Saturday, May 5, 2007

प्रति व्यक्ति घोटाला

प्रति व्यक्ति घोटाला
आलोक पुराणिक
हैदराबाद के एक शोधकर्ता ने जोरदार काम किया है। उसने एक एबीसीडी चार्ट बनाया है, जिसमें ए से लेकर जेड तक हर अक्षर पर घोटाले दर्ज हैं। अब तक कुल घोटाले नब्बे हजार करोड़ रुपये के हुए हैं, घोटालेबाजों की काहिली ने निराश किया।
इस देश की पूरी अर्थव्यवस्था की वैल्यू करीब बत्तीस लाख करोड़ रुपये है। यानी अर्थव्यवस्था का बत्तीसवां हिस्सा भी घोटाले में नहीं गया है। घोटालेबाजों से और अधिक कर्मठ होने की उम्मीद थी ।
यानी अभी घोटालेबाजों को भारी मेहनत करनी है।
कैलकुलेशन किये इस खाकसार ने तो पता लगा कि इस देश में प्रति व्यक्ति घोटाला करीब नौ सौ रुपये बैठता है। हाय कितना कम घोटाला, दिल्ली के किसी मल्टीप्लेक्स में छह टिकटों की कीमतों भर का घोटाला। मेरा विनम्र निवेदन है कि घोटालों पर जो भारी गलतफहमी मची हुई है,उसे दूर करने के प्रयास किये जायें। पब्लिक समझती है कि भ्रष्टाचार इस देश में उपन्यास है, अरे वह तो लघु कविता भी नहीं है। पब्लिक समझती है कि भ्रष्टाचार हाईट के मामले में इस देश में अमिताभ बच्चन टाइप है, जबकि वह मुकरी भी नहीं है। और फिर लेफ्ट फ्रंट ध्यान दे, कितनी असमानता है यहां। नब्बे हजार करोड़ मे से तेलगी अकेले ही 30.000 करोड़ ले गये। बाकियों ने बचे हुए से काम चलाया।
ग्यारह करोड़ रुपये के साड़ी कांड, और कुछेक करोड़ के कोलतार घोटाले तो कुटीर उद्योग में शुमार होने चाहिए। और इन्हे संरक्षण मिलना चाहिए।
सारे घोटालों में चालीस फीसदी लघु क्षेत्र के लिए संरक्षित होने चाहिए। लघु क्षेत्र में रोजगार अधिक मिलता है। जैसे ट्रांसपोर्ट अथारिटी के दफ्तर में अगर पांच हजार का घोटाला होता है, तो इसमें तीन अफसर, तीन बाबुओं और दो चपरासियों को हिस्सा मिलता है। दस हजार के लघु घोटाले में बीस के आसपास लोगों को रोजगार मिलता है। उधर तेलगी 30,000 करोड़ अंदर करते हैं, तो पांच-दस लोगों को ही रोजगार मिलता है। पूंजी का केंद्रीकरण होता है, लेफ्ट फ्रंट को इस पर आपत्ति करनी चाहिए। सब मिल-बांटकर खायें। साथी हाथ बढ़ाना, थोड़ा ही सही,पर सब मिलकर खाना।
वित्त मंत्री को आगामी बजट में घोषणा कर देनी चाहिए, प्रति व्यक्ति घोटाला नौ सौ रुपये का मतलब यह है कि नौ सौ रुपये हर बंदे के घोटाले में जा चुके हैं। जिसके नहीं गये हैं, वह इस बजट के बाद अपना हिस्सा दे दे। निकालिये नौ सौ रुपये और मुझे भिजवा दीजिये।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-9810018799

कटारा जी के इस्तेमाल

कटाराजी के इस्तेमाल
आलोक पुराणिक
जो लोग नेताओँ को पब्लिक के लिए कटार समझते हैं,उन्हे समझना चाहिए कि कटाराजी भी हैं। भाजपा के बाबूभाई कटाराजी ने जो हुनर दिखाया है,उससे साफ होता है कि सांसद सिर्फ सांसद निधि, ठेकों, पेट्रोल पंपों को खाने के ही काम नहीं आते, उनके दूसरे भी काम हैं।
इस खाकसार का मानना है कि अगर कटाराजी की कायदे का इस्तेमाल किया जाये, तो सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी, कई मामलों में।
कटाराजी का प्रयोग नंबर एक तो यह है कि उन्हे रिहा किया जाना चाहिए फिर देश का स्वास्थ्यमंत्री का जनसंख्या सलाहकार टाइप का कुछ पद दिया जाना चाहिए। जनसंख्या बढ़ रही है,सब परेशान हैं। कटाराजी के होते जनसंख्या बढ़ेगी, तो पर कनाडा वालों की। हर हफ्ते पतली गली से सौ-दो सौ जहाज भर कर ले जायें। कुछेक सालों में टोरंटो से सांसद होने काबिल हो जायेंगे कटाराजी।
यूरोप के कुछ नन्हे-मुन्ने देशों पर इंडिया वालों का कब्जा तो पचास-साठ हफ्ते में ही हो लेगा। अब जैसे पूरे फिनलैंड की आबादी करीब पचास लाख है। दिल्ली के करोलबाग जैसे पांच –छह मुहल्ले वहां लादकर ले गये, तो फिनलैंड कटारालैंड हो जायेगा। फिनलैंड टाइप देशों के लोग तो भारत सरकार से प्रार्थना करेंगे कि प्लीज इसका नाम बदला नहीं जाये, इसे फिनलैंड ही रहने दिया जाये, उसे कटारालैंड न घोषित किया जाये। मुझे तो बहुत दिव्य सपना दिखायी दे रहा है-फिनलैंड की संसद में कटाराजी भाषण दे रहे हैं और उनसे फिनलैंड वाले कह रहे हैं, प्लीज हमें भी यहीं रहने दिया जाये, प्लीज। या फिनलैंड के ओरिजनल बंदे कटाराजी से चिरौरी करेंगे, भईया ये देश तो आपने भर दिया, अब हमें किसी और देश में पार करवा दो। कटाराजी पार करवा देंगे और मोटी फारेन करेंसी इंडिया को कमा कर देंगे।
कटाराजी यूं भी कर सकते हैं कि बंगलादेश चले जायें। वहां उन्हे लोग बहुत सम्मान के साथ वहां के नेताओं को ट्रेनिंग देने के काम में लगा देंगे। कटाराजी वहां के नेताओं को यह ट्रेनिंग देंगे कि कैसे तड़ीपार हुआ जाता है। बंगलादेशियों के सबसे बड़ा नेता कौन होंगे-जी अपने बाबूभाई कटाराजी।
और एक काम करके तो कटाराजी राष्ट्र सेवा ही करेंगे। कटाराजी को कश्मीर भेज दिया जाये और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर लगा दिया जाये। कटाराजी हर हफ्ते कुछ बंदों को उधर करते रहें। फिर एक दिन पाकिस्तानी कश्मीर अपना होगा। फिर हम कश्मीर तक क्यों रुकें। कराची, लाहौर क्या दूर हैं। घुसपैठियों, तुम्हारी बंदूक-कटार का जवाब हम कटाराजी हैं।

हट एमपीबाजी करता है

आलोक पुराणिक
कबूतर कथा नंबर एक –हट एमपीबाजी करता है
कबूतर अपनी कबूतरी को घर छोड़ गया, इसमें नयी बात नहीं थी।
कबूतर अपनी कबूतरी को अकसर घर छोड़कर जाया करता था। पर जबसे कबूतर दिल्ली आने-जाने लगा था, तब से उसके चाल-चलन में तब्दीली आने लगी थई।
कबूतर जब से दिल्ली गया था, दिल्ली की हवा लग गयी थी। दिल्ली के कबूतर और इलाकों के कबूतरों से थोड़े अलग होते थे।
बाकी इलाकों के कबूतर अपनी-अपनी कबूतरी में मगन रहते थे। या कहा जाये कि इसके अलावा उनके पास चारा नहीं था। चारा न हो, तो भैंस उपवास घोषित करके धार्मिक बन सकती है। दूसरी कबूतरियों के विकल्प उपलब्ध न हों, तो कबूतर खुद को एक कबूतरी-व्रता घोषित कर सकते हैं। वैसे, ऐसा वो आदमी भी करते हैं, जिन्हे सतत लाइन-मारण प्रक्रिया का कोई रिस्पांस नहीं मिलता, वे प्रेम की निरर्थकता पर भारी प्रवचन दे सकते हैं। वे खुद को ब्रह्मचारी भी घोषित कर सकते हैं। और भी न जाने क्या-क्या कर सकते हैं। पर कबूतर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, वो सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपनी कबूतरी को लगातार सतत बार-बार विश्वास दिलायें कि सिर्फ वही एक कबूतरी है उनकी जिंदगी में।
वैसे कबूतरों की दुनिया में थोड़े टेंशन कम इसलिए थे कि वहां इस तरह के सीरियल बनना शुरु नहीं हुए थे, जिसमें प्रति कबूतर कम से कम चार अफेयर दिखाये जायें। या एक कबूतरी दूसरी कबूतरी के कबूतर को ले उड़ने के लपेटे में रहती हो। क नाम से बनने वाले सीरियलों का कहर कबूतरों की दुनिया से दूर ही था।
सो सीरियलों से दूर कबूतर-कबूतरी गुटरगूं करते थे। मजे से रहते थे। पर उस कबूतरी का भाग्य, उसका कबूतर दिल्ली चला गया।
खैर वह कबूतर दिल्ली जाकर, एमपी बनकर बहुत बदल गया था।
एक दिन एयरपोर्ट पर कुछ देसी कबूतर गुटरगूं कर रहे थे। गुटरगूं क्या , डिस्कवरी चैनल में दिखायी जाने वाली अमेरिकन कबूतरियों के सौंदर्य की चर्चा कर रहे थे। बस चर्चा भर कर रहे थे कि उन्होने देखा कि उनका एमपी कबूतर एक दूसरी कबूतरी को लेकर उड़ने के चक्कर में था।
एयरपोर्ट अफसर लोगों ने पूछा-कौन है।
एमपी कबूतर ने कहा जी बिलकुल अपनी ही कबूतरी है। सौ टका अपनी कबूतरी है।
जिसे कबूतर अपना कह रहा था, वह थोड़ा सा घबरा रही थी।
पर एमपी हो चुका कबूतर खुर्राट हो चुका था। वह फिर बोला-जी यह मेरी कबूतरी है।
सारे देसी कबूतरों के मुंह से एक साथ निकला-अबे तू तो एमपी बाजी कर रहा है।
इसके बाद कबूतर पंचायत में फैसला लिया गया कि अब से जो कबूतर दूसरी कबूतरी को अपना बतायेगा, उसे कहा जायेगा कि यह एमपीबाजी करता है। और उसे कबूतर ना मानकर एमपी माना जायेगा और बिरादरी-बदर कर दिया जायेगा।
तब से कबूतरों की बिरादरी में परायी कबूतरियों पर तांक-झांक करने वाले को एमपी कहा जाता है।
कबूतर कथा दो-एमपीबाजी अब नहीं रुकेगी
सो साहब, कबूतरों की बिरादरी में एमपी टाइप कबूतर चल निकले थे।
शरीफ किस्म की जिंदगी को बोरिंग बताते हुए एमपी टाइप कबूतर पेज थ्री की पार्टियों में जाते थे। अपने कैरेक्टर में ढील देते थे, डीलरों को तरह-तरह के डील देते थे। डीलरों को फायदा हो जाये, इसके लिए साथी कबूतरों के परों को भी छील देते थे।
पेज थ्री टाइप के कबूतर खूब नोट कमाते थे। फिर इलेक्शन में वोट कमाते थे। फिल्मों में काम करने वाली कबूतरियों को अपनी इलेक्शन सभाओं में ले जाते थे। उनका डांस करवाते थे। जब कबूतर बिरादरी खाने के लिए दाने की समस्या से जूझ रही होती, तो पेज थ्री के नौजवान कबूतर आपस में कुछ इस किस्म की गुटर-गूं करते थे।
अबे तेरे गले का हार तो बहुत महंगा है कित्ते किलो दाने देकर खरीदा। सौ कुंतल या दो सौ कुंतल।
शटअप मैं समाजवादी कबूतर हूं। इतना वेस्ट नहीं करता कि दौ कुंतल दाने देकर हीरे का यह हार खरीदूं। मैंने यह हार सिर्फ एक सौ अस्सी कुंतल दाने देकर खऱीदा है।
हा हा हा हा।
ही ही ही ही।
खूब पेज थ्री ही ही होती।
एक दिन एक सीडी बाजार में आयी, जिसमें एक कबूतर को तरह –तरह की कबूतरियों से ऐसी-वैसी बातें करता हुआ दिखाया गया।
दूसेर दिन दूसरी सीडी बाजार में आयी, जिसमें उसके प्रतिद्वंदी कबूतर को तरह-तरह के डील में कमीशन मांगते हुए दिखाया गया।
पूरी कबूतर बिरादरी में सीडी चर्चा फैल गयी। सारे बच्चे सीडी देखने की मांग करने लगे।
बुजुर्ग कबूतरों ने पंचायत की और कहा कि कबूतरों को यह हरकतें शोभा नहीं देती, यह तो एमपीबाजी है।
इस पर कुछ कबूतरों ने कहा, तो क्या दिक्कत है, तमाम एमपी कबूतरबाजी कर रहे हैं, तो कबूतर एमपीबाजी क्यों नहीं कर सकते।
सीनियर कबूतर निरुत्तर थे।
अब कबूतरों को फुलमफुल एमपीबाजी करने से कोई नहीं रोक सकता।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-9810018799