रास्ते बताने वालों को फिर नये पूछने वाले मिल जाते हैं।
शुरु में बताया नहीं था कि रास्ते भी बहुत हैं, रास्ते बताने वाले भी बहुत हैं, और पूछने वाले तो बहूत हैं ही।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799